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NCW की पूर्व अध्यक्ष ममता शर्मा का इंटरव्यू:जब तक महिलाओं के प्रति समाज की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक महिला दिवस महज खानापूर्ति

जयपुर9 महीने पहलेलेखक: गोवर्धन चौधरी
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राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रही ममता शर्मा का मानना है कि समाज में महिलाओं को लेकर मानसिकता में बदलाव के लिए कैंपेन चलाने की जरूरत है। महिलाओं के प्रति जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलती, तब तक महिला दिवस और महिला सप्ताह महज खानापूर्ति है। ममता शर्मा ने भास्कर से महिला सुरक्षा, महिला अधिकार, समान वेतन और समान काम जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की। यहां पेश है चुनिंदा अंश...

महिला आयोग अब तक महिला हितों की रक्षा करने में कितने कामयाब रहे?
ममता शर्मा: महिला आयोग में जब मैं अध्यक्ष थी उस वक्त निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा के लिए 1000 करोड़ का फंड देने की घोषणा की थी। 2014 में मेरा कार्यकाल पूरा होने तक वह फंड नहीं मिला था। निर्भया फंड कहीं पर भी ढंग से खर्च नहीं हो रहा है। महिला आयोग को महिलाओं की सुरक्षा, उनके सशक्तिकरण पर 360 डिग्री काम करना होगा। महिला आयोगों को जागरूकता पर फोकस करना होगा। महिला आयोग को केवल सुनवाई और आदेश जारी करने तक ही सीमित नहीं रख सकते। अब बढ़ती चुनौतियों के बीच कई मोर्चों पर काम करने की जरूरत है। राज्य महिला आयोग अध्यक्षों को सरकार से मिलकर फंड समय पर जारी करने की मांग करनी चाहिए।

महिलाओं को लेकर समाज का नजरिया कितना बदला है, आपका क्या मानना है?
ममता शर्मा: मेरा मानना है कि महिलाओं को लेकर समाज की मानसिकता में बदलाव के लिए जागरूकता जरूरी है। जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलती तब तक सात दिन महिला सप्ताह और 8 मार्च को महिला दिवस मनाना महज खानापूर्ति है। सिंबोलिज्म से काम नहीं चलने वाला। आज देखिए महिलाओं के प्रति किस कदर अपराध हो रहे हैं। छह साल की बच्ची से लेकर 70 साल तक की महिला से दुष्कर्म हो रहे हैं, यह गिरावट की पराकाष्ठा नहीं है तो और क्या है? मुझे लगता है कि हमें बच्चों को शुरू से ही संस्कार देने होंगे।

महिलाओं को राजनीतिक स्तर पर भी उतनी भागीदारी नहीं मिलती, इसके लिए क्या किया जाए?
ममता शर्मा: महिलाओं को हर क्षेत्र की तरह राजनीतिक क्षेत्र में भी पूरी भागीदारी नहीं मिली है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण अब तक नहीं मिला है। 33 फीसदी आरक्षण की लंबे समय से मुहिम चल रही थी। बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में अटक गया। आप देखिए राजनीतिक दलों में महिलाओं को आज 10 फीसदी टिकट नहीं मिलते। राजस्थान में ही देख लीजिए, 200 विधानसभा सीटों में से 20 महिलाओं को टिकट देने में भी कितना मुश्किल और संघर्ष होता है। पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में आरक्षण की वजह से महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन अब लोकसभा-विधानसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू होना समय की मांग है।

जेंडर बजटिंग का कांसेप्ट आया,लेकिन उसकी पालना नहीं हुई?
ममता शर्मा: जेंडर बजटिंग समय की मांग है। विभागवार जेंडर बजटिंग होनी ही चाहिए। महिलाओं के उत्थान के बिना आप देश प्रदेश को आगे नहीं बढ़ा सकते। महिलाएं सशक्त, समझदार और आत्मनिर्भर होंगी तो देश-प्रदेश भी मजबूत होगा। हम आधी आबादी को यूं ही कैसे छोड़ सकते हैं। एक महिला सशक्त, आत्मनिर्भर होगी तो पूरा परिवार ही नहीं कई घरों पर उसका असर पड़ता है। हमें जेंडर बजटिंग पर फोकस करना होगा।

महिलाओं के लिए टॉप प्रायरिटी में किस क्षेत्र में काम हो?
ममता शर्मा: हमें महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता में रखना होगा। आज भी महिलाएं बेखौफ होकर बाहर नहीं जा सकतीं। महिला सुरक्षा बड़ा मुद्दा है। इस पर अभी बहुत काम किए जाने की जरूरत है। महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की घटनाएं बहुत भयावह तस्वीर पेश कर रही हैं। हमारा सिस्टम अब भी महिलाओं को सुरक्षा देने में सफल नहीं हो पाया है।

महिलाओं को समान काम-समान वेतन की बात आज भी उठती है, आपको क्या लगता है?
ममता शर्मा : सरकारी क्षेत्र में तो वेतन को लेकर पुरुष और महिला में कोई भेदभाव नहीं है, लेकिन गैर सरकारी क्षेत्र में आज भी यह मुद्दा है। जो महिलाएं मनरेगा, असंगठित मजदूरी या कुली का काम करती हैं उन्हें पुरुषों से कम पैसा दिया जाता है। आंगनबाड़ी वर्कर्स को बहुत कम वेतन दिया जाता है। समान काम के बदले समान वेतन दिया जाए। यह मूलभूत अधिकार है, लेकिन भेदभाव हो रहा है। इस मामले में हमें अभी भी बहुत काम करने की आवश्यकता है।

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