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राजस्थान में डिजिटल इमरजेंसी:सरकार ने करोड़ों लोगों से छीना इंटरनेट का मौलिक अधिकार, ये सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर का उल्लंघन

जयपुर8 महीने पहलेलेखक: समीर शर्मा
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उदयपुर मर्डर के बाद गहलोत सरकार ने राजस्थान में इंटरनेट बैन कर दिया है। ये डिजिटल इमरजेंसी है। 1975 में इंदिरा गांधी सरकार से अलग, पर मौलिक अधिकार तो छीना ही गया है। 1975 में कोई सरकार के खिलाफ न कुछ बोल सकता था, न लिख सकता था। देश अदृश्य जेल में था। आम आदमी के सारे अधिकार सस्पेंड कर दिए गए थे।

47 साल बाद राजस्थान में वैसा ही माहौल है। उदयपुर मामले में पुलिस का फेल्योर सामने आ चुका है, लेकिन उसकी सजा आम लोगों को इंटरनेट बंद करके दी जा रही है। पिछले दो दिन से करोड़ों राजस्थानी डिजिटल कैद झेल रहे हैं। नेटबंदी के नाम पर सरकार ने मौलिक अधिकार छीन लिए हैं।

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सरकार अगर इंटरनेट को फंडामेंटल राइट (मौलिक अधिकार) नहीं मानती तो उसे सुप्रीम कोर्ट की जनवरी 2020 में की गई टिप्पणी दोबारा पढ़नी चाहिए, जिसमें कहा गया है- इंटरनेट संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत लोगों का मौलिक अधिकार है। यानी यह जीने के हक जैसा ही जरूरी है। इंटरनेट को अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं किया जा सकता।

ये पहली बार नहीं है, हर बार सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए इंटरनेट बंदी को ही हथियार बना रही है। पेपर लीक नहीं रोक पाते तो इंटरनेट बंद। इंटेलिजेंस फेल्योर के कारण करौली, जोधपुर में दंगे होते हैं तो इंटरनेट बंद। उधर, एमपी में भी हाल ही में दंगे हुए, लेकिन वहां इंटरनेट 1 मिनट के लिए भी बंद नहीं हुआ। कश्मीर के बाद राजस्थान दूसरा राज्य है, जहां सबसे ज्यादा इंटरनेट बंद होता है।

अफवाहें रोकने के लिए नेटबंदी, लेकिन सोशल मीडिया ऐप नहीं
अब सवाल ये है कि सरकार ने इंटरनेट बंद क्यों किया? अफवाहें या धार्मिक भावना भड़काने वाले मैसेज रोकने के लिए? लेकिन वो तो अब भी नहीं रुक रहे, क्योंकि सरकार ने इंटरनेट बंद किया है, ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया ऐप नहीं।

अफवाहें फैलाने वाले अब भी ब्रॉडबैंड कनेक्शन की मदद से सोशल मीडिया पर जहर उगल रहे हैं। राजस्थान में बड़ी संख्या में ब्रॉडबैंड यूजर्स हैं।

सरकार अगर सोशल मीडिया ऐप बंद कर देती तो अफवाहें फैलाने का या धार्मिक जहर फैलाने का हर जरिया बंद हो जाता, लेकिन सरकार ने इंटरनेट बंद करने का रास्ता चुना जिसकी खामियाजा करोड़ों राजस्थानी भुगत रहे हैं। सरकार को नेटबंदी का दर्द जानना है तो उन कैब ड्राइवर से मिलना चाहिए, जिनकी रोजी-रोटी दो दिन से छिनी हुई है, या फूड डिलीवरी बॉय जो दो दिन से काम नहीं कर पा रहा, या वो 6 करोड़ लोग जो 2 दिन में 120 करोड़ रुपए का नुकसान झेल चुके हैं।

