बेटे-बहू ने बीमार मां-बाप को घर से निकाला:SDM से लेकर CM तक लगाई न्याय की गुहार, मुकदमा भी दर्ज करवाया पर नहीं हुई सुनवाई, बेटी के घर के पास बाड़े में रहने को मजबूर

नागौर3 महीने पहले
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बेटी के बाड़े में रह रहे बीमार मां-बाप। - Dainik Bhaskar
बेटी के बाड़े में रह रहे बीमार मां-बाप।

नागौर शहर के इंदिरा कॉलोनी निवासी SBI बैंक से रिटायर्ड भींयाराम चौधरी (62) और उनकी पत्नी रामप्यारी (62) पिछले 118 दिन से अपने ही घर से बेदखल हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री, कलेक्टर, एसपी और एसडीएम को शिकायत दी, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। उनके घर पर उनके बड़े बेटे अशोक कुमार और उसकी पत्नी पूजा ने जबरन कब्जा कर रखा है। दोनों बुजुर्ग किडनी, शुगर, बीपी जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित भी हैं।

भींयाराम का बड़ा बेटा अशोक कुमार चिकित्सा विभाग में पब्लिक हेल्थ मैनेजर के पद पर है। अपने पद के रसूख के चलते कोई भी कानूनी कार्रवाई नहीं होने दे रहा। 15 जून को बेटे और बहू दोनों को उन्होंने इंदिरा कॉलोनी में प्लाट नंबर 311 और 312 पर बने दो मकानों में से प्लाट नंबर 312 में शिफ्ट होने की बात कही। इस पर दोनों नाराज हो गए। साइड में जाने की बात से मुकर गए। दोनों ने मिलकर बुजुर्ग दंपती के साथ मारपीट की और उन्हें ही घर से बाहर निकाल दिया।

भींयाराम ने बताया कि उन्होंने मकान और प्लाट अपनी खुद की संपत्ति से बनाए हैं। ऐसे में कानूनी रूप से पुत्र या पुत्र वधू का इस पर हक नहीं है। इसके बाद शुरुआती करीब 10 दिनों तक दोनों बुजुर्ग दंपती ने परिवार और अन्य लोगों के माध्यम से बहू-बेटे ने समझाइश की कोशिश भी की, लेकिन नतीजा नहीं निकला। 15 जून को घर से बाहर निकालने के बाद से दोनों दंपती कुछ दिनों तक किराए के कमरे में रहे। अब हवाई पट्टी निवासी अपनी बेटी के घर के पास बने बाड़े में रहने को मजबूर हैं।

बुजुर्ग दंपती को कानून का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने इस संबंध में कोतवाली थाने में बेटे अशोक और बहू पूजा के खिलाफ मामला दर्ज करवाना चाहा, लेकिन पुलिस ने उनकी नहीं सुनी। इसके बाद एसपी को ज्ञापन दिया तो थाने में मामला दर्ज हुआ। जिसमें उन्हें उनके घर पर वापस कब्जा दिला कर बेटे-बहू को घर से बेदखल करने की मांग भी रखी, लेकिन पुलिस ने भी हाथ खड़े कर दिए। यहां तक कि मारपीट की धाराओं के संबंध में पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टे 30 जुलाई को मामले में FR तक लगा दी। पुलिस ने बुजुर्ग पति-पत्नी को कानून की जगह समाज का सहारा लेने की नसीहत तक दे डाली। राजस्थान संपर्क और हेल्पलाइन नंबर 181 के माध्यम से परिवाद नंबर 082106710644104 भी दर्ज करवाया, लेकिन कोई नतीजा सामने नहीं है।

बेटे ने घर से निकाला, अब रिश्तेदार धमका रहे, आत्महत्या की नौबत
भींयाराम ने आरोप लगाया कि अशोक कुमार का साला रामप्रताप छाबा और उसका एक दोस्त मूलाराम गुर्जर पुलिस में है। इस वजह से पुलिस ने एकतरफा रुख अपनाया। यहां तक कि FIR में घर का कब्जा वापस दिलाने की जो बात बुजुर्ग दंपती ने रखी थी, वह भी पुलिस ने हटा दी। इसके बाद मामला SDM कोर्ट में चला गया। मामले में SDM सहित कलेक्टर और SP को शिकायत दी, जिसमें पीड़ित बुजुर्गों ने रिश्तेदार खेड़ापा थाना अंतर्गत छिंडिया निवासी रामसुख गोदारा और उसके छोटे भाई ओमाराम गोदारा, मोरनावड़ा निवासी रेवंत राम की ओर से जान से मारने की धमकी की बात बताते हुए उन्हें पाबंद करने की मांग की। इन पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब बेटे-बहू रिश्तेदारों और समाज के माध्यम से बुजुर्ग दंपति को लगातार धमका रहे हैं। भींयाराम ने बताया कि कानून और प्रशासन की तरफ से कोई सुनवाई नहीं होने के चलते अब आत्महत्या की नौबत आ गई है।

