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पर्यावरण के लिए एक फौजी पेड़ पर ‘तैनात':रिटायर्ड फौजी ने सैकड़ों पेड़ लगाए, इनके बीच रहने के लिए 5 साल पहले खेजड़ी पर बनाया घर

नागौर2 महीने पहलेलेखक: मनीष व्यास

सदी की सबसे बड़ी महामारी कोरोना में पिछले दिनों देशभर में ऑक्सीजन की कमी के चलते आपने पेड़ों के नीचे उपचार ले रहे मरीजों के कुछ फोटो देखे होंगे। आज हम आपको एक ऐसी जगह लेकर चलते हैं, जिन्होंने आज से करीब 5 साल पहले ही इसकी महत्ता को समझ लिया था। उन्होंने इसे समझा ही नहीं बल्कि प्रकृति से दूर होते युवाओं को भी इसे जोड़े रखने के लिए पेड़ों से जुड़े रहने के लिए इसका निर्माण कराया।

हर साल हरियाली अमावस पर यहां बच्चों के लिए ट्री फेयर भी करते है, ताकि बच्चे और युवा इस जगह को देखें तो उन्हें नेचर का सुखद अहसास हो। पर्यावरण के लिए अपने स्तर पर इस मुहिम को शुरू करने वाली शख्सियत भी बेहद खास हैं, जिन्होंने पहले देश की सरहद पर हमारी सुरक्षा की और रिटायरमेंट के बाद अब हमारे बीच पर्यावरण की सुरक्षा का जिम्मा संभाले हुए हैं।

रेंवतसिंह राठौड़ ने बंजर पड़ी जमीन पर सैकड़ों पेड़ उगाए।
रेंवतसिंह राठौड़ ने बंजर पड़ी जमीन पर सैकड़ों पेड़ उगाए।

सेना से रिटायरमेंट के बाद रेंवतसिंह बने पर्यावरण प्रहरी
जिले के सिरसु गांव निवासी रेंवतसिंह राठौड़ भारतीय सेना में इंजीनियरिंग विंग में हेड कॉन्स्टेबल थे। 2008 में रिटायरमेंट के बाद गांव पहुंचे थे। उन्हें शुरू से ही प्रकृति से विशेष लगाव था। इसके चलते उन्होंने यहां उन्होंने पौधारोपण और पेड़ों की सुरक्षा को लेकर विशेष प्रयास किए। गांव में बंजर सी पड़ी अपनी जमीन पर उन्होंने कड़ी मेहनत कर सैकड़ों पेड़ उगाए। आज ये सभी वृक्ष बन चुके हैं। इनमे जैतून, सागवान, अनार, आंवला, गुन्दा, बैर, खेजड़ी और पोपुलर नाम के पेड़ शामिल हैं।

5 साल पहले खेजड़ी पर बनाया आशियाना।
5 साल पहले खेजड़ी पर बनाया आशियाना।

5 साल पहले खुद के लिए खेजड़ी पर बनाया आशियाना
रेंवतसिंह बताते है कि तक़रीबन 5 साल पहले उन्होंने शान्ति और सुकून से प्रकृति के बीच अपना समय व्यतीत करने के मकसद से इन्हीं पेड़-पौधों की हरियाली के बीच खेजड़ी के पेड़ पर एक छोटा घर बनाया। हालांकि रेंवतसिंह इसे बॉर्डर का बंगला बताते हैं। इनका मानना है कि इसके अंदर किसी भी भौतिक सुख सुविधाओं वाले कमरे के जैसा ही अहसास होता है। यहां धूप नहीं आने और हर समय ठंडी हवा आने से गर्मी का तो अहसास ही नहीं होता है। वे बताते हैं कि इसके अंदर चैन से नींद आती है ।

रेंवतसिंह राठौड़।
रेंवतसिंह राठौड़।

चार साल पहले बच्चों के लिए ट्री फेयर भी शुरू किया
रेंवतसिंह ने बताया कि चार वर्ष पूर्व उन्होंने बच्चों और युवाओं को पेड़-पौधों कि महत्ता बताने और पेड़ों पर बनाए इस आशियाने से रूबरू करवा उनमे पर्यावरण प्रेम जगाने के मकसद से यहां हरियाली अमावस्या पर ट्री फेयर लगाना शुरू किया। इस दौरान बच्चों को यहां नेचर का सुखद अहसास करवाया गया। उन्होंने बताया कि पिछले दो साल से कोरोना गाइडलाइन के चलते फेयर नहीं लग पाया है पर कोरोना खत्म होने के बाद फिर से ट्री फेयर की शुरुआत की जाएगी। रेंवतसिंह ने बच्चों को सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराने के लिए यहां पुराने हल, पुराने वाध्ययंत्र और कई पुरातन सामग्री भी जमा की हुई है, जिसकी वे ट्री फेयर के दौरान प्रदर्शनी लगाते है।

बच्चो को सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराने के लिए पुराने हल और पुरातन सामग्री भी है।
बच्चो को सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराने के लिए पुराने हल और पुरातन सामग्री भी है।