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बंद हुआ सिनेमा हॉल:35 साल बाद मंथन का गिरा पर्दा, अब पाली शहर में एक भी सिनेमाघर नहीं

पालीएक महीने पहले
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  • 17 जून 1985 में पहले शाे के साथ पाली में शुरू हुआ था सफर, अब थमा

पाली के सिनेप्रेमियों का पिछले 35 साल से मनोरंजन कर रहे मंथन सिनेमा का पर्दा फिलहाल गिर गया है। बीते कई साल से पाली शहर का यह एक इकलौता सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर था, जाे दर्शकों काे फिल्मी दुनिया की सैर करा रहा था। अपने अब तक के सफर में 2500 फिल्में यहां प्रदर्शित हाे चुकी हैं। मंथन के बंद होने से पाली संभवत: अब राजस्थान का ऐसा जिला मुख्यालय बन गया है, जहां सिनेमाघर ही नहीं है।

इस सिनेमाघर से कई यादें भी जुड़ी हैं, जिनमें सबसे ज्यादा याद किए जाने पल वाे हैं जब, शशि कपूर के लिए “जब जब फूल खिले’ फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान खुद शशि कपूर यहां मौजूद रहे। सुनील दत्त भी यहां आए थे। कई सुपरहिट राजस्थानी फिल्मों के प्रीमियर भी यहां हुए।

एक ही दिन में पांच शो औैर उस दौरान दो अलग-अलग फिल्में भी दिखाई गई। बाॅलीवुड, हाॅलीवुड, राजस्थानी, भोजपुरी व सिंधी फिल्मों ने इस सिनेमाघर में खूब धूम मचाई। मंथन सिनेमाघर की जगह अब यहां क्या बनेगा, इसे लेकर फिलहाल कोई निर्णय नहीं हाे पाया है। वर्तमान में इस सिनेमाघर के आंतरिक हिस्से में ताेड़फाेड़ का काम चल रहा है।

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  • 35 साल में 2500 से ज्यादा फिल्में लग चुकी हैं मंथन सिनेमा में
  • 50 के दशक में 4 से ज्यादा ओपन एयर थिएटर थे यहां
  • शशि कपूर के लिए ‘जब-जब फूल खिले’ फिल्म की यहां हुई थी स्पेशल स्क्रीनिंग
  • राजेंद्र व नर्सिंह टॉकिज पहले ही हो चुके हैं बंद

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प्यार झुकता नहीं.. से शुरू बागी पर खत्म
मंथन में 17 जून 1985 को “प्यार झुकता नहीं’ फिल्म से शुरू हुआ सिलसिला बागी-3 पर आकर थम गया। शुरू में तो टिकट दर भी बहुत कम थी। बॉक्स के साढ़े चार, फर्स्ट क्लास के ढाई रुपए व आगे के लिए मात्र अस्सी पैसे टिकट के लगते थे। बढ़ते-बढ़ते यह दर क्रमशः 130, 120, 90 रुपए तक पहुंच गई। पानी भी 5 पैसे प्रति ग्लास के हिसाब से अंदर ही मिलता था। पार्किंग तब साइकिल स्टैंड कहलाता था औैर यहां साइकिल पार्क करने का शुल्क 10 पैसे था।

ओपन एयर थिएटर भी थे यहां
शहर में मंथन सिनेमा के साथ लंबे समय तक राजेंद्र व नृसिंह सिनेमाघर भी सक्रिय थे। पचास के दशक में तो चार से ज्यादा ओपन एयर थिएटर थे, जिनमें से एक शिव टॉकिज के नाम से चलता था। दर्शकों को लुभाने के लिए सर्दियों में गर्म दूध, चाय व गर्मियों में कुल्फी मुफ्त बांटी जाती थी। शाम ढलते ही इन थिएटर्स में पानी का छिड़काव होता था। सामान्यतया दर्शक जमीन पर बैठकर फिल्म का आनंद लेते थे।

  • शिव टॉकिज हमारे परिसर में चलता था। पिताजी बताते थे कि दर्शकों को मनुहार के साथ बुलाया जाता था। चूंकि ओपन एयर थिएटर था, इसलिए टिकट पर ही लिखा होता था, “लाइट जाने पर शो बंद, पैसे वापस नही होंगे।’ अधिकतम दर्शक सिनेमाघर में लाने की होड़ सी रहती थी। - अजय माथुर, एडवोकेट
  • मंथन टॉकिज अभी तो बंद है। आगे इसका क्या स्वरूप रहेगा, इसे लेकर प्लानिंग विचाराधीन है, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। - अशोक मेवाड़ा, मालिक मंथन
  • महानगर के पीवीआर आईनोक्स की तर्ज पर जोधपुर राेड पर मल्टीप्लेक्स बनवा रहा हूं। यह आधुनिक सुविधाओं व तकनीक से निखरा हुआ होगा। जल्द ही दर्शकों के लिए इसे शुरू करेंगे। - पुनीत मेवाड़ा, मालिक मल्टीप्लेक्स

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