SDM बदले पर तकदीर नहीं
मामले को लेकर परिवादी भींयाराम और उनकी पत्नी रामप्यारी ने कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन देने के बाद 6 जुलाई को तत्कालीन एसडीएम अमित चौधरी को भी ज्ञापन दिया था। दूसरी तरफ कोतवाली से भी यह मामला यहां पर पहुंच गया था। इसमें पीड़ितों ने मांग दोहराई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसी दौरान एसडीएम अमित चौधरी का तबादला हो गया। उनकी जगह सुनील पवार ने 1 अगस्त को नागौर एसडीएम के पद पर कार्यभार संभाला। भींयाराम ने आरोप लगाया कि एसडीएम सुनील पवार ने पहले कानूनी रूप से मामले को हल करने की बात कही। 4 अगस्त को जब दोनों बुजुर्ग दंपती उनसे मिलने गए तो एसडीएम ने समाज और परिवार के माध्यम से मामले का निपटारा करने की नसीहत दे डाली।

बेवजह बढ़ रही तारीख पर तारीख
मामले में नागौर एसडीएम ने सबसे पहले फैसले के लिए 9 सितंबर की तारीख दी। इसके बाद इसे बेवजह आगे टरका कर 23 सितंबर की तारीख दे दी गई। उस दिन भी फैसला नहीं दिया और सारे बयान सहित अन्य काम पूरे होने के बावजूद फैसला 30 सितंबर पर टाल दिया। यहां तक कि 30 सितंबर को भी फैसला नहीं दिया। 8 अक्टूबर की तारीख दे दी। भींयाराम के अनुसार वह दिन भर एसडीएम का इंतजार करते रहे। शाम को आने के बाद एसडीएम ने 11 अक्टूबर की तारीख दे दी। साथ ही उन्हें सिविल कोर्ट में जाने की सलाह भी। इस दौरान आरोपी अशोक कुमार ने मामले को षडयंत्र पूर्वक सिविल कोर्ट में लाकर घर के बेचान या अन्य काम रोकने के लिए स्टे की अपील कर दी है। जबकि एसडीएम ने मामले में लगातार बेवजह तारीख पर तारीख देकर परिवादी को न्याय से दूर रखा।

एक्सपर्ट व्यू -
लीगल एक्सपर्ट एडवोकेट भारत भूषण पारीक ने बताया कि वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण अधिनियम 2007 कहता है कि बुजुर्ग दंपती को रखने के साथ ही उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी बेटी की होती है। अधिनियम में पैरा 22 के अनुसार वरिष्ठ नागरिकों के जीवन के साथ उनकी संपत्ति की सुरक्षा भी सरकार या उसके नुमाइंदों के जिम्मे है। पुत्र पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा मांग सकता है, लेकिन पिता के खुद के कमाए हुए स्वामित्व वाले हिस्से में नहीं। इस संबंध में पावर एसडीम के पास होती है। जब घर के दस्तावेज बुजुर्गों के नाम है तो एसडीएम को 90 दिन में आदेश पारित करके पुत्र और पुत्रवधू को घर से बाहर निकालना पड़ेगा और माता-पिता को वापस कब्जा दिलाना होगा। इसके साथ ही पुत्र और पुत्रवधू को जेल में भी भेजा जा सकता है। हाल ही में कोलकाता हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया है कि माता-पिता जब चाहे स्व अर्जित संपत्ति, घर में से पुत्र और पुत्रवधू को बेदखल कर सकते हैं। कानपुर के पुलिस कमिश्नर ने 1 अगस्त को ऐसे ही मामले में अपने स्तर पर कार्रवाई करते हुए पुत्र और पुत्रवधू को 14 दिन के लिए जेल में डाल दिया और उनके मां-बाप को घर का कब्जा दिलवाया।

SDM बोले- घर का कब्जा दिलाने को लेकर मेरे पास पावर नहीं
SDM सुनील पवार का इस मामले में कहना है कि परिवादियों का इस संबंध में उनके न्यायालय में मामला विचाराधीन है। कोई भी राजनीतिक प्रेशर नहीं है। सामाजिक माध्यम से मामले को सुलझाने के लिए नहीं कहा था। कानूनी रूप से 11 अक्टूबर को मामले का फैसला दूंगा। मामले में भरण पोषण अधिनियम के तहत तो कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन उनकी मांग के अनुसार घर का कब्जा दिलाने को लेकर मेरे पास पावर नहीं है। मैंने इस संबंध में अग्रिम कार्रवाई के लिए SHO को भी निर्देशित कर दिया है।

इनपुट : श्रवण श्रीमाली

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