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भास्कर एक्सक्लूसिव3 चेहरों ने 6 दिन पहले लिखी बगावत-2 की स्क्रिप्ट:पहले से तय था गहलोत की 4 मांगें हाईकमान नहीं मानता तो 'इस्तीफा पॉलिटिक्स'

जयपुर2 महीने पहलेलेखक: निखिल शर्मा

राजस्थान में सियासी संकट पार्ट-2 की शुरुआत हो चुकी है। रविवार को हुआ घटनाक्रम इस बात का सबूत है कि कांग्रेस में चुनाव के बाद से चली आ रही गुटबाजी अब भी जारी है। CM अशोक गहलोत के अध्यक्ष पद के नामांकन से पहले नए CM को लेकर रविवार को बैठक बुलाई गई।

अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे ऑब्जर्वर के रूप में रायशुमारी के लिए आए, लेकिन यह बैठक नहीं हो पाई। ऑब्जर्वर की बैठक से ठीक पहले UDH मंत्री शांति धारीवाल के यहां विधायक पहुंचना शुरू हुए। कुछ तय हो पाता, इससे पहले ही राजस्थान कांग्रेस के 70 से ज्यादा विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी को इस्तीफे सौंप दिए।

ये दिखने में सब कुछ अचानक जैसा लग रहा था, लेकिन हकीकत ये है कि सियासी बगावत पार्ट-2 की यह स्क्रिप्ट आज से 6 दिन पहले लिखी जा चुकी थी। सब कुछ तय था कि आलाकमान CM अशोक गहलोत की मांगें मानता है तो क्या करना है और मांगें नहीं मानी जाती हैं तो क्या कदम उठाए जाएंगे।

पढ़िए- राजस्थान में आए इस सियासी संकट की स्क्रिप्ट किसने और कब लिखी...

20 सितंबर: 21 सितंबर को सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी से मुलाकात से पहले CM गहलोत ने 20 सितंबर की देर रात विधायक दल की बैठक बुलाई। इसमें यह तय हो गया था कि हाईकमान के कहने पर गहलोत अध्यक्ष तो बन जाएंगे, लेकिन उनकी ओर से कुछ मांगें होगीं। यदि आलाकमान यह मांगें नहीं मानता है तो फिर विधायकों की मर्जी से पूरे मामले पर निर्णय लिया जाएगा।

बैठक में दे दिया था इशारा: विधायकों की बैठक में गहलोत ने कहा था- मैं आखिरी बार राहुल गांधी से मिलकर उन्हें मनाने का प्रयास करूंगा, अगर राहुल नहीं माने तो फिर हाईकमान का जो आदेश होगा, उसके लिए आपको तकलीफ दूंगा।

गहलोत के इस बयान पर विधायकों ने कहा- आपको यहीं पर रहना है। इस पर गहलोत ने कहा- मैं कुछ भी बन जाऊं, लेकिन आपसे दूर नहीं रहूंगा, अंतिम सांस तक राजस्थान की सेवा करूंगा। गहलोत ने बैठक में विधायकों से कहा कि आपके इलाके से जुड़ी जो भी मांगे हैं, वो पूरी होंगी। बजट जल्दी आ सकता है।

विधायक दल की बैठक के पांच दिन बाद ये घटनाक्रम हो गया। गहलोत-विधायकों के बीच हुई बातचीत यह समझने के लिए काफी है कि वो क्या मैसेज देना चाहते हैं ?

वे मांगें जिनकी वजह से विवाद बढ़ा
अशोक गहलोत की ओर से हाईकमान के सामने 4 मांगें रखी गईं, मगर हाईकमान ने इन मांगों को मानने से इनकार कर दिया। इससे गहलोत और उनके समर्थकों को यह साफ हो गया कि हाईकमान इस मामले में अब उनकी नहीं सुन रहा है। ऐसे में अगर गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष बनते भी हैं, तब भी यह जरूरी नहीं की उनकी बातें पूरी तरह मानी ही जाएं।

जानिए वो चार मांगें कौन सी थीं...

