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‘थार बायोस्फीयर रिज़र्व’ बनाने की कवायद तेज़:रेगिस्तान के दुर्लभ जीव-जंतुओं और पेड़ पौधों को बचाएगा यूनेस्को, वन विभाग ने तैयार किया प्रोजेक्ट, फोटो में देखिए दुर्लभ रेगिस्तानी जीव-जंतुओं की दुनिया

जयपुर5 महीने पहले
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यूनेस्को के कंट्री हेड के साथ वन विभाग के वरिष्ठ अफसर - Dainik Bhaskar
यूनेस्को के कंट्री हेड के साथ वन विभाग के वरिष्ठ अफसर

पश्चिमी राजस्थान में ‘थार बायोस्फ़ीयर रिज़र्व’ बनाने की कवायद तेज हो गई है। यूनेस्को की मदद से दुर्लभ रेगिस्तानी जीव-जंतुओं को एक बडे क्षेत्र में सुरिक्षत रखने के लिए सेंचुरी की तर्ज पर ही उस क्षेत्र को विकसित किया जाएगा। वन विभाग ने इसके लिए प्राजेक्ट तैयार किया है, यूनेस्को इसके लिए फंड और तकनीकी मदद देगा। यूनेस्को के कंट्री हेड एरिक फाल्ट और वन विभाग की प्रमुख सचिव श्रेया गुहा के बीच इस पर बैठक हो चुकी है।

यूनेस्को के मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम के तहत राजस्थान के जैसलमेर-बाड़मेर इलाके में स्थित डेज़र्ट नेशनल पार्क में यह बायोस्फीयर रिज़र्व बनाने की राजस्थान सरकार के वन विभाग की लम्बे समय से मांग चली आ रही है। इसके बायोस्फीयर रिज़र्व बनने से यूनेस्को यहां वित्तीय मदद करेगा। राजस्थान में एक भी बायोस्फीयर पार्क फिल्हाल नहीं है। थार में इसके बनने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्र को अलग पहचान मिलेगी। साथ ही यहां रहने वाले समुदायों को भी इंसेंटिव्स मिलने लगेंगे। जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार आएगा।

वन विभाग की प्रमुख सचिव श्रेया गुहा ने बताया कि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने थार बायोस्फीयर रिज़र्व पर एक परियोजना दस्तावेज तैयार करने के लिए 1988 में टास्क फोर्स का गठन किया था। 2017 में बायोस्फीयर रिज़र्व के लिए प्रस्ताव पेश किया गया।थार बायोस्फीयर रिजर्व योजना लागू करने से क्षेत्र के लोगों की आजीविका और रहन सहन पर कोई पाबंदी नहीं लगेगी।

बायोस्फीयर रिज़र्व के लिए जो प्रस्तावित क्षेत्र हैं यहां कई दुर्लभ प्रजाति के जीव-जन्तु रहते हैं। आइए तस्वीरों के माध्यम से बताते हैं उनके बारे में-

गोडावण- गोडावण राजस्थान का राज्य पक्षी है। यह एक बड़े आकार का पक्षी है, जो भारत में राजस्थान और सीमावर्ती पाकिस्तान में पाया जाता है। उड़ने वाले पक्षियों में यह सबसे अधिक वज़नी पक्षी है। बड़े आकार के कारण यह शुतुरमुर्ग जैसा लगता है।

गोडावन।
गोडावन।

चिंकारा- जिसे भारतीय गजेला भी कहा जाता है। हिरण जैसा दिखने वाला चिंकारा दक्षिण एशिया में पाया जाने वाला एक प्रकार का हिरण है। यह भारत,बांग्लादेश के घास के मैदानों और मरुभूमि में पाया जाता है। साथ ही ईरान और पाकिस्तान के कुछ इलाकों में भी यह पाया जाता है। गर्मियों में इसकी खाल का रंग लाल-भूरा होता है और पेट व अंदुरुनी टांगों का रंग हल्का भूरा लिये हुए सफ़ेद होता है। सर्दियों में यह रंग और गहरा हो जाता है। इसके चेहरे के किनारों में आँख के किनारे से नथुनों तक एक काली धारी होती है।जिसके किनारे में सफ़ेद धारी होती है। इसके सींग होते हैं। यह शर्मीला प्राणी इन्सानी आबादी से बचता रहता है। बिना पानी के यह लम्बे समय तक रह सकता है। हालांकि यह एकाकी प्राणी है। लेकिन कभी-कभी ये झुण्ड में भी पाये जाते हैं।

