खुदाई में निकले सोने के सिक्कों से बनाया था तालाब!:एक लाख ऊंटों का इस्तमाल हुआ इसलिए नाम पड़ा लाखोटिया, जलसंकट की स्थिति देख करीब 971 साल पहले संत चंदनपुरी ने खुदवाया था

पाली4 महीने पहले
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पानी दरवाजा जूना मठ के संत चंदनपुरी ने तालाब खुदवाया और टेकरी पर शिव लिंग स्थापित किया था। - Dainik Bhaskar
पानी दरवाजा जूना मठ के संत चंदनपुरी ने तालाब खुदवाया और टेकरी पर शिव लिंग स्थापित किया था।

श्रावण माह में इन दिनों भगवान शिव के मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिल रही। श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना में लीन हैं। आज हम आपको शहर के प्रसिद्ध लाखोटिया महादेव मंदिर के इतिहास एवं यहा शिवलिंग की स्थापना करने वाले संत के जीवन से रूबरू करवाते हैं।

शहर के लाखोटिया महादेव मंदिर व तालाब का इतिहास काफी पुराना और रोचक है। कहा जाता है कि करीब 971 वर्ष पूर्व पल्लीपुर (पाली) में जलसंकट की स्थिति उत्पन्न हुई थी। ऐसे में पानी दरवाजा जूना मठ के संत चंदनपुरी ने तालाब खुदवाया और टेकरी पर शिव लिंग स्थापित किया था। कहां यह भी जाता हैं कि तालाब खुदाई के दौरान एक लाख ऊंटों का उपयोग किया गया था। इसलिए मंदिर का नाम लाखोटिया महादेव और तालाब का लाखोटिया तालाब पड़ गया। बाद में संत ने लाखोटिया तालाब के किनारे ही बने जूना मठ में समाधि ली। समय के साथ-साथ लाखोटिया तालाब व मंदिर का विकास तो होता रहा लेकिन शहर को दो बड़ी सौगात देने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले संत चंदनपुरी का जूना मठ आज भी उपेक्षा का शिकार है। मठ की ओर जाने वाला रास्ता अतिक्रमण के कारण इतना संकरा हो गया हैं कि एक कार भी मठ परिसर तक नहीं पहुंच सकती।

मठ के पुजारी भोलापुरी संत चंदनपुरी की चिलम, आसन दिखाते हुए। जो करीब 900 साल पुराने हैं तथा आज भी मठ में सुरक्षित हैं।
मठ के पुजारी भोलापुरी संत चंदनपुरी की चिलम, आसन दिखाते हुए। जो करीब 900 साल पुराने हैं तथा आज भी मठ में सुरक्षित हैं।

खुदाई में निकले थे सोने के सिक्के

मान्यता है कि लाखोटिया तालाब की खुदाई के दौरान सोने के सिक्के निकलते थे। संत यह सिक्के ही मजदूरों को खुदाई के बदलते देते थे। मान्यता यह भी है कि संत कमलनुमा आकर के एक पत्थर पर बैठकर जूना मठ से लाखोटिया महादेव मंदिर में भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। इस पत्थर सहित संत की चमत्कारी छड़ी, दो बड़े शंख, धूणी, कमलनुमा पत्थर, चिलम, भाला, एक लकड़ी का डमरू आदि आज भी जूना मठ में पड़े हैं।

मठ में रखी संत चंदपुरी की छड़ी जो करीब 900 साल पुरानी हैं।
मठ में रखी संत चंदपुरी की छड़ी जो करीब 900 साल पुरानी हैं।

संत ने ली थी जीवित समाधि

कहा जाता है कि संत महिलाओं का मुंह नहीं देखते थे और मठ में महिलाओं का प्रवेश भी वर्जित था। संत चंदनपुरी की बहन अन्नपूर्णा एक बार उनसे मिलने मठ में आ गई, जिसका चेहरा देखने के बाद संत ने समाधि लेने का निर्णय लिया। उनकी बहन को पता चला कि भाई उनके कारण समाधि ले रहे हैं तो वह भी मठ पहुंचीं, जहां दोनों भाई-बहन ने जीवित समाधि ली। जो आज भी जूनामठ में स्थित है।

मठ की धुड़ी।
मठ की धुड़ी।

मठ को जीर्णोद्धार की दरकरार

वर्तमान में जूना मठ आश्रम में रह रहे भोलापुरी ने बताया कि विक्रम संवत 1107 में संत चंदनपुरी ने मठ की स्थापना की थी। उसी दौरान संत ने लाखोटिया तालाब व तालाब की टेकरी पर शिवलिंग की स्थापना की थी तथा नाम दिया था लाखोटिया महादेव। लेकिन शहर को लाखोटिया महादेव व तालाब की सौगात देने वाले संत के एतिहासिक मठ को जीर्णोद्वार की आवश्यकता है। लेकिन इसको लेकर प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा। मठ की तरफ आने वाला रास्ता अतिक्रमण के कारण इतना संकरा हो गया कि यहां जीर्णोद्वार का कार्य शुरू भी करवाए तो निर्माण सामग्री लेकर ट्रेक्टर तक मठ परिसर में नहीं आ सकता। लोगों ने घरों के आगे चबुतरी बना रखी हैं। जिससे मठ की ओर आने वाला रास्ता महज 5-6 फीट चौड़ा ही रह गया हैं।

पानी दरवाजा के निकट स्थित मठ का मुख्य द्वार।
पानी दरवाजा के निकट स्थित मठ का मुख्य द्वार।
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