पहली : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बनें, गहलोत राजस्थान ही संभालें
गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना चाहते थे। ये बात वे खुद कई बार कह चुके हैं। इसके अलावा गहलोत के कई करीबी लोगों ने भी भास्कर को बताया कि गहलोत हमेशा कहते थे कि वे दिल्ली नहीं जाना चाहते। वे राजस्थान में ही रहना चाहते हैं। गहलोत ने ये बात हाईकमान के सामने रखी, मगर उनकी बात नहीं मानी गई। हाईकमान ने गहलोत को अध्यक्ष बनने के लिए जोर दिया।

दूसरी : गहलोत अगर अध्यक्ष बने तो मुख्यमंत्री भी वही बने रहें
हाईकमान की बात पर गहलोत अध्यक्ष बनने के लिए राजी हो गए। हालांकि, उन्होंने यह बात रखी कि अगर उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाता है तो वे तैयार हैं, लेकिन वे मुख्यमंत्री भी बने रहना चाहेंगे। इसके लिए भी हाईकमान राजी नहीं हुआ। राहुल गांधी ने केरल में मीडिया से बातचीत में यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस में एक व्यक्ति एक पद का ही नियम लागू होगा। उदयपुर में हुए चिंतन शिविर और उसमें लिए गए संकल्पों के आधार पर ही पार्टी चलेगी।

तीसरी : गहलोत इस्तीफा दें तो उनका ही कोई विश्वस्त नेता CM बने
इस मसले को लेकर सोनिया गांधी से भी गहलोत की बात हुई। कुछ महीने पहले चिंतन शिविर में तय हुए संकल्पों को ध्यान में रखते हुए कहा गया कि अगर गहलोत दोनों पदों पर रहते हैं तो यह पार्टी के लिए ठीक नहीं होगा। गहलोत इसके लिए भी माने, लेकिन शर्त थी- अगर वे मुख्यमंत्री पद से हटते हैं तो उन्हीं के किसी विश्वसनीय व्यक्ति को CM बनाया जाए। उनकी इस बात को भी हाईकमान ने नकार दिया।

चौथी : पहले नामांकन हो, चुनाव हो और फिर इस्तीफा लिया जाए
यह वो बात थी, जिससे इस पूरे मसले को लेकर स्थितियां संभल सकती थीं। गहलोत ने कहा था कि नामांकन भरने और अध्यक्ष बनने के बाद वे इस्तीफा देंगे। इसके लिए भी हाईकमान राजी नहीं हुआ। डिक्लेरेशन से पहले ही गहलोत से इस्तीफे की बात कही गई और नए मुख्यमंत्री के तौर पर पायलट का नाम आगे कर दिया गया।

हाईकमान को यह अंदेशा था कि अगर गहलोत अध्यक्ष बन गए तो उसके बाद कई तरह के अधिकार उनके पास होंगे। ऐसे में उन्हें इस्तीफा देने या किसी और निर्णय के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा। ऐसे में हाईकमान जल्द से जल्द चुनाव से पहले ही नया मुख्यमंत्री बनाना चाहता था। इसके लिए पायलट के नाम का मैसेज विधायकों में भेज भी दिया था।

जो दिखाया वो नहीं, जो रविवार को हुआ वो हकीकत थी
गहलोत के सोनिया और राहुल गांधी से मिलने के बाद भी समीकरण नहीं बैठे तो उन्होंने बयानों और बॉडी लैंग्वेज से यह दिखाया कि वे पूरी तरह हाईकमान और गांधी परिवार के कहे अनुसार ही चलेंगे। उन्होंने खुद CM पद छोड़ने और नया CM बनाने के संकेत दिए।

गहलोत खेमे के नेता और करीबी नेताओं ने बताया कि रविवार से पहले जो हुआ वह हकीकत नहीं थी। ये इसलिए क्रिएट किया गया था ताकि ये न लगे कि रविवार को जो विरोध हुआ उसमें गहलोत की कहीं मर्जी थी या गहलोत के कहने पर हुआ। जबकि जो रविवार को हुआ वह पिछले पांच दिनों की हकीकत थी। आखिर बड़ी संख्या में इस्तीफे सौंप दिए गए।

तैयार हुआ विधायकों की मर्जी वाला हथियार
गहलोत खेमे की मांगें नहीं माने जाने की स्थिति में गहलोत खेमे ने विधायकों की मर्जी और लोकतंत्र वाला हथियार तैयार किया। पिछले दिनों हुई बातचीत में गहलोत खेमे के एक विधायक जो कभी पायलट के करीबी हुआ करते थे ने भास्कर से कहा था कि पार्टी में लोकतंत्र है और उसी अनुसार आगे भी स्थितियां तय होंगी।

