...तो आज राजस्थान होता चीतों का घर:एक्सपर्ट की पहली पसंद थी रावतभाटा-शाहगढ़ सेंचुरी; नेताओं की सुस्ती से गंवाया मौका

जयपुर5 महीने पहलेलेखक: निखिल शर्मा

देश में 70 साल बाद आज चीते वापस आ गए। नामीबिया से लाकर मध्य प्रदेश के कूनो में इनको छोड़ा गया है। इन 8 चीतों में 5 मेल और 3 फीमेल हैं। इन चीतों का घर राजस्थान हो सकता था, लेकिन यहां के नेताओं, ब्यूरोक्रेट्स और वन विभाग ने इसकी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।

अपना पूरा फोकस सिर्फ टाइगर पर रखने वाले नेता अगर इस ओर ध्यान देते तो ये चीते मध्य प्रदेश की बजाय राजस्थान में बसाए गए होते।

चीतों को जब भारत में लाने के प्रयास किए गए तब वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने मुख्य रूप से राजस्थान और मध्यप्रदेश की चार जगहों को इसके लिए सबसे अनुकूल माना था। इनमें राजस्थान से रावतभाटा-गांधीसागर, शाहगढ़-बल्ज और मध्यप्रदेश से कूनो और नौरादेही को चुना गया था।

यहां इंस्टीट्यूट की टीमें आईं और इंस्पेक्शन किया। साल 2013-14 में शाहगढ़ (जोधपुर) और 2014-15 में रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) का इंस्पेक्शन किया गया। टीम को दोनों जगह पसंद भी आई। मगर राजनीतिक सुस्ती के चलते राजस्थान को चीते नहीं मिल सके।

जयपुर में आज भी चीतों के नाम पर मोहल्ला
चीतों का राजस्थान से पुराना जुड़ाव रहा है। राजस्थान के कई इलाकों में चीते विचरण किया करते थे। यहां बड़ी संख्या में चीतों का शिकार हुआ करता था।

जयपुर, भरतपुर, बारां, कोटा, झालावाड़, उदयपुर, रावतभाटा, भैंसरोडगढ़ सहित कई इलाकों में चीते विचरण किया करते थे।

इन इलाकों में चीतों के शिकार भी होते थे। यहां तक की राजस्थान के जयपुर में आज भी एक मोहल्ला है, जिसका नाम मोहल्ला चीतावतान है।

इस मोहल्ले में आज भी उन लोगों के वंशज रहते हैं जो कभी चीते पालते थे और उनसे हिरण का शिकार करवाया करते थे। राजस्थान में चीता एक उपनाम भी है।

वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की पंसद था राजस्थान
2009 से सरकार चीतों को फिर भारत लाने का प्रयास कर रही है। तब से अब तक वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने जितने भी सर्वे किए हैं, उनमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के वन क्षेत्रों को चीते के लिए अनुकूल बताया गया है।

सुस्त राजनीति से हार

- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने रणथम्भौर से अपने चुनाव क्षेत्र बून्दी के रामगढ़ विषधारी वन क्षेत्र में टाइगर शिफ्ट करवाए। वे अगर प्रयास करते तो चीता राजस्थान के वन क्षेत्र में आ सकता था। वे अब भी अगर केन्द्र के सामने बतौर सांसद राजस्थान का पक्ष रखें तो बात बन सकती है।

- पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने शासनकाल में टाइगर को मुकंदरा वन क्षेत्र में शिफ्ट करवाया। अभी भी उनके प्रयास टाइगर के सन्दर्भ में ही अधिक रहते हैं। उन्होंने राजस्थान को चीते मिले, इसके लिए कोई खास प्रयास नहीं किए। जबकि कूनो (मध्यप्रदेश) से लगता हुआ क्षेत्र है बारां-झालावाड़ जहां से उनके बेटे दुष्यंत सिंह लगातार चौथी बार सांसद हैं।

- राजस्थान सरकार में यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल भी रणथम्भौर से टाइगर को शिफ्ट कराकर अपने चुनाव क्षेत्र कोटा के पास ले जाना चाहते हैं। उनके चीते के सन्दर्भ में कोई प्रयास नहीं रहे।

- राजसमन्द से सांसद दीया कुमारी अपने चुनाव क्षेत्र के कुम्भलगढ़ इलाके में टाइगर को ले जाना चाहती हैं। मगर चीता को लेकर उन्होंने भी कोई कोशिश नहीं की है।

बड़े क्षेत्र की जरूरत, घने जंगल पसंद नहीं
पूर्व चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट राहुल भट्‌टनागर बताते हैं कि चीतों को अपने रहने के लिए टाइगर से ज्यादा बड़े क्षेत्र की जरूरत होती है।

अब भी लाए जा सकते हैं राजस्थान में चीते
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट और स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड के पूर्व सदस्य राजपाल सिंह बताते हैं कि वाइल्ड लाइफ सोसायटी राजस्थान में चीते लाना चाहती थी। राजस्थान के कई इलाके इनके लिए अनुकूल हैं। हालांकि, कूनो भी पूरी तरह अनुकूल इलाका है। मगर अब भी राजस्थान में चीतों को लाया जा सकता है।

अगले साल दोनों राज्यों में चुनाव
अगले साल 2023 के आखिर में मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। दोनों राज्यों में 29 में से 28 और 25 में से 24 सीटों पर भाजपा के सांसद हैं । अब आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर कूनो में चीता को छोड़ दिया है।

अगले एक से डेढ़ साल में यह मुद्दा दोनों राज्यों की राजनीति को गर्म करेगा। फिलहाल राजस्थान के वन विभाग ने भी अपना पूरा ध्यान टाइगर पर ही लगाया हुआ है।

