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लोकसभा में सवाल लगाकर गायब हुए नेताजी की लगी क्लास:सत्ताधारी पार्टी को जल्द नया मुख्यालय मिलेगा, रिटायर्ड अफसर को 14वें एक्सटेंशन की तैयारी

जयपुर8 महीने पहलेलेखक: गोवर्धन चौधरी
  • हर शनिवार पढ़िए और सुनिए ब्यूराक्रेसी और राजनीति से जुड़े अनसुने किस्से

प्रधानमंत्री के साफ निर्देशों के बावजूद लोकसभा में सवाल लगाकर भी मौजूद नहीं रहने वाले नौ सांसदों में से एक राजस्थान के भी थे। पश्चिमी राजस्थान से आने वाले सांसद का लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवाल लगा था लेकिन समय पर पहुंच नहीं पाए। बात ऊपर तक पहुंची। चर्चा है कि संसदीय कार्य मंत्री ने नेताजी की जमकर खबर भी ली। सांसद अब उस घटना को भुलाना चाहते हैं लेकिन राजनीति में घटनाओं को भूलने कौन देता है। सवाल लगाकर समय पर नहीं पहुंचने की घटनाओं पर कई बार विवाद हो चुके हैं।

सत्ताधारी पार्टी को जल्द नया मुख्यालय मिलेगा
सत्ताधारी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय का पता बदलने की तैयारी शुरू हो गई है। अस्पताल रोड पर दो बंगलों को मिलाकर कार्यालय के लिए अलॉट करने की तैयारी है। फिलहाल दोनों बंगलों में मेंटेनेंस का काम चल रहा है। जब सब कुछ अप टू द मार्क हो जाएगा, तब सरकारी कागजों में इसे पार्टी के नाम अलॉट किया जाएगा। सत्ताधारी पार्टी का मौजूदा दफ्तर भीड़भाड वाली जगह पर है। नेताओं ने भी राय दी है कि सत्ता में आए हैं तो कम से कम पार्टी का ऑफिस तो ढंग का हो। सर​कार के संकटमोचक मंत्री को पार्टी की प्रदेश भर की पोपर्टीज को संभालकर एक ट्रस्ट में लाने की जिम्मेदारी दे रखी है। राजधानी से लेकर जिलों तक सत्ताधारी पार्टी के भी खुद के मालिकाना हक वाले दफ्तर होंगे।

रिटायर्ड अफसर को 14 वें एक्सटेंशन की तैयारी

दिल्ली में तैनात राजस्थान के एक रिटायर्ड अफसर के टिकाऊपन की काबिलियत से हर कोई हैरान है। उनके रिटायर होने के बाद तीन सरकारें बदल चुकी हैं, लेकिन वे पद पर बरकरार हैं। दिल्ली में गाड़ी बंगला सहित सभी सुविधाएं भी बरकरार हैं। अब तक 13 एक्सटेंशन मिल चुके हैं, 14 वें की तैयारी है। राजनीति से लेकर ब्यूराक्रेसी तक में रिटायर्ड अफसर को इतने एक्सटेंशन मिलने पर सब हैरान हैं। आम तौर पर दो एक्सटेंशन मिलना भी बड़ी बात होती है, यहां तो 14 वें एक्सटेंशन की तैयारी है। इस उम्र में तो राजनीति में भी होते तो टिकट नहीं मिलता। एक रिटायर्ड अफसर पर इतनी मेहरबानी के पीछे कोई न कोई तो राज है ही।

अरबी घोड़े के ब्यूरोक्रेसी का मुखिया बनने की चर्चा
ब्यूरोक्रेसी के मुखिया की कुर्सी अगले महीने खाली होने वाली है। अफसर सरकार के मुखिया के इशारों के मायने निकालने में जुटे हुए है। पिछले दिनों सरकार के मुखिया ने सरकार के तीन साल होने पर बड़े अफसरों की बैठक लेकर हौसला अफजाई की। रिव्यू बैठक पूरी तरह डेमोक्रेटिक अंदाज वाली रही। एक एसीएस की तारीफ करते हुए सरकार के मुखिया ने यहां तक कह दिया कि ये तो ब्यूरोक्रेसी का अरबी घोड़ा है, हर जगह फिट हो जाता है और जीतकर ही आता है। सरकार के मुखिया की तारीफ के अब मायने निकाले जा रहे हैं कि कहीं ये अरबी घोड़ा ही अगला ब्यूरोक्रेसी का मुखिया न बन जाए।

मुखिया के समर्थक के हिस्से आए आंसू
नहरी क्षेत्र के जिले में जिला प्रमुख पद पर सरकार के मुखिया के खेमे से जुड़े नेता आंख में आंसू लिए ही रह गए और युवा नेता के खेमे से जुड़े राष्ट्रीय पदाधिकारी ने बाज मार ली। पड़ताल में पता लगा कि राष्ट्रीय पदाधिकारी ने जिला प्रमुख बनने के लिए दिल्ली, जयपुर और भोपाल तक सियासी पत्ते खेले। मौजूदा और पूर्व प्रदेश प्रभारी और मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम ने पैरवी की तो सरकार के मुखिया को भी हरी झंडी देनी पड़ी। तब जाकर प्रमुख का पद नसीब हुआ। यह अलग बात है कि जिले के विधायक भी खिलाफ थे लेकिन सियासी पत्ते सही तरीके से खेलकर राष्ट्रीय पदाधिकारी ने सबको पीछे छोड़ दिया।

बुजुर्ग नेताओं का संघम शरणम् गच्छामि

सियासत में गंगा गए गंगादास, जमना गए जमना दास फार्मूले पर चलना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है। बीजेपी में गैर आरएसएस बैकग्राउंड के नेता इस फार्मूले को अच्छी तरह समझते हैं कि लंबे टिके रहने के लिए संघ का साथ जरूरी है। पिछले दिनों एक विधायक रह चुके 60 पार के नेताजी ने संघ के आवासीय प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। नेताजी चैन स्मोकर थे इसलिए इसलिए खास आग्रह करके उन्हें छूट दी गई। प्रशिक्षण वर्ग में जब नेताजी के प्रति लचीलापन दिखाया तो इसका फायदा कुछ और नेताओं ने भी उठा लिया। इस लचीलेपन के साथ सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की भी है जो कभी संघ के नजदीक नहीं आते थे, वे अब बुढ़ापे में भी रीति नीति सीखने का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

तोप से खरगोश का शिकार

कई विधायक-सांसदों ने विशेषाधिकार हनन की नई परिभाषा शुरू कर दी है। आम तौर पर संसदीय कामों में बाधा पहुंचाने से जुड़े मामलों में ही विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की पंरपरा रही है। सीमावर्ती जिले के एक सांसद ने कॉलेज के लेक्चरर और इंजीनियर के खिलाफ ही विशेषाधिकार हनन का मामला बनाकर प्रिविलेज कमेटी को भेज दिया। मसला इतना सा है कि एक उद्घाटन में सांसद को बुलाया नहीं तो विशेषाधिकार का मामला बना दिया। अब वाइस प्रिंसिपल का चार्ज संभालने वाले कॉलेज लेक्चरर और इंजीनियर संसद की प्रिविलेज कमेटी की पेशियां भुगत रहे हैं। इस मामले को सुनकर एक बड़े नेता ने टिप्पणी की कि यह तो तोप से खरगोश का शिकार करने वाली बात हो गई। यह शिकायत तो लोकल लेवल पर ही दूर हो सकती थी।

इलेस्ट्रेशन : संजय डिमरी

वॉइस ओवर: प्रोड्यूसर राहुल बंसल

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