मंत्रिमंडल में फेरबदल का असर 10 सवाल-जवाब से जानिए:पायलट की मंत्री बनाने में चली, हटाने में नहीं; प्रियंका फॉर्मूले से गहलोत का फायदा

जयपुर9 महीने पहलेलेखक: किरण राजपुरोहित
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लंबे इंतजार के बाद गहलोत मंत्रिमंडल में फेरबदल हो गया। अब बड़ा सवाल है कि क्या पिछले तीन साल से सरकार चलाने को लेकर जो चुनौतियां सीएम के सामने आ रही थीं, क्या वह खत्म हो जाएंगी? गहलोत को पूरी तरह से फ्री हैंड मिल जाएगा? पायलट-गहलोत गुट में टकराव खत्म हो गया है?

दैनिक भास्कर ने राजनीतिक विश्लेषकों से फेरबदल का गणित समझा। इसमें एक बात समझ आई कि ये खुशियां ओस की बूंदों जैसी हैं। मंत्रियों के सभी पद भरे जा चुके हैं। अब किसी को कुछ देना पड़ा, तो छीनकर ही देंगे। राज्य कैबिनेट के सभी पदों को भर दिया गया है। ऐसे में किसी असंतुष्ट को कुछ आश्वासन देकर राजी करना भी मुश्किल है। उधर, फेरबदल के साथ विरोध के स्वर भी उठने लगे हैं।

- पावर बैलेंस में पायलट को फायदा हुआ या नुकसान?
पायलट खेमे को 6:4 के फॉमूले के आधार पर पूरा सम्मान मिला। इससे वे खुश भी हैं। एक सच यह भी है कि मंत्री बनाने में पायलट की चली, लेकिन हटाने में हाईकमान ने उनकी एक न सुनी। पायलट ने अपने कोटे से मंत्री बने प्रतापसिंह खाचरियावास को हटाने के लिए खूब ताल ठोकी, लेकिन ‘वीटो’ के बावजूद उन्हें नहीं हटाया जा सका। इसी तरह मंत्री प्रमोद जैन भाया, उदयलाल आंजना भी मंत्रिमंडल में बरकरार हैं।

- प्रियंका का फॉर्मूला दिखा या गहलोत की चली?
फेरबदल के बाद सचिन का बयान आया कि प्रियंका गांधी की छाप है। असल में केवल गहलोत की चली है। दूसरी बार विधायक बनीं शकुंतला रावत को गहलोत ने मिनिस्टर बना दिया। संकट के दौरान वे उनके साथ थीं। प्रियंका गांधी के महिलाओं को सत्ता में स्थान दिलाने के फॉमूले के तहत गहलोत ने उन्हें मंत्री बना दिया। राज्य मंत्री रहीं ममता भूपेश का प्रमोशन कैबिनेट पर कर दिया। राज्यमंत्री बनीं जाहिदा भी गहलोत गुट से हैं। पिछले कार्यकाल में भी उन्हें गहलोत ने संसदीय सचिव बनाया था।

- गहलोत की चुनौतियां खत्म?
फिलहाल कोई चुनौती नहीं है। यह भी तय है कि आपसी कलह जल्द सामने आएगी। इसकी वजह गहलोत का सत्ता और संगठन पर दबदबा है। सचिन के साथ वाले सभी विधायकों को कुछ न कुछ मिलने की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हुई है। बोर्ड चेयरमैन समेत अन्य राजनीतिक नियुक्तियों के बाद बगावती सुर उठेंगे। गहलोत खेमे में भी असंतोष बढ़ सकता है, क्योंकि संकट के वक़्त साथ खड़े रहे निर्दलीयों को फिलहाल कुछ नहीं मिला है। संसदीय सचिव बनाकर इसे बैलेंस किया जाएगा, लेकिन पायलट-गहलोत बैलेंस में ये सभी संतुष्ट हो जाएं, ये मुश्किल है।

- क्या कांग्रेस की गुटबाजी खत्म हो जाएगी?
हां, काफी हद तक कम होगी। क्षेत्रीय स्तर पर भी कांग्रेस में धड़े बंटे हैं। राजनीतिक नियुक्तियां होनी हैं। आधे राजस्थान को फेरबदल के बाद प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। अभी भी 33 में से 14 जिलों में कोई मंत्री नहीं है।

- पायलट सिर्फ इतने से संतुष्ट होंगे क्या?
हाईकमान के साथ हुए समझौते के बाद वे राष्ट्रीय महासचिव बनने को तैयार हैं, लेकिन संतुष्ट बिल्कुल नहीं। पायलट का स्टैंड हमेशा से यही रहा है कि उन्होंने कांग्रेस को 2018 में 21 से 100 पर पहुंचाया था। ऐसे में मौजूदा सरकार में फ्री-हैंड मांग सकते हैं, जो उनके डिप्टी सीएम रहते भी नहीं हो पाया था। उनकी असंतुष्टि का लेवल और बढ़ेगा।

- क्या 2023 में गहलोत के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे?
नहीं। कांग्रेस की ऐसी परंपरा नहीं रही। इस बार प्रबल संभावना है कि पायलट को फेस बनाकर चुनाव लड़ा जाए। हाईकमान से पायलट के हुए समझौते की भी यही शर्त बताई जा रही है। वैसे अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। यह तय है कि टिकट वितरण में गहलोत हावी रहेंगे।

- फेरबदल का असर 2023 चुनाव पर पड़ेगा क्या?
नहीं। सरकार का दो साल का कार्यकाल बाकी है। सरकार और मंत्रियों की परफॉर्मेंस बेहद महत्वपूर्ण होगी। गुटबाजी के बाद जनता के कितने काम होंगे, ये सब मायने रखेगा। फेरबदल से कांग्रेस को मजबूती मिलेगी, ऐसा लगता नहीं है। गुटबाजी जारी रहने पर अफसरशाही का हावी होना तय है। अफसर इस संघर्ष में अपना अलग ही अंदाज़ रखेंगे।

- क्या सभी जातियां और सभी वर्ग संतुष्ट हुए?
फेरबदल में कोशिश जरूर की गई है, लेकिन अंदरखाने विरोध है। पहले कैबिनेट में एक भी दलित मंत्री नहीं था। अब चार होने के बावजूद भी एसटी-एसी के कई विधायक मुखर हैं। दो धाराओं के मुस्लिमों (मेव और सिंधी) को रखकर कोशिश की गई, लेकिन अभी भी इसमें पूरा वर्ग संतुष्ट नहीं है।

- इस फेरबदल से एंटी इनकम्बेंसी कम होगी?
सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ एक बार परसेप्शन बनने के बाद उसे बदलना मुश्किल होता है। अब तक का इतिहास यही रहा है। सत्ता विरोधी लहर मंत्रियों के कामकाज पर निर्भर करेगी। मंत्रिमंडल फेरबदल से सत्ता विरोधी लहर कम होना मुश्किल है।

- भाजपा और अन्य दलों पर क्या असर पड़ेगा ?
काफी समय से मंत्रिमंडल नहीं बनने से विरोधी दलों को बयानबाजी का मौका मिल रहा था। वह अब खत्म हो जाएगा। अब भाजपा सहित अन्य दलों के लिए सबसे बड़ा चैलेंज गुटबाजी से उबरना होगा।