मारवाड़ की 'इम्युनिटी बूस्टर' कच्ची हल्दी की सब्जी:काजू-बादाम से भी महंगा जायका 5 स्टार होटलों तक पहुंचा, करोड़ों का कारोबार बना

पाली4 महीने पहलेलेखक: ओम टेलर

भोजन की मनुहार के लिए प्रसिद्ध मारवाड़ का हर खान-पान अनूठा है। सर्दियों के मौसम का एक खास जायका लोगों के दिल में जगह बना रहा है। ये है कच्ची हल्दी की सब्जी जिसे मारवाड़ का इम्युनिटी बूस्टर कहा जाता है। मारवाड़ की संस्कृति में ये जायका सैकड़ों बरसों से लोगों की थाली का हिस्सा है। इसकी सौंधी-सौंधी महक देशभर में लोगों तक पहुंच रही है। यह शाही सब्जी अब होटलों व शादियों के मेन्यू तक में शामिल हो गई हैं। तो इस बार आपको ले चलते हैं उस जायके के सफर पर जिसका स्वाद भी बेहतरीन है और ये इम्युनिटी भी बढ़ाता है...

बहुत कम लोगों को पता होगा कि मसालों में शुमार हल्दी की सब्जी भी खाई जाती है। राजस्थान में विशेषकर मारवाड़ क्षेत्र में राजस्थानी इस सब्जी को बड़े शौक से खाते हैं। इसे मारवाड़ का सुपर फूड कहा जाए तो यह गलत नहीं होगा। कच्ची हल्दी का सीजन नवम्बर से जनवरी तक रहता हैं। खास बात यह है कि हल्दी की पैदावार कोटा, बूंदी और उदयपुर क्षेत्र में होती है। इसकी सबसे ज्यादा खपत मारवाड़ के 5 जिलों जोधपुर, पाली, सिरोही, जालोर और नागौर में होती है।

तीन माह में 63 हजार किलो खपत केवल पाली में
पाली जिले में ही सर्दियों के 3 महीने में 63 हजार किलो हल्दी की सब्जी की खपत होती है। पाली सब्जी मंडी अध्यक्ष ढलाराम परिहार की मानें तो रोजाना करीब 500 किलो कच्ची हल्दी और इसमें डालने वाले 10 क्विंटल मटर और गाजर भी बिकते हैं। जिले में औसतन 700 किलो हल्दी रोजाना बिकती हैं। ऐसे में तीन माह में करीब 63 किलो हल्दी पाली जिले में बिक जाती है।

हल्दी की सब्जी बनाने की रेसिपी
सबसे पहले कच्ची हल्दी की गांठों को छीलकर उसे कद्दूकस कर लेते हैं। पैन में घी गर्म कर उसमें कच्ची हल्दी के कस को भूना जाता है। एक पैन में एक किलो घी डालते हैं। उसमें बारीक कटे प्याज को हल्का ब्राउन होने तक भुनते हैं। इसमें अदरक, लहसुन का पेस्ट डालते हैं। इसके साथ ही बारीक कटी हुई हरी मिर्च डाल कर भून लेते हैं। इस दौरान एक बर्तन में 1 किलो दही लेकर उसमें मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर और नमक डालकर अच्छे से मिला लेते हैं। इसे मसाले में डाला जाता है। मसाला पकाते समय इसे चलाते रहना पड़ता है। भुनी हुई हल्दी डालते हैं। एक तय समय तक हल्दी को पकाते हैं। जब हल्दी घी छोड़ना शुरू कर देती हैं तो समझ ले कि आपकी हल्दी की सब्जी अब तैयार हैं।

600 से 1000 रुपए किलो तक भाव
एक किलो कच्ची हल्दी बनाने में करीब 1000 रुपए खर्च होते हैं। इसमें 600 से 800 रुपए किलो का शुद्ध देशी घी, 120 रुपए किलो दही, करीब 100 रुपए के ड्राई फ्रूट और 80 से 100 रुपए किलो में मिलने वाली कच्ची हल्दी डलती है। पुष्कर होटल के कृष्णकुमार वैष्णव ने बताया कि तैयार हल्दी की सब्जी का बाजार भाव 600 रुपए किलो से शुरू होता है। एक रेस्टोरेंट पर सीजन में करीब 25 से 30 किलो हल्दी की सब्जी बिक जाती है। पाली शहर में ऐसे करीब 30 रेस्टोरेंट हैं, जहां हल्दी की स्पेशल सब्जी बनाई जाती है। सब्जी की खास बात यह है भी कि ये 5 दिन तक भी खराब नहीं होती।

मारवाड़ के इतिहास में ‘हल्दी गोठ’परम्परा
मारवाड़ में गोठ मनाने की परम्परा का जिक्र इतिहास में भी मिलता है। सबसे अधिक प्रमाण जोधपुर महाराजा तख्त सिंह की ख्यात 1843 से 1873 में मिलते हैं। उस दौर में मारवाड़ के मुत्सदी, ताजीमी जागीरदार, खास पासवान, बख्शी, दीवान, हाकम, किलेदार अनेक अवसर पर महाराजाओं को गोठ के लिए आमंत्रित करते थे। जोधपुर में भीम भड़क, तखतगढ़ माचिया किला, कायलाना गोठ के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था। यहां पर महाराजा शिकार के बाद गोठ में शामिल होते थे।

सर्दी ही हल्दी खाने का अनुकूल मौसम
कच्ची हल्दी की पैदावार अक्सर दिसम्बर माह में बाजार में आती है। सर्दी का मौसम ही हल्दी खाने के अनुकूल होता है। कोरोना महामारी केस लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में हल्दी की सब्जी खाना सेहत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। आयुष चिकित्सक जितेन्द्र भुरटिया के अनुसार हल्दी में पाया जाने वाला करक्यूमिन बहुत अच्छा एन्टी ऑक्सीडेंट है, जो शरीर में सूजन को रोकता है। हल्दी रक्त को साफ करती है, त्वचा रोग, खुजली, दर्द, गठिया, श्वास और घाव की औषधि है। इम्युनिटी के लिए इसका उपयोग तो सबको ज्ञात ही है। नवीन शोध के अनुसार हल्दी हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर से लड़ने में भी सहायक है।

सहयोग : पूर्णिमा बोहरा

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