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लॉकडाउन का साइड इफैक्ट:कलम का कुआं के ग्रामीण शराब का काम छोड़ नौकरी करने लगे थे, लॉकडाउन में बेरोजगार हुए तो फिर से शुरू किया धंधा

कोटाएक महीने पहले
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  • पहले 20% लोग ही हथकढ़ शराब बनाते थे, अब 40 फीसदी लोग इसी पर निर्भर

कलम का कुआं... कोटा से महज 25 किलोमीटर और कोटा-झालावाड़ नेशनल हाइवे से 5 किलोमीटर अंदर बसा यह गांव हाड़ौती समेत पूरे प्रदेश में हथकड़ शराब बनाने व बेचने के लिए बदनाम हो चुका है। गांव में बंजारा समुदाय के 400 घर हैं और 40 फीसदी शराब के व्यवसाय से सीधे तौर पर जुड़ी है। ग्रामीणों व जानकारों के अनुसार यहां पर पिछले 8-10 सालों से हथकड़ शराब बनाने-बेचने का काम बहुत कम हो गया था।

लोग गांव के बाहर कमाने जाते थे और गांव सुधर रहा था। सिर्फ कुछ बदमाशाें की वजह से पूरा गांव बदनाम हो रहा था, लेकिन लॉकडाउन ने पटरी पर आ रही, इस व्यवस्था को तहस-नहस का दिया। पहला तो युवाओं का काम-धंधा खत्म हो गया और दूसरा शराब की डिमांड बढ़ गई। बस.. गांव वालों ने वापस शराब के पुराने व्यवसाय की तरफ रुख कर लिया।

20 फीसदी लोग यह काम पहले से कर रहे थे और वर्तमान में यहां पर 20 फीसदी लोग दूसरे भी इस काम में वापस उतर गए हैं। कुल 40 फीसदी लोग अब इस पर वापस निर्भर हो चुके हैं। दूसरे काम की बजाय, यह काम ज्यादा आसान व मुनाफे वाला है इसलिए युवा इसे नहीं छोड़ना चाहते। गांव में 900 वोट हैं और सभी उस व्यक्ति को मिलते हैं, जो उन्हें इस व्यवसाय में सपोट करें। गांव की सबसे बड़ी खासियत इनकी एकजुटता है।

इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि पुलिस जब भी यहां कार्रवाई करने जाती है तो हर व्यक्ति एकजुट होकर उन पर पथराव करते हैं। महिला, बच्चे, युवा हर कोई विरोध करता है। सरकार प्रयास करें तो गांव को कुछ प्रयासों से वापस पटरी पर लाया जा सकता हैं। पढ़िए, यह स्पेशल रिपोर्ट-
पुलिस रिकॉर्ड गवाह है गांव सुधर रहा था, अब फिर बेपटरी हुआ

यह गांव अनंतपुरा थाने की जगपुरा चौकी में आता है। 2019 से न पुलिस ने छापा मारा और न हथढ़ शराब बेचते व बनाते किसी को गिरफ्तार किया। 2020 में जैसे ही लॉकडाउन लगा तो यहां हथकड़ शराब का काम शुरू हो गया। इसके बाद अनंतपुरा पुलिस ने 2020 में दो बार गांव पर दबिश देकर 7 लोगों को गिरफ्तार किया था।

उस वक्त पुलिस पर भी पथराव हुआ था। वहीं, लॉकडाउन के बाद अप्रैल 2020 से दिसंबर 2020 तक पुलिस ने 10 मुकदमे बनाए। इससे साफ है कि लॉकडाउन के बाद गांव वापस इस दिशा की तरफ मुड़ रहा है। इधर, पुलिस ने आबकारी अधिनियम में 2019 में कुल 47, 2020 में 58 और 2021 के 21 दिनों में कुल 4 कार्रवाई कर चुकी है।
रोजगार: गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है। नरेगा का काम भी सिर्फ 1 माह पहले अलनिया के नए सरपंच ने शुरू करवाया है। समाजसेवक अमर सिंह हाड़ा का कहना है कि यहां रोजगार नहीं होने से युवा शराब के व्यवसाय की तरफ मुड़ गए हैं। पहले यहां से लोग कंबल, पक्षी बेचने और काम करने करीब 100 से 150 महिला-पुरुष लेबर बाहर जाते थे
चिकित्सा: गांव में कोई गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा हो या बीमारी, सभी को 25 किमी दूर मंडाना या 30 किमी दूर कोटा ले जाना पड़ता है।

