पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

दो साल से चल रहा है निर्माण:पहला दक्षिणमुखी गजानन मंदिर जहां अष्टमी को होती है पूजा, नवमी को मेला

नागौर13 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
लगभग 60 खंभों पर खड़ा होगा मुंदियाड़ विनायक मंदिर एवं मुंदियाड़ मंदिर में गजानन जी की प्रतिमा। - Dainik Bhaskar
लगभग 60 खंभों पर खड़ा होगा मुंदियाड़ विनायक मंदिर एवं मुंदियाड़ मंदिर में गजानन जी की प्रतिमा।
  • कई तरह की कलाकृतियों से तैयार हो रहा मुंदियाड़ में गणेश मंदिर, इस बार मेले में नहीं सजेगी दुकानें व झूले

जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर मुंदियाड़ गांव में 60 खंभो पर दक्षिण मुखी गजांनद महाराज का मंदिर बनाया जा रहा है। क्षेत्र में गजानंद जी महाराज का यह पहला मंदिर है जो बड़े स्तर पर तथा कलाकृतियां उकेर कर बनाया जा रहा है। इस मंदिर के लिए रामदेव पिती व उनके सहयोग द्वारा बजट लगाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि भादवा सुदी अष्टमी, नवमी व दशमी तीनों तक नागौर में मेले भरते है। जिनमें गणेशजी, तेजाजी व रामदेवजी के मेले मुख्य है। हालांकि इस बार कोरोना काल के चलते मेलों पर प्रशासनिक रोक है।

गणेश जी महाराज के अष्टमी के दिन जागरण होता है तथा नवमी को मेला भरता है। वहीं नवमी की शाम को तेजाजी के जागरण होता है तथा दशमी को मेला भरता है। इसी प्रकार अगले दिन बसवाणी में रामदेव जी का मेला भरता है। मुंदियाड़ का पहला दक्षिणमुखी मंदिर है जहां अष्टमी को पूजा होती है।

नागौर. पैदल मुंदियाड़ दर्शनार्थ जाते हुए श्रद्धालु।
नागौर. पैदल मुंदियाड़ दर्शनार्थ जाते हुए श्रद्धालु।

गणेश जी के लगा भोग ही मुंदल माता के लगता, मूषक के कान में बोल मांगते हैं मन्नतें

आम जगहों पर गणेश चतुर्थी के दिन की जाती रही है तथा इसी दिन गणेश मूर्ति की स्थापना कर पूजा शुरू होती है लेकिन मुंदियाड़ में मेला नवमी के दिन भरता है। संभवत यह पहली जगह है जहां गणेशजी अष्टमी के दिन पूजे जाते है। इसके पीछे कारण यह है कि भाकलों की कुल देवी मुंदल माता के पूजन का मुख्य दिन नवमी है और दंत कथा है कि मुंदल माता ने गणेशजी को कहा था कि पहले गणेश की पूजा होगी उसके बाद मेरी। मन्नत चूहे के काम में बोलकर मांगी जाती है।

300 साल से भर रहा है मेला, इस बार नहीं भरेगा
गणेशजी का मेला 300 साल पुराना है लेकिन इस बार नहीं भरा जाएगा। दंत कथा के अनुसार अमरसिंह राठौड़ के प्रधान मंत्री गिरधर व्यास थे। जिनके तीन पुत्र थे उनमें से जसकरण के पुत्र नहीं थी। इस पर गणेशजी ने आशीर्वाद दिया कि रणथंभौर से मेरी मूर्ति उठाकर लाओ तो उनके घर जन्म लूंगा लेकिन शर्त एक ही कहीं पर भी रूकना मत अगर रूक गए तो वहां से आगे नहीं चल पाऊंगा। व्यास रणथंभोर से मूर्ति ले आ रहे थे तो रास्ते में लघुशंका हुई और खुद को रोक नहीं सके तथा मूर्ति रखनी पड़ी। जहां मूर्ति रखी वहीं स्थापित हो गई।

खबरें और भी हैं...