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श्रीरामदेव पशु मेला:नागौर के नराधणा व बलाया गांव बैल पालन पुश्तैनी धंधा, यहां के बैल मजबूत कद-काठी की नस्ल के कारण पशु मेले की बढ़ा रहे शान

नागौर11 दिन पहलेलेखक: ओमप्रकाश खिलेरी
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बैल के साथ नराधणा के किशनाराम। - Dainik Bhaskar
बैल के साथ नराधणा के किशनाराम।
  • दूध पिला बैलों को बच्चों की तरह पाल रहे 35 वर्ष में किशनाराम बेच चुके हैं 55 जोड़ी
  • एक बैल पर रोज खाने का खर्च 700 रुपए, बलाया के सोनू-मोनू की जोड़ी सबसे महंगी

श्रीरामदेव पशु मेले में वैसे तो बैलों की जोड़ियां एक से बढ़कर एक पहुंची है। मगर...इन सबके बीच मजबूत कद-काठी के कारण देश-दुनिया में पहचान रखने वाले नागौरी नस्ल के वो बैल भी पहुंचे हैं जो यूपी, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, एमपी सहित कई राज्यों के व्यापारियों को इन दिनों लुभा रहे है।

पशुपालक व्यापारियों के सामने अपने बैलों की चलने की चाल दिखाकर उनकी खासियत से रूबरू करवा रहे है। दरअसल,नागौर के नराधणा और बलाया जैसे गांवों के कई ऐसे पशुपालक है जो चार से पांच पीढ़ियों से नागौरी बैलों की नस्ल तैयार कर है। जमाना भले ही मशीनीकरण का है, मगर यह पशुपालक पशु मेले में 25 से 30 वर्ष से बैलों की जोड़ियां लेकर पहुंच रहे है। मेले की पहचान ऐसे ही बैलों के कारण बनी हुई है।

नराधणा : नागौर का पहला गांव, जहां सर्वाधिक पालते है बैल

यह नराधणा के पशुपालक किशनाराम नराधणियां है। उम्र 70 वर्ष है, मगर 35 वर्ष में विभिन्न मेलों में 110 बैल बेच चुके है। अब तक खुद यह उनका अपने आप में रिकॉर्ड है। 2018 में 1.10 लाख में बैल की जोड़ी इसी मेले में बेच चुके है। वो बताते है कि उनका पीढ़ियों से बैल पालना ही पश्तैनी काम है। बच्चाें की तरह बड़े होने के बाद भी बैलों को सुबह-शाम 2-2 किलाे दूध पिलाने सहित तिलों को तेल भी दे रहे है। मेले में पहुंचे नराधणा के अर्जुनराम लौहार बताते है कि वो अब तक 100 से ज्यादा बैल बेच चुके हैं।
विशेष क्या

जिले का नराधणा पहला ऐसा गांव है, जहां सर्वाधिक बैलों को पशुपालक पीढ़ियों से पालते आ रहे है। यहां के बैलों में नागौरी नस्ल की झलक साफ झलकती है। यही वजह है कि 2018 में 80 , 2019 में 60 तो इस बार शानदार जोड़ियां 30 बैलों के तौर पर पहुंची है। गांव के बैल पशु प्रतियोगिता की अलग-अलग कैटेगरी में गत 10 वर्ष से लगातार प्रथम आने से पुरस्कार जीतते आ रहे है।

बलाया : 30 वर्ष से नागौरी बैल इनके घर की शान, काला परिवार बेच चुका 80 जोड़ियां

बैल के साथ बलाया के निंबाराम काला।
बैल के साथ बलाया के निंबाराम काला।

बलाया के निंबाराम, पुरखाराम काला गत 30 वर्षों से नागौरी नस्ल के बैल पाल रहे है। अब तक विभिन्न मेलों में 80 से ज्यादा जोड़ियां बेच चुके है। निंबाराम बताते है कि बैल पालना उनके परिवार के लिए शौक बन चुका है। भले ही अब खेती बैलों से नहीं करते, मगर छोटे बच्चों की तरह बछड़ों को पालकर बड़ा करते है और बेचने को मेले में पहुंचते है। वो इस बार लेकर पहुंचे पांच जोड़ी में सवा लाख की बैलों की जोड़ी सोनू-मोनू सबसे खास है। मेले में प्रत्येक बैल की डाइट पर रोज 700-800 रुपए खर्च रहे हैं।
विशेष

बलाया के निंबाराम, पुरखाराम व भगतराम काला के बैलों की जोड़ियां अपने मजबूत कद-काठी के चलते विभिन्न कैटेगरी में हर वर्ष प्रथम पुरस्कार ले जाती है। 2000 से 2020 तक इनके बैलों की 2, 4, 6 व 8 दंत जोड़ियां प्रथम रहे चुकी है।

बैलों की यह डाइट

1. सोनू-मोनू को प्रतिदिन सुबह-शाम 2-2 किलो के हिसाब से कुल 4 लीटर दूध पिला रहे हैं। 2. सुबह-शाम ज्वार व मूंग का 5-5 किलो हरा चारा पशुपालकों की तरफ से दिया जा रहा हैं। 3. सुबह-शाम 5 किलो बाजरी व खल का बांटा भी सोनू-मोनू को दिया जा रहा हैं। 4. मैथी व गेहूं का उबला दलिया, सुबह-शाम आधा-आधा किलो गुड़ भी दिया जा रहा हैं। 5. प्रतिदिन-250 तिलों की तेल भी खिलाया जा रहा हैं।

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