समझिए सरकार के इस बेतुके फैसले के नुकसान

40 हजार लोगों को ट्रैवलिंग में परेशानी, 5 हजार कैब ड्राइवर की कमाई रुकी
जयपुर, कोटा, उदयपुर सहित राजस्थान के कई शहरों में कैब सर्विस हैं। इन 5 हजार कैब में रोज 40 हजार लोग सफर करते हैं। इंटरनेट बंद होने से दोनों को परेशानी झेलनी पड़ी।

2.5 लाख से अधिक बेरोजगार परेशान
राजस्थान में गुरुवार को लैब असिस्टेंट भर्ती परीक्षा का अंतिम चरण था, जिसमें 2.5 लाख बेरोजगार प्रदेश के कई जिलों के विभिन्न परीक्षा केंद्रों में पहुंचे। जयपुर जैसे जिलों में अभ्यर्थी कैब बुक नहीं कर पाए तो कहीं जगह लोकेशन ढूंढ़ने में परेशानी का सामना करना पड़ा।

6 करोड़ मोबाइल यूजर्स का 120 करोड़ का डेटा लॉस
राजस्थान में 6.28 करोड़ मोबाइल इंटरनेट यूजर्स हैं। अलग-अलग कंपनियों के इंटरनेट प्लान का औसत निकाला जाए तो 1 दिन का इंटरनेट का खर्च होता है 10 रुपए। इस हिसाब से इन यूजर्स को 2 दिन में 120 करोड़ का नुकसान हो चुका है। नुकसान का आंकड़ा और भी बढ़ सकता है, क्योंकि अभी तय नहीं है, इंटरनेट कब चालू होगा।

600 करोड़ का डिजिटल लेनदेन प्रभावित
राजस्थान में आमजन सहित बड़े व्यापारी सहित रोज 600 करोड़ से अधिक का डिजिटल लेनदेन करते हैं। इंटरनेट बंद होने से लोग डिजिटल पेमेंट नहीं कर पाए। यही वजह है कि एटीएम के बाहर आम दिनों से ज्यादा भीड़ थी।

30 सर्विसेज चार दिन से बंद
डेबिट, क्रेडिट कार्ड भुगतान सिस्टम, ई वॉलेट ट्रांजेक्शन, मूवी टिकट बुकिंग, मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग, ऑनलाइन टैक्सी सर्विस, ऑनलाइन होम डिलीवरी, ऑनलाइन फूड ऑर्डर, पानी, बिजली के बिल जमा, ऑनलाइन शॉपिंग, होटल बुकिंग, फ्लाइट बुकिंग, रेल यात्रा बुकिंग, कार्ड स्वाइप मशीन, ऑनलाइन मॉन्यूमेंट बुकिंग, मनी ट्रांसफर सहित 30 से ज्यादा सर्विसेज चार दिन से बंद हैं।

ये तरीके अपनाते तो न अफवाहें फैलतीं, न लोग परेशान होते

बंद कर सकते हैं सोशल मीडिया प्लेटफार्म : इंटरनेट का हर जिले में राउटर्स सेटअप होता है। यहां से आसानी से राउटर्स सेटअप करके टेलीग्राम, वॉट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल साइट्स को ब्लॉक कर सकते हैं, लेकिन इसके बजाय सरकार ने पूरा मोबाइल नेटवर्क बंद कर दिया। एक्सेस कंट्रोल लिस्ट से केवल सोशल साइट्स को ही ब्लॉक कर परेशानी खत्म हो सकती है।

ब्लॉक कर सकते हैं की-वड्‌र्स : हर वेबसाइट के अलग-अलग की-वड्‌र्स होते हैं। आउटर एंड पर जाकर आपत्तिजनक की-वड्‌र्स को ब्लॉक कर सकते हैं। एक्सेस कंट्रोल करके कौन सा कंटेट जाना है और कौन सा नहीं, ये पूरी तरह तय किया जा सकता है।

