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टोंक: कल और आज:फिल्म रजिया सुल्तान में जिन रेत के टीलों में शूटिंग हुई थी, वहां अब निकल आई हैं चट्टानें

टोंक7 महीने पहले
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बदलाव: साल 81-82 में टोंक में फिल्म रजिया सुल्तान की शूटिंग हुई थी। तब यहां रेत के टीले थे। रजिया का किरदार निभाने वाली हेमा मालिनी को लेकर इन टीलों पर गीत फिल्माया गया था। अब यहां रेत के टीले गायब हो गए हैं और चट्‌टानें निकल आई हैं। दोनों तस्वीरों में यह फर्क साफ दिखता है। - Dainik Bhaskar
बदलाव: साल 81-82 में टोंक में फिल्म रजिया सुल्तान की शूटिंग हुई थी। तब यहां रेत के टीले थे। रजिया का किरदार निभाने वाली हेमा मालिनी को लेकर इन टीलों पर गीत फिल्माया गया था। अब यहां रेत के टीले गायब हो गए हैं और चट्‌टानें निकल आई हैं। दोनों तस्वीरों में यह फर्क साफ दिखता है।
  • कमाल अमरोही की फिल्म रजिया सुल्तान की शूटिंग टोंक में 1981-82 में रेत के टीलों पर हुई थी
  • जहां पर फिल्म की शूटिंग हुई थी, वहां पर अब पूरी तरह से पत्थर और सूखे जैसी स्थिति है

(एम.असलम). वक्त के साथ सब बदल जाता है। इंसान भी और जगह का हुलिया भी। इसका अंदाजा टोंक में बनास नदी के पुराने एवं नए पुल के आसपास की स्थिति को देखकर बखूबी लगाया जा सकता है। इन तस्वीरों से इसे समझा जा सकता है। 1981-82 के दौरान यहां रजिया सुल्तान फिल्म की शूटिंग हुई थी। हेमा मालिनी पर यहां सीन फिल्माया गया था। वे रात में इन टीलों पर चलती हैं और बैकग्राउंड में गाना बजता है ऐसा लगता है, मौज प्यासी है, अपने दरिया में...। 

कमाल अमरोही की फिल्म रजिया सुल्तान की शूटिंग टोंक में 1981-82 में हुई थी। बनास नदी में जां-निसार अख्तर का लिखा गीत ऐ दिल-ए-नादान...गीत फिल्माया गया था। तब यहां रेत के टीले हुआ करते थे। यह वही जगह है। 38 साल में बहुत कुछ बदल गया। खनन के चलते रेत अब पूरी तरह से गायब हो गई है।

कमाल अमरोही की फिल्म रजिया सुल्तान की शूटिंग टोंक में 1981-82 में हुई थी। यह उसी शूटिंग का सीन है। इसमें हेमा मालिनी ने अभिनय किया था।
कमाल अमरोही की फिल्म रजिया सुल्तान की शूटिंग टोंक में 1981-82 में हुई थी। यह उसी शूटिंग का सीन है। इसमें हेमा मालिनी ने अभिनय किया था।

रेत अपने साथ बहुत कुछ ले गई 

यहां रेत के बड़े-बड़े टीले थे, जो दूर से रेत के पहाड़ जैसे लगते थे। उस रेत में टोंक के देशभर में मशहूर मिश्री जैसी मिठास लिए खरबूज़े की पैदावार होती थी। एक समय टोंक के मशहूर खरबूज़े, जयपुर की खरबूज़ा मंडी की रौनक हुआ करते थे। यहां से प्रदेश के कई जिलों सहित दिल्ली, भोपाल आदि जगह इनकी बहुत मांग हुआ करती थी। अब उस खरबूजे़ की किस्म तक लुप्त हो चुकी है जिसका बीज रियासत काल में अफगानिस्तान से आया बताया जाता है। आज वहां खरबूजे की फसल पैदा करना तो दूर, रेत का दोहन इतना हुआ की चट्टानें नजर आती हैं।

जहां पहले रेत ही रेत नजर आती थी, वहां अब कुछ ऐसा हाल है।
जहां पहले रेत ही रेत नजर आती थी, वहां अब कुछ ऐसा हाल है।

कभी एक दो फिट पर ही निकल पड़ता था पानी
बनास नदी में पानी की आवक 1999 के बाद बीसलपुर बांध बनने के साथ ही खत्म सी हो गई जबकि पहले यहां पानी नजर आता था। जहां रेत के टीले थे, वहां भी एक-दो फीट रेत हटाने पर पानी निकल पड़ता था। अब हाल ये है कि बनास नदी में कई जगह कुएं तक सूखे नजर आते हैं।  

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