चांदनी चौक से आबूरोड पहुंची रबड़ी, 70 साल पुराना जायका:कभी 3 रुपए किलो बिकती थी, आज 15 करोड़ से ज्यादा का सालाना कारोबार

आबू रोड2 दिन पहलेलेखक: निधि उमट

दिल्ली के चांदनी चौक पर फलूदा का स्वाद बहुत से लोगों ने चखा होगा, लेकिन इसका स्वाद बढ़ाने वाली रबड़ी का जब जिक्र होता हो तो सबसे पहला नाम आता है आबूरोड का। रबड़ी, राजस्थान के एकमात्र हिल स्टेशन के नीचे बसे आबूरोड की पहचान बन गई है। ऐसी कोई गली नहीं जहां रबड़ी न बिकती हो। सीजन चाहे सर्दी का हो या गर्मी का, यहां आने वाले टूरिस्ट में रबड़ी की भारी डिमांड रहती है। राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको ले चलते हैं आबूरोड की सैर पर जहां दूध से बनता है यह खास जायका....

माउंट आबू जाने वाली पर्यटकों की भीड़ आबूरोड से होकर ही गुजरती है। रेलवे स्टेशन हो या बाजार, भट्टियों पर उबलते दूध से जब रबड़ी तैयार होती है, तो इसकी महक खाने के शौकीनों को अपनी ओर खींच लाती हैं। ऐसा कोई टूरिस्ट नहीं जो आबूरोड जाए और रबड़ी का स्वाद लेने का मौका चूक जाए। ट्रेन, बसों और निजी वाहनों से आने यात्री भी रबड़ी ले जाना नहीं भूलते। आबूरोड की रबड़ी का इतिहास भी 70 साल से भी पुराना है।

चांदनी चौक से आया जायका
बताया जाता है सबसे पहले इसकी शुरुआत आबूरोड शहर के आस-पास बसे गांवों से हुई थी। तब इन गांवों के कुछ लोग रबड़ी बेचने रेलवे स्टेशन आते थे, लेकिन इसे पहचान मिलने में थोड़ा वक्त लगा। आबूरोड की सबसे फेमस और पुरानी दुकानों में से एक है दयाल भाई रबड़ीवाला। दयालभाई के बेटे अनिल भाई बताते हैं कि दिल्ली के चांदनी चौक से रबड़ी का जायका आबूरोड पहुंचा था। उनके पिता ने इसकी रेसिपी का आइडिया दिल्ली के चांदनी चौक से लिया जहां का रबड़ी-फलूदा फेमस था।

दयालभाई ने रबड़ी को और भी जायकेदार बनाने के लिए कई प्रयोग किए। फिर 1968 में आबूरोड में ही छोटी से दुकान से शुरुआत की। धीरे-धीरे इसका स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा। डिमांड बढ़ी तो स्थानीय कारीगरों ने भी इसकी रेसिपी सीखी। आज आबूरोड शहर में 20 से ज्यादा दुकानों पर 100 से ज्यादा भट्टियों पर रबड़ी तैयार होती है। अनिल भाई के मुताबिक एक दुकान पर रबड़ी की औसत खपत 30 किलो से ज्यादा है।

दयालभाई ने रबड़ी बनाने की रेसिपी दिल्ली में सीखी। फिर 1968 में आबूरोड शहर में अपनी दुकान खोली।
दयालभाई ने रबड़ी बनाने की रेसिपी दिल्ली में सीखी। फिर 1968 में आबूरोड शहर में अपनी दुकान खोली।

ऐसे तैयार होती है रबड़ी
रबड़ी तैयार करने में करीब 4 घंटे की मेहनत लगती है। बड़ी कढ़ाई में अच्छे फैट वाला 10 लीटर का दूध डाला जाता है। दूध को भट्टी पर मीडियम आंच पर पकाया जाता है। उबालते समय इस पर जो मलाई आती है, उसे चम्मच से कढ़ाई के किनारों पर रखा जाता है। जब 10 लीटर का दूध केवल 3 लीटर रह जाता है। तब उसमें 400 ग्राम शक्कर डाली जाती है। उसके बाद किनारों पर इकट्ठी की गई मलाई को उस दूध में मिक्स कर फेंटा जाता है। तब जाकर 3 किलो रबड़ी तैयार होती है। कुछ हलवाई स्वाद बढ़ाने के लिए इलायची, पिस्ता और केसर का इस्तेमाल भी करते हैं।

शहर में रोज बिकती है 900 किलो रबड़ी
आबू रोड शहर में करीब 20 बड़ी दुकानें हैं। हर दुकान में करीब 4 भट्टियों पर दिनभर रबड़ी तैयार होती रहती है। अनुमान के मुताबिक हर दुकान पर औसत 30 किलो रबड़ी बिकती है। पर्यटन सीजन में यह औसत 50 किलो प्रति दुकान से भी ज्यादा होता है। वहीं आबूरोड रेलवे स्टेशन पर दो दुकानों सहित कई ठेलों पर भी इसकी बिक्री होती है। रेलवे स्टेशन पर दिन में करीब 60 ट्रेनों का ठहराव होता है। एक ठेले पर रोजाना 30 किलो रबड़ी बिक जाती है।

एक दुकानदार ने बताया कि पूरे आबूरोड में 900 किलो रबड़ी की खपत रोज होती है। पर्यटन सीजन में खपत बढ़ जाती है। रबड़ी 400 रुपए किलो बिकती है, लेकिन इसके भाव दूध के भाव पर भी निर्भर करते हैं। गर्मी और शादियों के सीजन में इसके भाव 600 रुपए किलो तक चले जाते हैं। इसके सालाना कारोबार की बात करें तो यह 15 करोड़ से भी ज्यादा है।

गांवों से पहुंचता है दूध
रबड़ी बनाने के लिए ज्यादातर कारीगर आसपास गांवों के पशुपालकों से ही दूध खरीदते हैं। आबूरोड शहर के देलदार, निचलागढ़, आमथला, उपलागढ़ और रेवदर कस्बा सहित अनादरा के गांव से भी दूध मंगवाया जाता है। रबड़ी के इस कारोबार से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करीब 400 पशुपालक और 500 कारीगार और विक्रेता जुड़े हैं।

रबड़ी की सबसे ज्यादा डिमांड शादियों में
आबूरोड की रबड़ी फेमस होने के पीछे उसकी क्वालिटी है। ग्राहकों को अच्छी बेहतरीन दूध से बनी रबड़ी परोसी जाती है। जिस वजह से इसकी पहचान आबूरोड से जुड़ गई है। दिवाली, होली, न्यू ईयर के समय यहां पर्यटकों की भीड़ उमड़ती है। इन दिनों रबड़ी की बिक्री भी बढ़ जाती है। सबसे ज्यादा डिमांड शादियों के सीजन में होती है। रबड़ी के बिना शादी का खाना अधूरा माना जाता है।

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