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DOCTOR DAY SPECIAL:यू ही नहीं कहते धरती के भगवान, संकट के दौर में परिवार से दूर रहकर अपना फर्ज निभाते रहे

कोटा7 महीने पहले
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डॉक्टर डे स्पेशल- इनके जज्बे क� - Dainik Bhaskar
डॉक्टर डे स्पेशल- इनके जज्बे क�

थामे रखी सांसो की डोर

मेडिकल कॉलेज अस्पताल ऑक्सीजन प्लांट इंचार्ज डॉ सीएल खेड़िया, कोरोना की दूसरी लहर में 1 महीने तक अपने बच्चों को देख नहीं पाए। उन्होंने परिवार से दूर रहकर लोगों की जिंदगी की डोर नहीं टूटने दी। अप्रैल के शुरू में 100 सिलेंडर प्रतिदिन की खपत थी, जो 1500 सिलेंडर तक पहुंच गई। 10 मई तक तो यह बढ़कर 1800 से 2000 सिलेंडर तक पहुंच गई थी।

डॉ सीएल खेड़िया
डॉ सीएल खेड़िया

ये वो दौर था जब चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई थी ऑक्सीजन की किल्लत होने लगी थी। ऐसे समय में थोड़ा भी लूज करते हैं तो बड़ी दिक्कत हो जाती। क्योंकि मरीज को दवा तो लेट दे सकते हैं, लेकिन ऑक्सीजन देरी से नहीं दे सकते।चुनौती बड़ी थी, परिवार के लोगों ने हिम्मत दी तो डॉ खेड़िया ने पूरी जिम्मेदारी के साथ बखूबी काम निभाया 1 दिन में 18-18 घंटे काम किया। कभी-कभी तो रात को 3-4 बज जाती थी। उसके बाद भी फोन की घंटी बजती तो रात को ही उठ कर सीधा प्लांट पहुंच जाते थे।

हर आधे घंटे में सिलेंडर की गाड़ी आती थी। उसको खाली करवाना, सिलेंडर बदलना, प्लांट में प्रेशर ड्रॉप होना, पैनल में दिक्कत आना, सिलेंडर बदलवाना ये सब काम मौके पर खड़े रहकर करवाए। कठिन दौर में पूरी टीम के साथ खड़े रहे। काम इतना ज्यादा था ,कि खाने का वक्त ही नहीं मिल पाता था, जो मिलता था बस वही खा लेते थे।

बंद नहीं होने दिया जेके लोन अस्पताल,जिम्मेदारी सिर पर ली

बहुत कम लोगों को पता होगा कि कोरोना की दूसरी लहर में हॉट स्पॉट बनते जा रहे हैं संभाग के सबसे बड़े मातृ एवं शिशु चिकित्सालय जेकेलोन को बंद करने की नौबत आ चुकी थी। एक साथ 5 महिला मरीजों के संक्रमित मिलने पर अस्पताल प्रशासन ने अर्जेंट मीटिंग कॉल की। और जेकेलोन को बंद करके दादाबाड़ी या रामपुरा अस्पताल में महिलाओं की डिलीवरी करने की चर्चा हुई। ऐसे समय में गायनिक विभाग की एचओडी डॉ निर्मला शर्मा अस्पताल को बन्द नहीं करने की बात पर अड़ गई। और कुछ भी गलत होने पर सारी जिम्मेदारी अपने सिर लेने की सहमति जताई।

डॉ निर्मला शर्मा,एचओडी,गायनिक विभाग
डॉ निर्मला शर्मा,एचओडी,गायनिक विभाग

ये वो दौर था जब बूंदी,बारां सहित संभाग में निजी व सरकारी अस्पतालों में कोरोना पॉजिटिव मरीज की डिलीवरी होना बंद हो गई थी। कोटा का जेके लोन ही एकमात्र अस्पताल था जहां महिलाओं की डिलीवरी की जा रही थी। उस समय दर्द से कहराती महिलाओं को अस्पताल में इलाज मिला। कोरोना की जांच रिपोर्ट आने में वक्त लगता था। पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर महिलाओं को कोविड अस्पताल में शिफ्ट करना पड़ता था।

उस दौर में डॉ निर्मला शर्मा की टीम ने 8 सिजीरियन और 10-12 डिलीवरी प्रतिदिन की। इस दौरान डॉ निर्मला शर्मा खुद बीमार हुई। परिवार भी संक्रमित हुआ। उन्होंने घर से ही काम संभाला और मॉनिटरिंग की।उन्होंने वैक्सीनेशन के लिए भी टीम को मोटिवेट किया। वैक्सीनेशन के बाद ग्रुप में अपनी टीम के फोटो मंगवाए।

काम के जुनून के चलते परिवार को इमोशनल सपोर्ट नहीं दे पाए

डॉ. आरके जैन, ईएनटी विभागाध्यक्ष अपनी टीम के साथ ब्लैक फंगस से पीड़ित मरीजों के इलाज में जुटे हैं।अब तक 85 ऑपरेशन कर चुके हैं। शुरुआत में हालत खराब थे। दवाइयां, इंजेक्शन नहीं मिल रहे थे।उसके बावजूद ऑपरेशन कर रहे थे। 20 मई को पहला ऑपरेशन किया था। जिसके बाद मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती गई। सुबह 8 बजे ऑपरेशन थिएटर में जाते ,जिसके शाम को 6 बजे निकलते। हालत यह यह थी कि 1 दिन में 6 से 7 के लेने पड़ते थे।