ब्लैक लिस्ट कर सकते हैं: इंटरनेट यूज करने के दो तरीके होते हैं, ब्लैक लिस्ट और व्हाइट लिस्ट। इसके जरिए सरकार तय कर सकती है कि कौन सी वेबसाइट या ऐप को ब्लैक लिस्ट करना है और किसे व्हाइट लिस्ट।

10 साल में 86 से ज्यादा बार इंटरनेट बंद
राजस्थान की जनता को डिजिटल इमरजेंसी की सजा देना सरकारों की आदत बन गई है। राजस्थान में हाल ही करौली, जोधपुर, भीलवाड़ा दंगों और अब उदयपुर घटना के बाद नेटबंदी हुई है। वहीं, लोग परीक्षाओं को लेकर भी लगातार नेटबंदी की मार झेल रहे हैं। पिछले 30 दिनों के दौरान ही 3 जिलों में इंटरनेट बंद किया जा चुका है। जम्मू कश्मीर के बाद राजस्थान में ही सबसे अधिक 10 सालों में 86 से अधिक बार नेटबंदी हुई।

MP दंगों में 1 मिनट बंद नहीं हुआ नेट
मध्यप्रदेश के खरगोन में 10 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस के दौरान दंगा भड़का। वहां तीन दिन कर्फ्यू रहा। इसके बाद ईद पर भी कर्फ्यू लगाया, लेकिन एक भी दिन इंटरनेट बंद नहीं किया।

क्या कहते हैं कारोबारी?

  • राजस्थान चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के एल जैन का कहना है कि नेटबंदी से रोजाना 5 से 6 हजार करोड़ रुपए तक का कारोबार प्रभावित है। नेटबंदी से रोजाना के मुकाबले 40 फीसदी से भी कम लेन-देन या कारोबार ही बच पाता है।
  • फेडरेशन ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्रीज (फोर्टी) के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल और वहीं एक दिन की नेटबंदी राज्य सरकार के खजाने में 500 करोड़ रुपए जाने से रोक देती है। बाद में गतिविधियां सामान्य होने पर ही ये राशि सरकार तक पहुंचती है।
  • फेडरेशन ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री यूथ विंग के अध्यक्ष धीरेंद्र राघव सहित लगभग सभी व्यापारिक संस्थाओं का कहना है कि सरकार को नेटबंदी के बजाय कोई और उपाय सोचने चाहिए।

सांप्रदायिक सद्भाव को ध्यान में रखकर नेटबंदी का निर्णय: सरकार
मुख्यमंत्री कार्यालय का इस मामले में कहना है कि प्रदेश में लोगों की सुरक्षा तथा साम्प्रदायिक सद्भाव को ध्यान में रखकर नेटबंदी का निर्णय लिया जाता है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए संभागीय आयुक्त स्थानीय माहौल देखकर नेटबंदी का निर्णय ले रहे हैं। लीजलाइन एवं ब्रॉडबेंड पर इंटरनेट की सेवाएं यथावत चालू हैं, जिससे आवश्यक सेवाएं बाधित नहीं हो रही हैं। हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकानेर एवं चूरू में शुक्रवार को नेट बंदी नहीं रहेगी।

एक्सपर्ट बोले- ये सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट को आधारभूत सुविधा माना है। ऐसे में नेटबंदी के आदेश गलत हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना है। नेटबंदी से अपराध और अफवाह नहीं रोके जा सकते। सरकार को इन्हें रोकने के लिए अलग तैयारी की जरूरत है। सरकार को जन सुविधा के लिए नेटबंदी के बजाय अन्य उपाय सोचने चाहिए। -दीपक चौहान, वकील, राजस्थान हाईकोर्ट

कार्टूनिस्ट चंद्रशेखर हाड़ा की नजर से कुछ और कार्टून में देखिए नेटबंदी कैसे हमारी लाइफ पर डाल रही असर

सभी कार्टून, चंद्रशेखर हाड़ा, जयपुर।
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