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पटाखों पर सरकारी आदेश की नाफरमानी पर होगी कानूनी कार्यवाही:पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड कर रहा एयर-साउंड पॉल्यूशन स्टडी, ग्रीन पटाखों का तय है वक्त

जयपुरएक वर्ष पहले
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पटाखों से फैलता पॉल्यूशन। - Dainik Bhaskar
पटाखों से फैलता पॉल्यूशन।

दिवाली के त्योहार पर राजस्थान के एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में पटाखे चलाने पर पाबंदी लगाई गई है। साथ ही राज्य की गहलोत सरकार ने प्रदेश में बाकी जिलों में भी रात 8 से 10 बजे तक कम पॉल्यूशन फैलाने वाले ग्रीन पटाखे ही चलाने की मंजूरी दी है। पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने लोगों को हिदायत दी है कि राज्य सरकार के आदेशों का पालन नहीं करने पर सरकार कानूनी कार्यवाही करेगी।दरअसल,राजस्थान सरकार को दिवाली के त्योहार पर एयर और साउंड पॉल्यूशन फैलने की चिन्ता सता रही है। सरकार के निर्देश पर राजस्थान स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड प्रदेश के 5 शहरों में दीपावली त्योहार के दौरान एयर क्वालिटी और 25 शहरों में साउंड पॉल्यूशन की स्पेशल स्टडी करवा रहा है।

स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड अध्यक्ष वीनू गुप्ता
स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड अध्यक्ष वीनू गुप्ता

लैंसेट के रिसर्च में पाया गया राजस्थान में 21 फीसदी मौतें एयर पॉल्यूशन से हुईं

पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की अध्यक्ष वीनू गुप्ता ने बताया कि फेमस साइंस मैग्जीन लैन्सेट के एक रिसर्च के अनुसार साल 2019 में राजस्थान में हुई कुल मौतों में से 21 फीसदी वायु प्रदूषण के कारण हुई। देशभर के लिए मौतों का यह औसत 18 फीसदी था। ठोस कचरे से फैलने वाले पॉल्यूशन और पानी के पॉल्यूशन के मुकाबले एयर पॉल्यूशन ज्यादा हानिकारक है। क्योंकि आम लोगों में इसकी अवेयरनेस की कमी है। गुप्ता ने बताया दीपावली के आस-पास एयर और साउंड पॉल्यूशन लेवल बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। लेकिन बीते साल कोविड पीरीयड में पटाखों पर पूरी रोक के कारण राज्य में पॉल्यूशन लेवल 20 फीसदी कम रहा था। इस बार पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड दिवाली से 7 दिन पहले और 7 दिन बाद तक 15 दिन के पीरियड में जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा और अलवर में एयर क्वालिटी की मॉनिटरिंग के लिए स्पेशल स्टडी करवा रहा है। जबकि इस दौरान 25 शहरों में साउंड पॉल्यूशन की भी मॉनिटरिंग की जाएगी।

ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों से कम फैलाते हैं पॉल्यूशन

गुप्ता ने बताया कि ग्रीन पटाखे भी पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। लेकिन इनके निर्माण में भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) का इस्तेमाल नहीं होने से सामान्य पटाखों की तुलना में इनसे होने वाले पॉल्यूशन का लेवल 30 से 40 फीसदी कम होता है। ग्रीन पटाखों में साउंड पॉल्यूशन भी सामान्य पटाखों के 160 डेसिबल की तुलना में 125 डेसिबल तक ही रहता है। राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार एनसीआर में पटाखों पर पूरी तरह पाबंदी के साथ राज्य के शेष हिस्सों में उत्सव के दिन सीमित समय के लिए केवल ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की परमिशन दी गई है। इन निर्देशों को नहीं मानने पर सरकार कानूनी कार्यवाही करेगी। उन्होंने कहा कि पटाखों से होने वाला एयरर और साउंड पॉल्यूशन से बुजुर्गों, बच्चों, सांस की बीमारियों समेत अलग-अलग बीमार लोगों,पालतू जानवरों को बहुत तकलीफ होती है।

सरकार ने सिर्फ ग्री पटाखे 2 घंटे चलाने की दी है छूट
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पटाखे की कैटेगरी पता करने लिए उसका डिब्बा जरूरी

लोग जो पटाखे खुले तौर पर चलाते हैं वो पटाखे ग्रीन हैं कि रेड या फिर किसी और कैटेगरी का है, यह पटाखा फूटने के बाद भी पता चलना मुश्किल है। इन पटाखों को इनके डिब्बों पर लोगो और क्यू आर कोड से ही पहचाना जा सकता है। दूसरा प्रोसेज बहुत लम्बा है,जिसमें केन्द्र सरकार की नीरी की लैब में पटाखों के सैम्पल जांच के लिए भेजने पड़ेंगे। आम तौर पर घर-घर चलाए जाने वाले खुले पटाखों से इन्हें नहीं पहचाना जा सकता है।यानी ये पटाखे फैक्ट्रियों या दुकानों पर ही बड़े लेवल पर पता लगाए जा सकते हैं।

ग्रीन पटाखे क्या होते हैं और कैसे होती है पहचान

ग्रीन पटाखों का सर्टिफिकेशन केन्द्र सरकार की एजेंसी सीएसआईआर-नीरी देती है। सूत्र बताते हैं कि राज्य के 12 पटाखा प्रोडक्शन करने वालों के पास ही इस तरह के सर्टिफिकेट हैं। जबकि इन्हें पीईएसओ से पटाखा बनाने का लाइसेंस भी लेना होता है। लेकिन 9 पटाखा उत्पादकों के पास ही पीईएसओ से लाइसेंस हैं। सीएसआईआर-नीरी की ओर से डवलप्ड ग्रीन पटाखे 3 तरह के होते हैं। पहली कैटेगरी के पटाखे जलने पर पानी बनाते हैं जिससे सल्फर और नाइट्रोजन,कार्बन की अलग-अलग ऑक्साइड गैसेज और हानिकारक चीजें उस पानी में घुल जाती हैं। दूसरी कैटेगरी के स्टार क्रैकर में एल्युनिमियन बहुत कम इस्तेमाल होता है। ये सामान्य पटाखों से कम सल्फर और नाइट्रोजन छोड़ते हैं। तीसरे कैटेगरी के अरोमा क्रैकर्स कम पॉल्यूशन फैलाने के साथ ही बदबू की बजाय हवा में खुशबू फैलाते हैं। पटाखों के डिब्बों पर छपे नीरी का हरे रंग के लोगो और क्यू आर कोड से ही ग्रीन पटाखों की पहचान की जाती है। ऐसे में पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड और पुलिस को पटाखों की बाहरी राज्यों से सप्लाई,राज्य में पटाखे बनाने वाली फैक्ट्रियों और पटाखों की दुकानों पर विशेष नजर रखने की जरूरत है।

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