डॉ. आरके जैन, ईएनटी विभागाध्यक्ष
डॉ. आरके जैन, ईएनटी विभागाध्यक्ष

इस दौरान परिवार वालों को समय नहीं दे पाए। कई बार तो सुबह का लंच शाम 4 बजे करना पड़ा।उन्होंने इस दौर में मानसिक प्रताड़ना भी झेली। पत्नी, बेटी व विदेश से आए भाई-भाभी व भतीजा संक्रमित हुए।उस दौर में परिवार को इमोशनल सपोर्ट की जरूरत थी, लेकिन मजबूरी ऐसी थी परिवार को इमोशनल सपोर्ट भी नहीं दे पाए। क्योंकि सामने अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीजों की चिंता सताए रहती थी। अस्पताल में अब तक 181 मरीज भर्ती हुए हैं। जिनमें से 60 मरीज डिस्चार्ज हो चुके हैं।जबकि 30 मरीजों की मौत हो चुकी है

अपेंडिक्स हुआ, 21 दिन लिक्विड फूड पर रहे, ठीक होकर फिर जिम्मेदारी संभाली

डॉ अभिमन्यु शर्मा,मार्च 2020 में कोरोना स्क्रीनिंग टीम के इंचार्ज बने थे। शुरू में 24 मेंसे 20 घण्टे काम किया। टीम के साथ मिलकर जिले की बॉर्डर को सील करवाना, आने वाले लोगों की सेंपलिंग करवाने से लेकर क्वारंटाइन करने पर की व्यवस्था की। इस दौरान अपेंडिक्स हुआ, एक माह की छुट्टी पर रहे। 21 दिन लिक्विड फ्रूट पर रहे है। ठीक होकर वापस अपनी जिम्मेदारी निभाना शुरू किया। दिसंबर में उन्हें वैक्सीन कंट्रोल रूम का जिला प्रभारी बनाया गया। सरकार द्वारा जारी SOP एप्लाई करवाई। जिले में सेशन साइट की प्लानिंग की।मौके पर जाकर स्टाफ को ट्रेनिंग दी। सफलता पूर्वक ड्राई रन करवाया।

डॉ अभिमन्यु शर्मा
डॉ अभिमन्यु शर्मा

पहली बार वैक्सीन की खेप आई तो धड़कनें बढ़ गई।शुरू में वैक्सीन को लेकर लोगों के मन में भ्रांतियां थी ऐसे समय में फ्रंटलाइन वर्कर को विश्वास दिलाना जरूरी था उन्होंने सेशन साइट पर एंबुलेंस की व्यवस्था करवाई जो दो से ढाई माह तक लगातार रखी। ताकि किसी भी तरह की दुर्घटना से निपटा जा सके।

60 प्लस वालों के वैक्सीनेशन बड़ा चेलेंज था। हाई रिस्क ग्रुप होने के कारण चिंताएं बढ़ रही थी। सेशन साइट पर एंबुलेंस के साथ डॉक्टर्स की तैनाती की।ताकि आपातस्थिति में लोगों को संभाला जा सके।काम का बोझ इतना ज्यादा था कि कई महीनों तक अपने बच्चों से मिल भी नहीं पाए।

दूसरी लहर का कहर बड़ा तो ऑक्सीजन की किल्लत हुई। उन्हें ऑक्सीजन होम आइसोलेशन कंट्रोलर की जिम्मेदारी दी गई। ऑक्सीजन प्लांट में बैठकर जिम्मेदारी निभाना कठिन हुआ तो उन्होंने ESI हॉस्पिटल में अपना ठिकाना बनाया। सुबह से रात तक ड्यूटी की। ताकि जरूरतमंद मरीज को ऑक्सीजन सिलेंडर मिल सके।

इस दौरान उनकी 70 वर्षीय मां को कोविड हुआ। एक तरफ बीमार मां थी,तो दूसरी तरफ ऑक्सीजन कंट्रोलर की जिम्मेदारी व कोविड केयर सेंटर की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी। मजबूरी में मां की सीटी स्कैन के लिए भी दोस्त से कहना पड़ा। डॉक्टर अभिमन्यु का मानना है कि भगवान ने डॉक्टर बनाकर जो मौका दिया है उसमें मानवता के प्रति सेवा करके मानसिक शांति मिलती है।

डॉ राजेश सामर
डॉ राजेश सामर

इलाज के साथ बेसहारा व अनाश्रितों की मदद की

डॉ राजेश सामर वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी इमरजेंसी मेडिसिन कोरोना कंट्रोल रूम सीएमएचओ ऑफिस में लगातार सेवाएं दी। साथ ही कोरोना स्क्रीनिंग,बाहर जाने वालों की लगातार मॉनिटरिंग करने व होम आइसोलेशन पॉजिटिव मरीजों को घर घर मेडिसिन किट वितरण की करने वाली टीम में जिम्मेदारी निभाई। उस दौरान एक दिन में ढाई सौ से तीन सौ फोन अटेंड करके लोगों को चिकित्सीय परामर्श दिया।इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर इमरजेंसी में मरीजों के घर पर भी जाकर सेवाएं दी।मरीजों की देखभाल के साथ साथ सामाजिक सरोकार भी निभाते रहे। लाचार, लावारिस, बेसहारा व अनाश्रितों की मदद भी की।

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