अब जानते हैं किन खासियतों के चलते चीता इतनी तेज दौड़ता है

1. लंबी और लचीली रीढ़

चीते की रीढ़ की हड्डी इतनी लंबी और लचीली होती है कि दौड़ते वक्त उसके पिछले पैर अगले पैर से आगे तक आ सकते हैं। यानी ये बाघ, शेर, तेंदुए और जगुआर के मुकाबले लंबी होती है। इसकी वजह से टॉप स्पीड पर चीता 23 फीट यानी करीब 7 मीटर लंबी छलांग लगाता है।

अगर ऐसी लचीली स्पाइन घोड़े की होती तो वह 50-55 किमी/घंटे के बदले 110-120 किमी/घंटे की औसतन रफ्तार से दौड़ता।

इसकी कीमत: बड़े जानवरों का शिकार नहीं कर पाता

तेज रफ्तार के लिए लचीली लंबी रीढ़ के साथ हल्का वजन भी चाहिए। हल्के वजन वाला अकेला शिकारी होने की वजह से चीता बड़े जानवर का शिकार नहीं कर पाता और उसे बार-बार शिकार करना पड़ता है।

2. छोटा सिर

चीते का सिर बाघ, शेर, तेंदुए और जगुआर की तुलना में काफी छोटा होता है। इससे तेज रफ्तार के दौरान उसके सिर से टकराने वाली हवा का प्रतिरोध यानी air resistance काफी कम हो जाता है।

चीते की खोपड़ी पतली हड्डियों से बनी होता है। इससे उसके सिर का वजन भी कम हो जाता है।

हवा के रेजिस्टेंस को कम करने के लिए चीते के कान बहुत छोटे होते हैं।

इसकी कीमत: रफ्तार पकड़ते ही ब्लड का टेंपरेचर बढ़ जाता है

टॉप स्पीड के साथ दौड़ते चीते की मांसपेशियां और उनसे गुजरने वाले खून का तापमान तेजी से बढ़ जाता है। छोटे सिर और कान की वजह से ब्रेन से गुजरने वाले गर्म खून को ठंडा होने की जगह नहीं मिलती है।

1973 में हावर्ड में हुई एक रिसर्च के मुताबिक आमतौर पर चीते के शरीर का तामपमान 38 डिग्री सेल्सियस होता है, लेकिन रफ्तार पकड़ते ही उसके शरीर का तापमान 40.5 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। चीते का दिमाग इस गर्मी को भी नहीं झेल पाता है और वो अचानक से दौड़ना बंद कर देता है।

नेचुरल हिस्ट्री फिल्म मेकर डेविड एटनबर्ग अपनी किताब A Life on Our Planet में लिखते हैं कि चीता केवल एक मिनट तक ही अपनी टॉप स्पीड को बरकरार रख पाता है।

इसकी वजह से चीते के शिकार करने की दर 40% होती है। भूख मिटाने के लिए उसे बार-बार शिकार के पीछे दौड़ लगानी पड़ती है।

3. बड़े नथुने और बड़ी श्वास नली

100-120 किलोमीटर/घंटे की टॉप स्पीड से दौड़ने के लिए चीते की मांसपेशियों को बहुत ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है। इस ऑक्सीजन की सप्लाई को बरकरार रखने के लिए चीते के नथुनों के साथ श्वास नली भी मोटी होती है, ताकि वह कम बार सांस लेकर भी ज्यादा ऑक्सीजन शरीर में पहुंचा सके।

इसकी कीमत: कई बार शिकार हाथ से निकल जाता है

चीते की छोटी खोपड़ी में बड़े नथुनों को जगह देने के लिए उसके चारों canine teeth ( उसके जबड़े के कोने में मौजूद नुकीले दांत) छोटे होते हैं।

जबड़े की मांसपेशियां भी कमजोर होती है। इस वजह से अक्सर शिकार पकड़ में आने के बावजूद भी छूट जाता है।

4. दूर से शिकार की पहचान करने वाली आंख

चीते की आंख सीधी दिशा में होती है। इसकी वजह से वह कई मील दूर तक आसानी से देख सकता है। इससे चीते को अंदाजा हो जाता है कि उसका शिकार कितनी दूरी पर है।

इसकी आंखों में इमेज स्टेबिलाइजेशन सिस्टम होता है। इसकी वजह से वह तेज रफ्तार में दौड़ते वक्त भी अपने शिकार पर फोकस बनाए रखता है।

5. घुमावदार और ग्रिप वाले पंजे और रडर का काम करने वाली लंबी पूंछ

इसके पंजे घुमावदार और ग्रिप वाले होते हैं। दौड़ते वक्त चीता पंजे की मदद से जमीन पर ग्रिप बनाता है और आगे की ओर आसानी से जंप कर पाता है। इतना ही नहीं अपने पंजे की वजह से ही वो शिकार को कसकर जकड़े रख पाता है।

चीते की पूंछ 31 इंच यानी 80 सेंटीमीटर तक लंबी होती है। यह चीते के लिए रडर का काम करती है। अचानक मुड़ने पर बैलेंस बनाने के काम आती है।

6. मांसपेशियों में तेजी से ऑक्सीजन पहुंचाने वाला बड़ा दिल
चीते का दिल शेर के मुकाबले साढ़े तीन गुना बड़ा होता है। यही वजह है कि दौड़ते वक्त इसे भरपूर ऑक्सीजन मिलता है। यह तेजी से पूरे शरीर में ब्लड को पंप करता है और इसकी मांसपेशियों तक ऑक्सीजन पहुंचाता है। इसकी नाक भी बड़ी होती है, जिससे ये लंबी सांस भर पाता है।

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