चिंकारा।
चिंकारा।

शमल भृंग या गोबड़ैला- शमल भृंग , गुबरैला या 'गोबड़ैला' जिसे अंग्रेज़ी में डंग बीटल कहते हैं। यह एक भृंग यानी बीटल है। जो अपना पोषण आंशिक रूप से या पूरी तरह मल से करता है।

बीटल।
बीटल।

स्टैपी ईगल- यह बाज की प्रजाति का पक्षी है। यह एसीपीट्रिडी एक्यूला की निपालैन्सीस वर्ग में आने वाला प्रवासी पक्षी है, जो सर्दियों के मौसम में भारत के अलग-अलग हिस्सों में यूरोप, कजाकिस्तान, मंगोलिया और चीन आदि देशों से आता है। भारत में यह गैर प्रजनन समय में आते हैं। ये पक्षी ख़ास तौर पर घास के मैदानों, अर्ध मरूभूमि, धान के खेत और खुले जंगलों में रहना पसंद करते हैं। यह एक बड़ा शिकारी पक्षी है। ये गहरे भूरे रंग के होते हैं। इसके उड़ने वाले पंख और पूंछ के पंखों पर सफेद रंग की धारी होती हैं। इसके पांव पर पंख होते हैं। इनके शरीर के आकार के हिसाब से इनका सिर छोटा होता है। इसकी चोंच का ऊपरी हिस्सा पीला होता है और इसके पंजे बड़े और पीले रंग के होते हैं। बाज की यह प्रजाति ताज़ा मरे हुए जानवरों को खाती है। साथ ही चूहे और घास के मैदानों में पाये जाने वाले खरगोश, गिलहरियों को भी ये अपना शिकार बनाते हैं। ये एक मौक़ापरस्त शिकारी पक्षी है, जो शिकार के लिए कई प्रकार की तकनीकों का प्रयोग करता है। ये पक्षी शिकार को ऊपर उड़ते हुए अचानक अपने मजबूत और नुकीले पंजों से वार कर उसे उठाकर उड़ा ले जाता है। कई बार यह अपने शिकार का इंतजार उसके बिल के सामने ठहरकर भी करता है। जैसे ही शिकार बाहर आता है ये उसको तुरंत पकड़ लेता है।

ईगल।
ईगल।

तिलोर- हुबारा बस्टर्ड यानी तिलोर पक्षी शर्मीला लेकिन खूबसूरत होता है और आकार में टर्की चिड़िया जैसा दिखता है। यह हर साल सर्दियों के दिनों में मध्य एशिया से उड़कर भारत में राजस्थान और पाकिस्तान की ओर जाते हैं। इनका शिकार होने के कारण वन्य जीव संरक्षण के तहत इनके शिकार पर रोक है। हल्की बादामी रंग के इन पक्षियों हुबारॉ को वन्य जीवों की प्रवासी प्रजातियों से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय संधि जिसे बॉन संधि कहा जाता है,उसमें भी शामिल किया गया है।

तिलोर।
तिलोर।

कांटेदार पूंछ वाली छिपकली (सांड़ा)- स्पाई-टेल्ड लिज़र्ड या सांडा सरिसृपों में छिपकली की एक प्रजाति है। यह प्रजाति भारत और पाकिस्तान में पाई जाती है। राजस्थान में थार का रेगिस्तान, गुजरात का कच्छ और आसपास के शुष्क क्षेत्रों में पैच में यह पाई जाती है। सांडा पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में पाई जाने वाली छिपकली है, जो मरुस्थलीय खाद्य शृंखला में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन आज अंधविश्वास और अवैध शिकार के चलते यह घोर संकट का सामना कर रही है। अंध विश्वास के कारण इस जीव का बड़ी संख्या में अवैध शिकार किया जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप इनकी आबादी तेज़ी से घट रही है।

सांडा।
सांडा।

रेगिस्तानी लोमड़ी - डेज़र्ट फॉक्स और बच्चे इस तस्वीर में दिखाई दे रहे हैं। राजस्थान के रेगिस्तानी भू भाग में यह विशेष किस्म की लोमड़ी पायी जाती है। हालांकि ऊंटों के बाद रेगिस्तान की लोमड़ियों में भी मेंज बीमारी फैल रही है। जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में कई लोमड़ियां मेंज से पीड़ित देखी गई हैं। यह दुर्लभ प्रजाति के जंगली जानवरों की श्रेणी में आती है। लोमड़ी शाकाहार और मांसाहार दोनों पर निर्भर करती है।

जंगली लौमड़ी। परिवार सहित।
जंगली लौमड़ी। परिवार सहित।
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