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काबुल से लौटे राजस्थानी की आपबीती:अफगानियों को घरों में घुसकर मार रहे थे तालिबानी, महिलाओं को सरेआम दी जा रही थी सजा; यह सब देख 55 घंटे सो नहीं पाया

सीकर10 महीने पहलेलेखक: मनीष व्यास

15 अगस्त की सुबह 9 बजे स्वतंत्रता दिवस मनाया ही था कि विस्फोट की आवाजें गूंजने लगीं। तालिबानी काबुल शहर में आ चुके थे। मुझे लगा कि अब कभी भी हिन्दुस्तान जाना नसीब नहीं होगा और यहीं तालिबानी आतंकियों के हाथों मारा जाऊंगा। गनीमत रही कि मैं सरकार के प्रयासों से सुरक्षित भारत लौट आया हूं, लेकिन इस दौरान तालिबान की दहशत का जो मंजर मैंने काबुल शहर में देखा, वो बेहद ही डरावना था। डर के बारे में मैं 55 घंटों तक सो नहीं पाया। काबुल की यह आपबीती है सीकर के लक्ष्मणगढ़ निवासी योगेश सैन की।

योगेश पिछले 9 सालों से अफगानिस्तान के काबुल शहर में नाटो के मिलिट्री बेस कैम्प में लॉजिस्टिक ऑफिसर थे। वहां हालात बिगड़ने के बाद 17 अगस्त को बड़ी मुश्किल से उन्हें अमेरिका की फ्लाइट से रेस्क्यू कर कतर पहुंचाया गया। फिर कतर में भारतीय दूतावास से सम्पर्क करने के बाद 22 अगस्त को उन्हें दिल्ली लाया गया। उनके साथ 32 अन्य भारतीय भी काबुल में तालिबानी कहर से बचकर आए हैं।

पढ़िए दहशत से भरे वक्त की कहानी, योगेश की जुबानी...

"तालिबानी लड़ाके वहां दूसरे देशों के लिए काम करने वाले अफगानी लोगों को घरों में घुस-घुस कर मार रहे हैं। महिलाओं को सरेआम सजा दी जा रही है और ये सब मैंने अपनी आंखों से देखा है। वहां खाने-पीने के सामान के रेट्स भी आसमान छू रहे हैं। सही मायनों में कहूं तो मौजूदा हालातों में अफगानिस्तान में तालिबानी इंसानियत का कत्ल कर रहे हैं। मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं बचकर आ गया हूं, लेकिन अभी भी वहां अफगानियों सहित लाखों लोग ऐसे हैं, जो बचकर आना चाहते हैं।"

अमेरिका की फ्लाइट से 32 अन्य भारतीयों के साथ कतर एयरपोर्ट पहुंचे योगेश सैन।
अमेरिका की फ्लाइट से 32 अन्य भारतीयों के साथ कतर एयरपोर्ट पहुंचे योगेश सैन।

"मैं नाटो के मिलिट्री बेस कैंप में था तो ज्यादा खतरा तो नहीं था, लेकिन डर और दहशत से खुद को दूर नहीं रख पा रहा था। इसके अलावा भारत से परिजनों के फोन भी बार-बार आ रहे थे। 16 अगस्त को भी काबुल एयरपोर्ट पहुंचने का प्रयास किया था, लेकिन बाहर के हालात और भीड़ देखकर वापस मिलिट्री बेस कैम्प में ही रुक गया। चारों तरफ लोग अपने घर की महिलाओं व बच्चों को लेकर एयरपोर्ट की तरफ भाग रहे थे और रो रहे थे।

मैं 17 अगस्त की सुबह कड़ी मशक्कत कर नाटो सेना के सहयोग से काबुल एयरपोर्ट पहुंचा। इसके बाद दोपहर में अमेरिका की फ्लाइट ने 32 अन्य भारतीयों के साथ हमें सुरक्षित कतर एयरपोर्ट तक पहुंचा दिया। यहां पहुंचने के बाद भारतीय दूतावास से संपर्क किया तो उन्होंने 21 अगस्त की देर रात कतर से फ्लाइट से 22 अगस्त की सुबह नई दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचा दिया।"

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