पहले भी विधायकों की मर्जी से ही CM बनाया गया था, अब भी जो विधायक कहेंगे उसी अनुसार तय होगा। हाईकमान की बात सुनी जाएगी, मगर होगा वही जो विधायक चाहेंगे। यही रविवार को हुआ, मैसेज देने की कोशिश की गई कि विधायकों की मर्जी कुछ और है। जो विधायकों की मर्जी हो, वही किया जाना चाहिए।

पंजाब की तरह निर्णय लेना चाहती थी कांग्रेस
राजस्थान में कांग्रेस उसी तरह वर्किंग करना चाहती थी जिस तरह पंजाब में की थी। हाईकमान गहलोत को प्रमोट कर अध्यक्ष बनाना चाहता था। वहीं पायलट को राजस्थान का CM बना इस लड़ाई को खत्म करना चाहता था। हाईकमान चाहता था कि बातें आगे बढ़ें, इससे पहले ही जल्द से जल्द नया CM बनाकर तमाम विवादों को खत्म कर दिया जाए। राजस्थान में स्थितियां जमीनी तौर पर अलग थीं।

पंजाब में जहां अमरिंदर के पास विधायक नहीं थे, वहीं राजस्थान में गहलोत के पास विधायकों की मजबूत संख्या है। ऐसे में राजस्थान में पंजाब की तरह हाईकमान अपना निर्णय लागू नहीं करवा पाया और विधायक यहां विरोध में उतर आए।

CM पद नहीं छोड़ना चाहते गहलोत
गहलोत को इस बात का पहले से पता था कि अगर वे अध्यक्ष बने तो उन्हें CM पद छोड़ना पड़ेगा, लेकिन वे इसके लिए कभी तैयार नहीं थे। यही बात थी कि अध्यक्ष पद पर उनका नाम सामने आने के बाद से ही लगातार उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की। नाम सामने आने के बाद गहलोत ने पूरे राजस्थान में दौरे किए।

ग्रामीण ओलिंपिक के जरिए उन्होंने प्रदेश के लगभग सभी इलाकों में लोगों को साधा। इसके बाद जब PCC के सदस्य बनाए गए तो इसमें भी बड़ी संख्या में अपने ही लोगों को सदस्य बनाया, ताकि भविष्य में कोई भी ऐसा मौका आए तो वे मजबूत रह सकें।

घटनाक्रम के 3 सबसे बड़े चेहरे
रविवार को हुए इस घटनाक्रम की स्क्रिप्ट तो पहले ही लिखी जा चुकी थी, मगर इसका एग्जीक्यूशन पिछले दो दिन में हुआ। इसमें कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, UDH मंत्री शांति धारीवाल और खाद्य मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने सबसे अहम भूमिका अदा की। डोटासरा और खाचरियावास तनोट माता दर्शन के दौरान भी गहलोत के साथ थे।

प्रताप सिंह खाचरियावास
खाचरियावास बगावत के बाद से ही पायलट के खिलाफ खुलकर बोलते आए हैं। शनिवार को जब सब कुछ शांत और व्यवस्थित दिख रहा था, तभी खाचरियावास ने मीडिया को बुलाया और गहलोत के समर्थन में बयान दिया। यह भी स्पष्ट किया कि राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन नहीं हो और गहलोत को ही CM रखा जाए। ये बयान रविवार को हुए घटनाक्रम को जस्टिफाई करने और उसकी नींव तैयार करने के लिए था, जिससे यह बताया जा सके कि विधायकों में असंतोष है।

शांति धारीवाल
विधायकों को एकजुट करने के लिए किसी सीनियर और मजबूत नेता की जरूरत थी। यह जिम्मा शांति धारीवाल ने संभाला। विधायकों को उनके घर एकजुट किया गया। धारीवाल को इसलिए भी यह जिम्मेदारी दी गई ताकि अगर हाईकमान गहलोत की जगह किसी और नेता को लाना चाहे तो यह बताया जा सके कि धारीवाल के यहां सभी नेता एकजुट हैं। धारीवाल सीनियर भी हैं, ऐसे में उन्हें CM बनाया जा सकता है। धारीवाल UDH मंत्री हैं। ऐसे में वे सरकार और संगठन के लिए कई मायनों में बड़े महत्वपूर्ण हैं।

