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जयपुर मेयर विवाद में हाईकोर्ट से मिलेगा सरकार को झटका:एक्सपर्ट बोले, सरकार ने बिना सुने फैसला सुनाया; ये संविधान के विपरीत, पहली सुनवाई में ही स्टे मिलने की संभावना

जयपुर6 महीने पहले

राजस्थान के इतिहास में पहली बार सरकार ने किसी नगर निगम के मेयर को निलंबित किया है। जयपुर नगर निगम ग्रेटर मेयर और तीन पार्षदों को निलंबित करने के बाद प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया है। भाजपा ने सरकार के इस फैसले की तुलना इमरजेंसी काल से की है। दैनिक भास्कर ने इस मामले में लॉ एक्सपर्ट से यह समझने की कोशिश की कि आखिर इस पूरे मामले में आगे क्या हो सकता है?

मेयर के निलंबन के बाद जयपुर नगर निगम ग्रेटर में बंद पड़ा मेयर का चैम्बर।
मेयर के निलंबन के बाद जयपुर नगर निगम ग्रेटर में बंद पड़ा मेयर का चैम्बर।

लॉ एक्सपर्ट ने पूरी तरह गलत माना
सरकार के इस निर्णय को कानून से जुड़े एक्सपर्ट गलत मान रहे हैं। इनके अनुसार सरकार के इस निर्णय पर हाईकोर्ट की पहली सुनवाई में ही स्टे मिलने की संभावना है, क्योंकि इस मामले में सरकार ने विभागीय जांच तो बैठा दी, लेकिन एक तरफा पक्ष सुनते हुए मेयर और पार्षदों की कोई सुनवाई नहीं की। ऐसे मामलों में सरकार को हाईकोर्ट से झटका लग सकता है।

  • सीनियर एडवोकेट और कानून के जानकार पूनम चंद्र भंडारी के अनुसार सरकार अगर कोई भी जनप्रतिनिधि को किसी शिकायत पर निलंबित करती है तो उससे पहले उस प्रतिनिधि को नोटिस जारी करके उसका पक्ष लिखित या मौखिक तौर पर सुना जाता है। इसके बाद आगे की कार्यवाही की जाती है, लेकिन जिस तरह से मीडिया में खबरें आ रहे है कि मेयर या तीनों पार्षदों का पक्ष सुने बिना ही उनको निलंबित कर दिया। ऐसे मामले में कोर्ट से चारों को राहत मिल सकती है। कानून में ये प्रावधान है किसी भी विवाद पर निर्णय से पहले आरोप लगाने वाले और जिन पर आरोप लगा है उन दोनों पक्षों की सुनवाई होती है।
  • एडवोकेट सुरेन्द्र सिंह नरूका का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट भी ये कहता है कि हर उस व्यक्ति को सुनवाई का एक मौका देना चाहिए, जिसके खिलाफ सरकार या न्यायपालिका कोई कार्यवाही करती है। पक्ष सुने बिना एक तरफा फैसला करके कार्यवाही करना संवैधानिक नहीं है। उन्होंने कहा कि जब मेयर और पार्षदों ने पत्र लिखकर सुनवाई के लिए समय मांगा तो सरकार को ऐसी क्या जल्दी थी कि अवकाश के समय कोरोनाकाल में एक दिन के अंदर ही इतनी बड़ी कार्यवाही कर दी।
  • एडवोकेट विकास सोमानी का कहना है कि यह प्राकृतिक न्याय सिद्धांत के खिलाफ और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। जनता की ओर से चुने गए किसी भी जनप्रतिनिधि को इस तरह से बिना सुनवाई किए हटाना संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है। ऐसे मामले में पीड़ितों को न्यायालय से राहत मिलने की पूरी संभावना है।
4 जून को मेयर-कमिश्नर के बीच हुए विवाद के बाद मचे बवाल को देखते हुए नगर निगम में पुलिस फोर्स तैनात की थी।
4 जून को मेयर-कमिश्नर के बीच हुए विवाद के बाद मचे बवाल को देखते हुए नगर निगम में पुलिस फोर्स तैनात की थी।

तीन पॉइंट में पढ़िए, सरकार और मेयर के बीच विवाद

  1. जयपुर नगर निगम ग्रेटर मेयर सौम्या गुर्जर और निगम कमिश्नर यज्ञमित्र सिंह के बीच ये विवाद 4 मई को शुरू हुआ था, जब डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण करने वाली कंपनी BVG के भुगतान की एक फाइल पर चर्चा के लिए दोनों के बीच मेयर के चैम्बर में बैठक हुई। इस बैठक में जब दोनों के बीच हॉट-टॉक हुई तो कमिश्नर बैठक से बाहर आने लगे। वहां मौजूद कुछ पार्षदों ने दरवाजे पर कमिश्नर को हाथ पकड़कर रोक लिया। कमिश्नर ने इस मामले में 3 पार्षदों अजय सिंह चौहान, पारस जैन और शंकर शर्मा के खिलाफ मारपीट का आरोप लगाते हुए ज्योति नगर थाने में मुकदमा दर्ज करवाया।
  2. अगले दिन 4 मई देर रात इस मामले में नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल ने जांच के आदेश दिए और स्वायत्त शासन निदेशालय ने क्षेत्रीय उपनिदेशक को जांच सौंपी। उपनिदेशक ने 5 जून को मेयर को पत्र लिखकर उसी दिन दोपहर 3 बजे तक अपने बयान देने के लिए कहा। मेयर ने पत्र लिखकर इसके लिए समय मांगा। उपनिदेशक ने 6 जून दोपहर 2 बजे तक बयान देने का समय दिया। मेयर के नहीं आने पर देर शाम 6 बजे उपनिदेशक ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी और देर रात 11:30 बजे आदेश जारी कर मेयर को निलंबित कर दिया।
  3. मेयर और कमिश्नर के बीच इससे पहले दो बार विवाद हो चुका है, जब नगर निगम समितियों का गठन कमिश्नर ने गैरकानूनी मानते हुए सरकार को रिपोर्ट दी थी। इसके अलावा 22 मई को विद्याधर नगर से कच्ची बस्ती हटाने के मामले में भी मेयर और कमिश्नर के बीच विवाद हुआ था।

पहले भी सरकार को लग चुका है झटका
इससे पहले भी सरकार को नगर निगम समितियों के गठन मामले में झटका लग चुका है। नगर निगम में जब बोर्ड से समितियों का गठन होकर मंजूरी के लिए राज्य सरकार को पास प्रस्ताव गया था, तब सरकार ने सभी समितियों को नियमों के विपरीत मानते हुए निरस्त कर दिया था। तब सरकार के इस फैसले को मेयर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां से हाईकोर्ट ने मेयर की याचिका पर सुनवाई के बाद सरकार के फैसले को स्टे कर दिया था।

मेयर ने की कोर्ट जाने की तैयारी
मेयर सौम्या गुर्जर ने सरकार के फैसले के खिलाफ कोर्ट में जाने की तैयारी कर ली है। उन्होंने आज मीडिया से बात करते हुए कहा कि हम इस मामले में कोर्ट का दरवाजे पर जाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार जिस तरह आधी रात को मेरे ऑफिस का तमाम स्टाफ, सुरक्षाकर्मी हटा दिए और निलंबन के आदेश जारी कर जनप्रतिनिधियों को हटा दिया ये साफ दर्शाता है कि सरकार नहीं चाहती की जनप्रतिनिधि नगर निगम में रहे। अगर इतना ही है तो सरकार को प्रशासक के जरिए ही प्रदेश की सभी निकायों को चला लेना चाहिए।

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