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श्रमदान का अनूठा उदाहरण:रायमलवाड़ा गांव में 225 ट्रैक्टरों के माध्यम से गोचर भूमि को सेवण घास की बुवाई के लिए कर दिया तैयार

जोधपुर2 दिन पहले
जोधपुर के रायमलवाड़ा गांव में गोचर भूमि में खड़ाई करने पहुंचे 225 ट्रैक्टर।
  • गांव के एक हजार बीघा गोचर को किया जा चुका है तैयार
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जिले के रायमलवाड़ा गांव के लोगों ने शनिवार को श्रमदान का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। इन लोगों ने सामूहिक रूप से 225 टैक्टरों के माध्यम से गांव में उजाड़ पड़ी 700 बीघा गोचर भूमि पर सेवण घास लगाने के लिए चंद घंटों में खड़ाई कर दी। इन ग्रामीणों ने दिखा दिया कि सिर्फ सरकारी सहायता पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं पहल करे तो गांव का उद्धार हो सकता है। रायमलवाड़ा गांव में 1800 बीघा ओरण-गोचर भूमि है। इस भूमि पर बबूल लगा होने से अन्य प्रजाति की घास का नामोनिशन तक नहीं था। ऐसे में गांव के पशुओं को भोजन की तलाश में भटकना पड़ रहा था। गांव के कुछ युवाओं ने कुछ दिन पूर्व पहल कर 300 बीघा भूमि पर सेवण घास की बुवाई कर दिखा दिया था कि सामूहिक प्रयास से कुछ भी किया जाना संभव है। इसके बाद गांव के लोगों ने एकत्र हो गोचर भूमि का सुधार करने का फैसला किया।

रायमलवाड़ा में गोचर भूमि का सुधार करने पहुंचे लोग।

रायमलवाड़ा और आसपास के गांवों से 225 लोग अपने-अपने ट्रैक्टर लेकर आज गांव के ओरण में आ डटे। ओरण में आज मेले जैसा माहौल था। सभी ने अपने ट्रैक्टरों के माध्यम से खड़ाई कर वहां उगे बबूल को पूरी तरह से साफ कर दिया। इसके बाद खड़ाई कर जमीन को सेवण घास की बुवाई के लायक बना दिया। अगले कुछ दिन में यहां पर सेवण घास की बुवाई कर दी जाएगी। इस तरह गांव में अब एक हजार बीघा भूमि पर सेवण घास उगना शुरू हो जाएगी। ग्रामीणों का कहना था कि एक बार सेवण घास लग जाएगी तो पशुओं के लिए चारे का हमेशा के लिए समाधान हो जाएगा। कुछ गांवों से लोग यहां किए जा रहे श्रमदान को देखने के लिए भी पहुंचे। ताकि इसी तर्ज पर वे अपने गांव की ओरण में पशुओं के लिए सेवण घास की बुवाई कर सके। उल्लेखनीय है कि जैसलमेर जिले के सीमावर्ती क्षेत्र सेवण घास का बहुत बड़ा मैदान था। यहां की सेवण घास पशुओं के लिए बहुत पौष्टिक और बेहतर मानी जाती थी। अकाल के दौर में इन मैदानों की सेवण घास के दम पर पशुपालकों का आसानी से गुजारा हो जाता था। इंदिरा गांधी नहर आने के बाद वहां खेती होना शुरू हो गई और सेवण घास के मैदान समाप्त हो गए। इस कारण पशुपालकों के समक्ष संकट खड़ा हो गया। अब रायमलवाड़ा के लोगों ने अनुकरणीय पहल कर लोगों के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है कि सभी अपने गांवों के ओरण का इस तरीके से बेहतर उपयोग कर सकते है। मारवाड़ के अधिकांश गांवों में आज भी ओरण भूमि सुरक्षित है।

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