गोविंद सिंह डोटासरा : केरल और दिल्ली दौरे पर गहलोत डोटासरा को साथ लेकर चले। यह मैसेज देने की कोशिश की गई कि यदि कोई बात बिगड़ती है तो डोटासरा को चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट किया जा सकता है। डोटासरा गहलोत के नजदीकी हैं, पर्दे के पीछे रणनीति तैयार करने में धारीवाल, खाचरियावास के साथ उनकी अहम भूमिका मानी जाती है, लेकिन वे सीधे तौर पर कभी भी कहीं नहीं दिखे। यह भी साफ नहीं हो पाया है कि वे मौजूदा हालत में किस पक्ष के साथ है। उन्होंने अब तक कोई बयान भी जारी नहीं किया है।

ये भी कयास : राजस्थान को लेकर राहुल-प्रियंका और सोनिया एकमत नहीं
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सियासी जानकारों का यह भी कहना है कि राजस्थान को लेकर गांधी परिवार भी एकमत नहीं है। माना जा रहा है कि अगर राजस्थान में गहलोत के रहते इतना बड़ा घटनाक्रम हुआ है तो इसके पीछे कोई न कोई बड़ी वजह होगी।

ऐसा भी कहा जा रहा है कि राहुल और प्रियंका गांधी जहां गहलोत काे अध्यक्ष बनाकर पायलट को CM बनाने के मूड में हैं, वहीं सोनिया गांधी पंजाब में हुई स्थिति को देखते हुए इसके लिए शायद पूरी तरह राजी न हों। गहलोत सोनिया के करीबी हैं ऐसे में यह संभावना भी पैदा हुई है कि राजस्थान को लेकर गांधी परिवार एकमत है या नहीं।

4 साल पहले दिया बयान आज सार्थक
साल 2018...करीब 4 साल पहले। उदयपुर में कांग्रेस की एक बैठक में प्रभारी अविनाश पांडे की मौजूदगी में गहलोत ने बयान दिया था, 'मैं था सूं दूर कोनी।' जब विधानसभा चुनाव में सरकार बनी और आखिरकार गहलोत ही मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने अपने ही एक और बयान से इसे सार्थक कर दिया। तब एक कार्यक्रम में गहलोत ने कहा था कि मैं जादूगर ही हूं तभी माली समुदाय का व्यक्ति 3 बार मुख्यमंत्री बन गया। ये बगैर जादू संभव नहीं होता।

रविवार को हुए इस घटनाक्रम से ठीक पहले गहलोत ने कहा कि था कि मैं तो अगस्त में ही हाईकमान को बता चुका था कि अगला चुनाव जीतना बहुत जरूरी है। राजस्थान का चुनाव जीतना बहुत आवश्यक है, बड़ा राज्य राजस्थान ही बचा है कांग्रेस के पास।

अगर राजस्थान में जीतेंगे तो कांग्रेस का सब राज्यों में चुनाव जीतना शुरू हो जाएगा। एक प्रकार से मजबूती आएगी कांग्रेस के अंदर। मेरा अध्यक्ष बनना तो अभी नाम चलने लगा है, उससे पहले मैं हाईकमान को कह चुका हूं कि अगला चुनाव उसके नेतृत्व में लड़ा जाए, जिससे चुनाव जीतने की संभावना बढ़ जाए। चाहे वो मैं हूं या मुझसे ज्यादा कोई दूसरा है तो उसका चयन कर लो और सरकार बनाओ, चुनाव जीतना हमारे लिए आवश्यक है।

गहलोत ने रविवार के घटनाक्रम से कुछ घंटे पहले यह बयान दिया। कयास लगाए जा रहे थे कि वे ये बताना चाहते थे कि राजस्थान बेहद जरूरी राज्य है। अगर अगली बार यहां सरकार लानी है तो अभी राजस्थान में छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। वहीं अगर हाईकमान किसी और को राजस्थान में लाना चाहता है तो वह 2023 के विधानसभा चुनाव से ही हो। उससे पहले राजस्थान में कोई बदलाव नहीं किया जाए।

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