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छाता उद्योग काे उम्मीद:पिछले लॉकडाउन में 80% कच्चा माल गोदामों में रह गया, इस सीजन छाता इंडस्ट्री को उम्मीद

पाली6 दिन पहले
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मानसूनी सीजन में भी फैक्ट्रियां बंद रही व लाॅकडाउन के चलते लाेगाें के घराें में रहने से डिमांड भी जीराे ही रही। - Dainik Bhaskar
मानसूनी सीजन में भी फैक्ट्रियां बंद रही व लाॅकडाउन के चलते लाेगाें के घराें में रहने से डिमांड भी जीराे ही रही।
  • कोरोनाकाल में चीन से आयात बंद हुआ तो बढ़ी उम्मीद, लेकिन देशभर में डिमांड घटी
  • 80 से 100 करोड़ का सालाना टर्नओवर, लेिकन कोरोना ने रोक दी रफ्तार

काेराेना का असर फालना के छाता उद्याेग पर भी पड़ा। मानसूनी सीजन में भी फैक्ट्रियां बंद रही और लाॅकडाउन के चलते लाेगाें के घराें में रहने से डिमांड भी जीराे ही रही। हर साल करीब 80 से 100 कराेड़ का टर्नओवर करने वाला यह काराेबार काेराेनाकाल में ठप हाे गया और 80 प्रतिशत कच्चा माल गाेदामाें में ही पड़ा रहा।

इसकी भरपाई के लिए छाता उद्यमियाें ने इस साल 5 से ज्यादा नई वैरायटी के साथ छाते मार्केट में उतारे हैं। लगभग 35 कारखानाें और इतने ही गांवाें में कुटीर उद्योग की तर्ज पर छाता बनाने का कारोबार पाली जिले के फालना कस्बे से संचालित हो रहा है। नए-नए रंगों में स्टाइलिश 450 से ज्यादा पैटर्न में छाते तैयार कर मार्केट में उतारे जाते हैं।

जंबो, गार्डन, मोनो व मल्टी कलर डिजाइन में 5 फोल्ड वाले छाते : मांग के अनुसार आधुनिक बनाने के लिए प्रयोग भी करते हैं। इस बार तीन से पांच फाेल्ड वाले अंब्रेला, जंबाे अंब्रेला जिसमें एक साथ तीन लाेग आ सके, माेनाे कलर जिसमें बाहर अलग रंग और भीतर दूसरा रंग, गार्डन अंब्रेला के साथ ही बच्चाें के लिए भी अलग-अलग शेड्स व माॅडर्न प्रिंट में छाते तैयार कर मार्केट में उतारे गए हैं।

छाते की इकॉनाेमी : लाेहे और प्लास्टिक के बढ़े दामाें से 15-20 प्रतिशत बढ़ी लागत

लोहे के दामों में दोगुनी से ज्यादा वृद्धि व प्लास्टिक की कीमतें भी बढ़ जाने से छाते की लागत मूल्य में भी 15 से 20 प्रतिशत औसतन वृद्धि हुई है। उद्यमियाें काे पिछले साल कोरोना के चलते तैयार माल को अब मार्केट मिलने की उम्मीद है।

यहां तैयार छाते राजस्थान के साथ ही केरल, मुंबई, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बंगाल, कर्नाटक सहित देश के कई हिस्साें में जाते हैं। कुछ राज्यों में अभी भी लॉकडाउन के हालात होने से डिमांड नहीं है। मुंबई में भी प्री मानसून बरसात में थाेड़ी मांग बढ़ी थी, लेकिन अब डिमांड बिल्कुल नहीं है।

ताड़ियां, ट्यूब फ्रेम यहीं तैयार, शेष बाहर से आता है कच्चा माल

छाते के कुछ पार्ट्स फालना में बनते हैं। इसकी ट्यूब, ताड़ियां, फ्रेम सहित अन्य कच्चा माल यहीं तैयार हाेता है। छाते को बनाने के लिए लोहे की ट्यूब व सीआर स्ट्रिप बहादुरगढ़ दिल्ली व चंडीगढ़ से आती है। छाते को लगाने के लिए हैंडल मुंबई से मंगाया जाता है। इस पर लगाये जाने वाला कपड़ा कोलकाता और चीन, ताइवान व दुबई तक से मंगाया जाता है। ताड़ियों पर लगाने के लिए नायलाेन, साटन और डिजाइनर कपड़ा भी मुंबई से मंगाया जाता है।

71 साल पहले 20 कारीगराें के साथ शुरू हु काराेबार

फालना में 71 साल पहले सागरमल चाेपड़ा ने 20 कारीगराें के साथ छाता बनाने का काम शुरू किया था। उनके पुत्र देवेंद्र चाैपड़ा बताते हैं कि आज यह उद्याेग फालना के लिए ब्रांड बन गया है। अब यहां 1000 कारीगर-मजदूर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस काराेबार से जुड़े हुए हैं।​​​​​​​

जीएसटी 12 से घटकर 5 प्रतिशत हाेनी जरूरी

पिछले साल 80 प्रतिशत कच्चा माल बच गया था, इस बार मार्केट अच्छा रहने की उम्मीद है। हालांकि अभी कहीं से भी डिमांड नहीं है। चीन से इस उद्योग की सीधी प्रतिस्पर्धा है। इस कंज्यूमेबल आइटम के उद्योगों को बचाने के लिए इस पर 12 की बजाय 5 प्रतिशत जीएसटी किया जाना चाहिए, तभी आर्थिक समाधान संभव है। -उमेश शर्मा, राजस्थान अंब्रेला इंडस्ट्रीज एसाेसिएशन फालना​​​​​​​

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