नवरात्रा विशेष: नाडोल का 1077 वर्ष प्राचीन आशापुरा माता मंदिर:मां भक्तों की आश पुरी करती हैं इसलिए नाम पड़ा आशापुरा माता, सालाना आता है 3 करोड़ का चढ़ावा

पाली।11 दिन पहले
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पाली जिले के नाडोल स्थित मां आशापुरा के मंदिर में दर्शन करते भक्त। - Dainik Bhaskar
पाली जिले के नाडोल स्थित मां आशापुरा के मंदिर में दर्शन करते भक्त।

नवरात्रा के प्रथम दिन हम आपको पाली जिला मुख्यालय से महज 60 किलोमीटर की दूरी पर आबाद ऐतिहासिक नाडोल गांव मां आशापुरा के प्राचीन मंदिर से रूबरू करवा रहे हैं। जो करीब 1077 साल प्राचीन मंदिर हैं। जिसके कारण नाडोल देश भर में जाना-पहचाना जाता हैं। यूं तो साल भर यहां भक्तों का आना-जाना लगा रहता हैं लेकिन नवरात्रा में यहां मेले सा माहौल रहता हैं।

मां आशापुरा शाकम्भरी मां का ही रूप रहे। जो चौहानों सहित अन्य कई गोत्रों की कूलदेवी हैं। कहते हैं कि यहां आने वाले भक्तों की आशा पूरी होती हैं इसलिए मां शाकम्भरी का नाम बाद में आशापुरा माता पड़ गया। हर्ष के शिलालेख के अनुसार इस मंदिर व नाडोल में चौहान वंश की स्थापना सवंत 1030 या 973 ई में की गई। इतिहासकारों के अनुसार महाराजा लक्ष्मण (लाखन) चौहान ने विक्रम संवत 1001 (सन 944 ई) में नाडोल में मां आशापुरा का पाट स्थान की स्थापना की।

मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भोजन व रहने की सुविधा के साथ यहां मंदिर परिसर में एक प्राचीन बावड़ी भी बनी हुई हैं जो महाराजा लक्ष्मण चौहान ने अपने कार्यकाल में बनवाई थी। इस बावड़ी से मंदिर की भोजनशाला सहित अन्य जगह उपयोग लिया जाता हैं।

कभी चढ़ती थी पशुबलि
यहां पहले मंदिर में माता को पशु बलि दी जाती थी। वर्ष 1995 में लोकमान्य संत रूपमुनि ने यहां पशु बलि बंद करवा दी। उसके बाद से मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं एवं मंदिर के चढ़ावे में काफी इजाफा हुआ।

नाडोल में आशापुरा मंदिर में स्थित प्राचीन बावड़ी। जिसका जल आज भी उपयोग में आता हैं।
नाडोल में आशापुरा मंदिर में स्थित प्राचीन बावड़ी। जिसका जल आज भी उपयोग में आता हैं।

ऐसे हुई नाडोल में चाहौन वंश की स्थापना
पिता वाक्पतिराज की मौत के बाद बड़े भाई सिंहराज सांभर की गद्दी पर बैठ गए। छोटे भाई लक्ष्मण को गुजारे के लिए छोटी सी जागरी दे दी। लेकिन वे बहुत कुछ करना चाहते थे। इसलिए सांभर का त्यागकर अपनी पत्नी व सेवक के साथ पुष्कर होते हुए पाली के नाडोल पहुंच गए। कहते हैं कि मां शाकम्भरी के आशीर्वाद से ही महाराजा लक्ष्मण चौहान नाडोल में सिंहासन मिला था। तब से मां आशापुरा चौहान की कुलदेवी मानी गई।

नाडोल के आशापुरा मंदिर की बावड़ी के बाहर लगा पशुबलि बंद करने का शिलालेख।
नाडोल के आशापुरा मंदिर की बावड़ी के बाहर लगा पशुबलि बंद करने का शिलालेख।

वर्तमान में चला मंदिर का जीर्णोद्वार
वर्तमान में मंदिर ट्रस्ट की ओर से मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया जा रहा हैं तथा यहां एक भव्य प्रवेश गेट सहित अन्य निर्माण कार्य करवाएं जा रहे हैं जो इन दिनों प्रगति पर हैं।

पाली जिले में स्थित नाडोल गांव में मां आशापुरा मंदिर जाने के रास्ते पर बना भव्य गेट।
पाली जिले में स्थित नाडोल गांव में मां आशापुरा मंदिर जाने के रास्ते पर बना भव्य गेट।

मां आशापुरा के नाम से मंदिर में एकाउंट, सालाना आता हैं 3 करोड़ का चढ़ावा
मंदिर ट्रस्ट के व्यवस्थापक लालसिंह शक्तावत ने बताया कि सालाना करीब 3 करोड़ का चढ़ावा, भेंट मंदिर में श्रद्धालुओं की ओर से आती हैं। मां आशापुरा के नाम से एकाउंट हैं। इस राशि से मंदिर विकास, निर्माण, श्रद्धालुओं के लिए भोजन आदि की व्यवस्था की जाती हैं।

पाली के नाडोल स्थित प्राचीन आशापुरा मां मंदिर में निर्माणाधीन भव्य गेट।
पाली के नाडोल स्थित प्राचीन आशापुरा मां मंदिर में निर्माणाधीन भव्य गेट।

कोरोना गाइड लाइन के तहत मंदिर में दर्शन
नवरात्रा में कोरोना गाइड लाइन के अनुसार आशापुरा मंदिर में भक्तों को दर्शन करवाए जा रहे हैं। कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए इस बार कोई बड़ा आयोजन मंदिर में नहीं किया जा रहा।

मंदिर ट्रस्ट के व्यवस्थापक लालसिंह शक्तावत।
मंदिर ट्रस्ट के व्यवस्थापक लालसिंह शक्तावत।