ऐसा मंदिर जहां चढ़ते हैं लकड़ी के हाथ-पैर:पैरालिसिस जैसी बीमारी सही होने पर लकड़ी-चांदी से बने अंग

डूंगरपुर2 महीने पहलेलेखक: अरविंद चोटिया और ताराचंद गवारिया

किसी के हाथ में लकड़ी से बना हाथ, किसी के हाथ में लकड़ी से बना पैर। किसी के हाथ में लकड़ी की पूरी मानव आकृति। बांसवाड़ा जिले के बिजवा माता मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की लम्बी कतार लगी है और इनके हाथ में लकड़ी से बने विभिन्न मानव अंग हैं। कारण- ये लोग लकवा पीड़ित थे और अब स्वस्थ होने के बाद माताजी के धोक लगाने मंदिर आए हैं। रामलाल की आवाज लौटी डूंगरपुर के रामलाल (31) के आधे शरीर में 5 माह पहले लकवा आया, आवाज चली गई। परिजन अस्पताल ले गए, फिर मंदिर लाए। एक माह से वह यहीं हैं। 50% ठीक हो चुके हैं और बोलने लगे हैं। उनके माता-पिता कहते हैं- एक दिन अपने पैरों पर खड़ा भी होगा। फिर चांदी के हाथ-पैर चढ़ाकर जाएंगे।

मंदिर के पास विक्रेता महावीर जैन बताते हैं- हर माह ऐसे 10 हजार से ज्यादा अंग व नारियल बिकते हैं, जो माताजी के चढ़ाए जाते हैं। पुजारी मयंक जोशी बताते हैं- दादाजी और पिताजी के बाद मैं यहां सेवा कर रहा हूं। बचपन से देखा है, परिजन लकवा पीड़ित को उठाकर लाते हैं, कुछ दिन यहां रहने के बाद अपने पैरों पर लौट कर जाते हैं।

पैरालिसिस पीड़ित मरीजों का यहां इलाज किया जाता है। मान्यता है कि मरीज के सही होने पर यहां हाथ-पैर चढ़ाते हैं।
पैरालिसिस पीड़ित मरीजों का यहां इलाज किया जाता है। मान्यता है कि मरीज के सही होने पर यहां हाथ-पैर चढ़ाते हैं।

मां आशापुरा का दूसरा रूप
राजा मोदपाल विक्रम संवत 1380 में वागड़ से गुजर रहे थे। कुलदेवी आशापुरा माता की प्रतिमा का रथ 12 मील आगे चल रहा था। रथ गामड़ी निठाउवा में क्षतिग्रस्त होकर ठहरा तो राजा मोदपाल भी जहां के तहां ठहर गए। वहां मोदपुर गांव बसा। राजा यहां आशापुरा माता के दर्शन कर ही अन्न ग्रहण करते। एक बार सोमनदी उफनी तो दो दिन भूखे-प्यासे नदी तट पर बैठे रहे। तीसरे दिन मातारानी प्रकट हुईं। कहा- अब तुम्हें नदी पार कर गामड़ी नहीं आना पड़ेगा। नदी के इस पार खुदाई करने का हुक्म हुआ, तो दिव्य प्रतिमा निकली। माता ने कहा- यह मेरा दूसरा स्वरूप है। वहीं प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई। दूसरी को वागड़ी में बिजी कहते हैं इसलिए आशापुरा माता का यह दूसरा स्वरूप बिजी माता कहलाया।

यह मां आशापुरा का दूसरा रूप है। लंबे समय से यहां मरीज को सही करने को लेकर मान्यता चली आ रही है।
यह मां आशापुरा का दूसरा रूप है। लंबे समय से यहां मरीज को सही करने को लेकर मान्यता चली आ रही है।