समाज उत्थान के लिए सराहनीय पहल:पिता की मौत पर बेटों ने नहीं किया मृत्युभोज, बचे पैसे से जरुरतमंदों को बांटे कंबल, आर्थिक कमजोर बच्चों को पढ़ाएंगे

पाली।4 महीने पहले
पाली जिले के बिलरड़ी (झूंठा) गांव  में पिता के देहांत के बाद जरुरतमंदों में कंबलें बांटते हुए परिवार के सदस्य। - Dainik Bhaskar
पाली जिले के बिलरड़ी (झूंठा) गांव में पिता के देहांत के बाद जरुरतमंदों में कंबलें बांटते हुए परिवार के सदस्य।

पाली जिले में आज भी कई समाजों में परिवार के किसी सदस्य की मौत होने पर मृत्युभोज या मौताणा करने का रिवाज है। सरगरा समाज भी इनमें शामिल है। लेकिन पाली जिले के बिलरड़ी (झूंठा) में रहने वाले सरगरा समाज के एक परिवार ने इस सामाजिक कुरीति को मिटाने के लिए सरकारात्मक पहल की है। परिवार के तीन भाइयों ने मिलकर पिता की मौत के बाद मृत्युभोज न करने का निर्णय लिया।

8 जनवरी को पिता की मौत के बाद परिवार के कुछ रिश्तेदारों ने सामाजिक स्तर पर आयोजन करने पर जोर दिया। लेकिन तीनों भाई अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने 12 दिन तक चलने वाले शोक कार्यक्रम को भी 5 दिन में पूरा कर लिया। इसके बाद इन्होंने 51 हजार रुपये सरगरा समाज विकास समिति को दान कर दिये। मृत्युभोज में खर्च होने वाले पैसे से जरुरतमंदों में कम्बल बांटे। और अब समाज के प्रतिभावान बच्चों को उच्च शिक्षित करने में पैसा खर्च करेंगे। समाज के लोग ही अब इसे सराहनीय कदम बता रहे हैं।

पाली जिले के बिलरड़ी गांव निवासी 95 साल के रामलाल चौहान का देहांत हो गया था। समाज में यह परंपरा है कि परिवार के किसी वृद्ध सदस्य की मौत होने पर मृत्युभोज किया जाए। कोरोना की स्थिति को देखते हुए तथा इस सामाजिक कुरीति को मिटाने के उद्देश्य से रामलाल के तीनों बेटों ने मृत्युभोज नहीं करने का निर्णय लिया।

एक बेटा ग्राम पंचायत सहायक तो दूसरा कांस्टेबल
रामलाल का बड़ा बेटा बलदेव झूंठा में ग्राम पंचायत सहायक है, दूसरा बेटा शेषमल झूंठा गांव में ही खेती करता है। सबसे छोटा बेटा मुकेश कांस्टेबल है जो सोजत थाने में तैनात है। परिवार सक्षम होने के बाद भी तीनों भाइयों ने पिता के देहांत पर मृत्युभोज नहीं करने का निर्णय लिया था। इस काम में खर्च होने वाली राशि को समाज उत्थान में खर्च करने का निर्णय लिया। जिस पर समाज के लोगों ने उनकी सराहना की।

पिता की थी इच्छा
बलदेव सरगरा ने बताया कि पिता रामलाल सरगरा की इच्छा थी कि मृत्युभोज जैसे आयोजनों में लाखों रुपए फिजूल खर्च करने से अच्छा है कि इस राशि को समाज उत्थान में लगाया जाए। पिता की इस भावना की कद्र करते हुए ही तीनों भाइयों ने उनके देहांत के बाद मृत्युभोज आयोजित नहीं करने का निर्णय लिया।