शिक्षा: गांव में पहली से 5वीं तक व छठी से 8वीं तक के दो स्कूल हैं, जिसमें कुल 145 बच्चों का नामांकन है। शिक्षक भोजराज गोचर का कहना है कि पिछले एक साल से स्कूल कोरोना की वजह से बंद से हैं, लेकिन ऑनलाइन क्लास चल रही हैं।
सड़क व बिजली

गांव में पक्की सड़कों का निर्माण बहुत पहले करवाया गया था। लेकिन, अब आधे गांव में सड़क के बजाए कीचड़ फैला है। ग्रामीण डामर की पक्की सड़क को तरस रहे हैं। वहीं, बिजली की समस्या बहुत पुरानी है। रोड लाइटें नहीं हैं, जो है वो काम नहीं करती।

सरकार ने नवजीवन योजना चलाई थी तो ग्रामीणों ने शराब बनाना छोड़ दिया था

चंद्रसिंह - रिटायर्ड एएसपी ने जैसा भास्कर को बताया
सरकार की नवजीवन योजना ने इस गांव को शराब से निजात दिलाई थी। योजना के तहत 2007-08 में हमने गांव को 80 फीसदी शराब मुक्त करवा दिया था। लोगों ने शराब बनाना आैर पीना तक छोड़ दिया था। उस वक्त मैं रोज गांव जाता था और ग्रामीणों से बात करके उनकी हर समस्या को सुनता था।

उसको दूर करने का प्रयास करता था। यहां सबसे पहले हमने स्वयं सहायता समूह खुलवाए, प्रशिक्षण केन्द्र खुलवाए, अलनिया डेम पर मछली पालन व्यवसाय शुरू करवाया, जेसीबी, डंपर से रोजगार दिलवाया, लेकिन, अब वापस गांव शराब की तरफ क्यों मुड़ रहा है, यह चिंता का विषय और हमारा दुर्भाग्य हैं।

हाड़ौती के इन गांवों में भी बनती है हथकढ़ शराब, ग्रामीण बोले-रोजगार नहीं है, इसलिए ये धंधा करते हैं

1. बारां जिले का बिलासगढ़- हम भी नहीं चाहते हैं यह काम : बारां जिले के बिलासगढ़ गांव निवासी बुद्धिप्रकाश ने बताया कि हम इस काम काे करना नहीं चाहते हैं, लेकिन काेई राेजगार है। सरकार के ने भी राेजगार के लिए काेई विकल्प नहीं दिया है। ऐसे में परिवार पालने के लिए हमें यह गलत काम करना पड़ रहा है। अगर हमें रोजगार मिल जाए तो इस धंधे को छोड़ देंगे।

2. छबड़ा तहसील का लक्ष्मीपुरा गांव- लोग पढ़े लिखे हैंं, लेकिन राेजगार नहीं : छबड़ा तहसील के लक्ष्मीपुरा गांव निवासी अनिल ने बताया कि हमने बच्चाें काे अच्छी शिक्षा दिलाई है। लेकिन, हमारे परिवार की स्थिति ठीक नहीं हाेने के कारण मजबूरी में इस कारोबार से जुड़े हैं। हमारे बच्चों नाैकरी मिल जाए तो इस अवैध काम को छोड़ देंगे।

3. काेटा जिले का सीमलहेड़ी गांव : काेटा जिले के सीमलहेड़ी गांव निवासियाें ने बताया कि पहले हथकढ़ शराब बनाते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे बंद कर रहे हैं। कुछ लाेग हैं जाे इस काम काे करते हैं। वाे भी इसकाे पूरी तरह बंद करना चाहते हैं। इसके बदले में अगर राेजगार मिल जाए ताे गांव का नाम भी पुलिस व अाबकारी रिकार्ड से हथकढ़ शराब बनाने वाले गांव से हट जाएगा।

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