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मायरे में दो बोरे नोट भरकर पहुंचा मामा:किसान ने भांजे की शादी के लिए ढाई साल इकट्‌ठा किया पैसा, 10 के नोटों से भरी टोकरी

नागौर10 महीने पहले

अनूठे मायरे के लिए प्रसिद्ध राजस्थान के नागौर में एक बार फिर मायरा चर्चा में है। यहां किसान भाई अपने भांजे की शादी में दो बोरे नोट लेकर पहुंचा। मायरे के लिए किसान ढाई साल से पैसा इकट्‌ठा कर रहा था। रविवार रात को उसने मायरे में टोकरी (खारी) खाली कर दी। खारी में 10-10 के नोटों को रखा गया। कुल सवा छह लाख रुपए मायरे में भरे गए। यह पैसे गिनने में भी 8 पंचों को 3 घंटे का समय लग गया।

मामला नागौर जिले के देशवाल गांव का है। एक शादी में अनोखे अंदाज में मायरे की रस्म अदा की गई। यहां किसानी से अपना जीवन यापन करने वाले तीन भाई अपने भांजे की शादी में बहन के ससुराल नोटों से भरे प्लास्टिक के बोरे को लेकर पहुंचे। फिर इसे नाते-रिश्तेदारों और समाज के पांच-पटेलों की मौजूदगी में खेती-बाड़ी में काम में लिए जाने वाली खारी में खाली कर मायरा भरा गया। प्लास्टिक बोरे में सभी नोट 10-10 रुपए के थे और कुल सवा 6 लाख रुपए नगद का मायरा भरा गया। इसके अलावा सोने-चांदी के आभूषण भी उपहार स्वरूप मायरे में दिए गए।

बोरी में भरे नोट मायरे में टोकरी (खारी) में खाली किए गए। खारी में 10-10 के नोटों को रखा गया।
बोरी में भरे नोट मायरे में टोकरी (खारी) में खाली किए गए। खारी में 10-10 के नोटों को रखा गया।

जिले के देशवाल गांव की रहने वाली सीपू देवी के बेटे हिम्मताराम जाट की रविवार को शादी थी। इस शादी में सीपू देवी के 3 भाई डेगाना निवासी रामनिवास जाट, कानाराम जाट और शैतानराम जाट ने अनोखे अंदाज में मायरा भरा। तीनों भाई मायरे में भरी जाने वाली नगदी को प्लास्टिक के बोरे में भरकर लाए थे। इसके बाद प्लास्टिक बोरे में भरी नगदी को पंच पटेल और नाते-रिश्तेदार की मौजूदगी में खारी (खेती-बाड़ी के काम में फसल इकट्ठा करने के लिए काम में लिया जाने वाला साधन) में खाली कर दिया। खारी में खाली किए गए सभी नोट 10-10 रुपए के थे।

ढाई साल से जमा कर रहे थे 10-10 रुपए के नोट
मायरा भरने वाले किसान रामनिवास जाट ने बताया कि किसान बेटों को पिता से संपत्ति के रूप में खेती के लिए जमीन और फसल जमा करने के लिए टोकरी (खारी) मिलती है। बहनें ससुराल जाने के बाद पिता से मिली संपत्ति पर अपना हक छोड़ देती हैं। इसके चलते उनके मन में ख्याल आया कि अब वो मायरे में टोकरी भरकर रुपए ले जाएंगे, लेकिन आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और इसे भरने के लिए काफी रुपयों की जरूरत थी। इसलिए तीनों भाइयों ने 10-10 रुपए के नोट जमा करना शुरू किया और ढाई साल में कुल सवा 6 लाख रुपए जमा हुए। रामनिवास ने बताया कि उनकी दो बहनें हैं और इससे पहले भी वो 3 मायरे भर चुके हैं। ये चौथा और अंतिम मायरा था।

तीन मामा ढाई साल से 10-10 रुपए के नोट इकट्‌ठे कर रहे थे।
तीन मामा ढाई साल से 10-10 रुपए के नोट इकट्‌ठे कर रहे थे।

8 पंच-पटेलों ने 3 घंटे में गिने सवा 6 लाख रुपए
इसके बाद 8 पंच-पटेलों ने सभी नोटों की गिनती शुरू की। करीबन 3 घंटों की गिनती के बाद खारी में कुल सवा 6 लाख रुपए काउंट हुए। इस दौरान शादी में मौजूद हर महिला-पुरुष टकटकी लगाकर बैठे रहे। मायरे में खारी भरकर लाए रुपयों के लिए हर किसी ने तीनों भाइयों की जमकर तारीफ की।

8 पंच-पटेलों ने इन नोटों की गिनती की। इसमें करीब तीन घंटे का समय लगा।
8 पंच-पटेलों ने इन नोटों की गिनती की। इसमें करीब तीन घंटे का समय लगा।

नागौर का मायरा प्रसिद्ध
मारवाड़ में नागौर के मायरा को काफी सम्मान की नजर से देखा जाता है। मुगल शासन के दौरान के यहां के खिंयाला और जायल के जाटों द्वारा लिछमा गुजरी को अपनी बहन मान कर भरे गए मायरा को तो महिलाएं लोक गीतों में भी गाती हैं। कहा जाता है कि यहां के धर्माराम जाट और गोपालराम जाट मुगल शासन में बादशाह के लिए टैक्स कलेक्शन कर दिल्ली दरबार में ले जाकर जमा करने का काम करते थे।

इस दौरान एक बार जब वो टैक्स कलेक्शन कर दिल्ली जा रहे थे तो उन्हें बीच रास्ते में रोती हुई लिछमा गुजरी मिली। उसने बताया था कि उसके कोई भाई नहीं है और अब उसके बच्चों की शादी में मायरा कौन लाएगा ? इस पर धर्माराम और गोपालराम ने लिछमा गुजरी के भाई बन टैक्स कलेक्शन के सारे रुपए और सामग्री से मायरा भर दिया। बादशाह ने भी पूरी बात जान दोनों को सजा देने के बजाय माफ़ कर दिया था।

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