भगवान कृष्ण के पड़पोते ने बनाई थी ये मूर्ति:चेहरा बिल्कुल कन्हैया जैसा माना जाता है; जयपुर रियासत के महाराजा कहलाते थे

जयपुर3 महीने पहलेलेखक: नीरज शर्मा
आराध्य देव श्रीगोविंददेवजी हैं जयपुर के राजा और ठिकानेदार कहलाते हैं।

श्री गोविंद देवजी चरण…सवाई जय सिंह शरण।

यह लाइन हमेशा जयपुर रियासत में कही जाती थी, क्योंकि माना जाता था कि जयपुर रियासत को चलाने वाले गोविंद देवजी हैं (जो आज भी जयपुर के आराध्य हैं)। यह राजघराने की आस्था व श्रद्धा भी थी।

जब तक जयपुर रियासत रही, इसके ठाकुर और ठिकाना- गोविंद देवजी ही रहे। यहां के राजा खुद को दीवान मानते थे।

यही वजह रही कि उस समय चलने वाले सिक्के, मोहरें और दूसरे डॉक्युमेंट पर गोविंद देवजी के नाम से मोहर लगती थी।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर पढ़िए जयपुर के आराध्य गोविंद देवजी का साक्षात कृष्ण से क्या है कनेक्शन और उनसे जुड़े कुछ रोचक किससे...

पंडित गोपाल नारायण बहुरा के अनुसार पूर्व जयपुर राज्य के राजस्थान प्रदेश में विलीन होने के बाद स्वर्गीय महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय ने अपने पहले सार्वजनिक भाषण में कहा था-

'राज्य तो श्री गोविंद देवजी का है और उन्हीं का रहेगा। हम तो उनके दीवान की तरह काम करते रहे हैं और आगे भी उनकी प्रेरणा के अनुसार प्रजा की भलाई के कामों में लगे रहेंगे।'

पंडित गोपाल नारायण ने बताया कि वे जब भी देश से बाहर यात्रा पर जाते थे या वहां से लौटते थे तो गोविंद देवजी और शिलामाता के दर्शन के लिए जरूर जाते थे। जयपुर के महाराजा गोविंद देवजी को जयपुर राज्य का सच्चा शासक और अपना राजा मानते थे।

मंदिर महंत अंजन कुमार गोस्वामी श्री गोविंद देव जी का अभिषेक करते हुए।
मंदिर महंत अंजन कुमार गोस्वामी श्री गोविंद देव जी का अभिषेक करते हुए।

सरकारी रिकॉर्ड में भी ठिकानेदार श्री गोविंद देवजी
जयपुर में गोविंद देवजी रजिस्टर्ड ठिकानेदार हैं। इसकी गवाही सरकारी रिकॉर्ड भी देते हैं। श्री गोविंद देवजी मंदिर ठिकाना के नाम से राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग में बाकायदा रजिस्टर्ड है।

मंदिर के पूर्व महंत गोस्वामी प्रद्युम्न कुमारजी ने इस ठिकाने को 1972 में देवस्थान विभाग में सार्वजनिक न्यास के रूप में रजिस्टर करवाया था।

10 हजार से ज्यादा पोशाक, रोजाना बदलते हैं वस्त्र
ठिकाना गोविंद देवजी के वार्डरोब में करीब 10 हजार से ज्यादा पोशाक हैं। गोविंद देवजी को रोजाना नई पोशाक धारण करवाई जाती है।

ठाकुर जी को सर्दियों में साफा और गर्मियों में जयपुरी पगड़ी पहनाई जाती है। नए वस्त्र मंगला आरती के बाद पहनाए जाते हैं।

जब उनका सोने का समय होता है तो गर्मियों में धोती-दुपट्टा और सर्दियों में रुई वाला अंगरखा पहनाया जाता है। असली सोने-चांदी के गोटे बनी रत्नों से जड़ी पोशाक हर साल अन्नकूट महोत्सव पर भी धारण करवाई जाती है।

हर त्योहार पर विशेष रंग की पोशाक
जन्माष्टमी पर पीली, सावन में गुलाबी लहरिया, ऋषि पंचमी पर पचरंगी, होली पर फाल्गुनी, तीज पर लाल, छोटी तीज को हरी, अमावस्या को काली, पूर्णिमा को सफेद, एकादशी पर लाल, मकर संक्रांति पर पतंगों और डोर की सजावट के साथ रंग-बिरंगी, दीपावली पर पीली-सुनहरी पोशाक धारण करवाई जाती है।

अब जानिए, गोविंद देवजी की मूर्ति का साक्षात कृष्ण से रिश्ता

पहले आमेर घाटी में विराजे थे ठाकुरजी
अप्रैल 1669 में जब औरंगजेब ने शाही फरमान जारी कर ब्रजभूमि के देव-मंदिरों को गिराने और उनकी मूर्तियों को तोड़ने-खण्डित करने का हुक्म दिया, तो वहां की सभी प्रधान मूर्तियां सुरक्षा के लिए दूसरी जगह ले जाई गईं। माध्वीय-गौड़िया सम्प्रदाय के गोविंद देव, गोपीनाथ, मदनमोहन, राधा दामोदर और विनोदीलाल, ये पांचों स्वरूप जयपुर आए।

इनमें गोविंद देवजी पहले आमेर की घाटी के नीचे विराजे और जयपुर बसने पर जय निवास की बारहदरी में बैठे।

(जयपुर नगर के इतिहास में ए.के.राय के अनुसार)
(जयपुर नगर के इतिहास में ए.के.राय के अनुसार)
वंशानुगत ज्योष्ठाधिकार परम्परा के अनुसार गोस्वामी परिवार के बड़े पुत्र मंदिर गोविन्द देवजी और इसके तहत आने वाले उत्तरप्रदेश के वृन्दावन, जयपुर और कामां के सभी मंदिरों के अकेले सेवा करने वाले अधिकारी होते चले आ रहे हैं।
वंशानुगत ज्योष्ठाधिकार परम्परा के अनुसार गोस्वामी परिवार के बड़े पुत्र मंदिर गोविन्द देवजी और इसके तहत आने वाले उत्तरप्रदेश के वृन्दावन, जयपुर और कामां के सभी मंदिरों के अकेले सेवा करने वाले अधिकारी होते चले आ रहे हैं।

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