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ऊंट और बैलगाड़ी पर निकली बारात:पाली में 50 साल पुरानी परंपरा हुई जीवंत, सोशल डिस्टेंसिंग के साथ दूल्हे के साथ परिवार वाले भी हुए सवार

पालीएक महीने पहले

पाली में 50 साल पुरानी परंपरा जीवंत हुई। मोटर गाड़ियों के इस युग में बारात ऊंट और बैलगाड़ी से निकली। इसी गाड़ी पर दूल्हा व उसके परिवार वाले सवार थे। ऊंट और बैलों के साथ ही गाड़ियों को भी सजा-धजा कर आकर्षक बनाया गया था। इस बारात को देख बुजुर्गों के मुंह से निकल उठा- हमारा जमाना लौट आया है। हमारे जमाने में बारात इसी तरह जाती थी। न शोरगुल होता था, न ही प्रदूषण जैसी कोई समस्या होती थी। जिस राह से भी बारात निकली लोग निहारते रह गए। बाकायदा दुल्हन पर इसी गाड़ी पर विदा होकर आई।

संस्कृति की झलक

गत दिनों रानी क्षेत्र से बैलगाड़ी व ऊंटगाड़ी पर बारात जाती नजर आई। इसमें दूल्हा भी बैलगाड़ी पर सवाल था। करीब सात-आठ ऊंट व बैलगाड़ियों पर 25 के करीब बाराती सोशल डिस्टेंसिंग के साथ नजर आए। इसी तरह देसूरी निवासी दूल्हा दिलीप चौधरी चार बैलगाडिय़ों पर 16 बारातियों को लेकर दुल्हन के घर पहुंचे। दिलीप ने बताया, प्रत्येक बैलगाड़ी पर चार बाराती थे। सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखा था। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय पर बाराती कम ले जाना है, इसलिए यह रास्ता चुना। बैलगाड़ी से दुल्हन के घर तक 7 किलोमीटर का सफर तय करने में 2 घंटे लगे। इसी तरह, दूल्हे व 21 बारातियों के साथ मेवी कलां से खिंवाड़ा बैलगाड़ी व ऊंटगाड़ी में बारात पहुंची। लसिंह के पुत्र हर्षवीरसिंह की बारात खिंवाड़ा निवासी महेन्द्र सिंह उदावत के घर पहुंची। ऊंट व बैलगाड़ी में बारात को देख लोगों ने इस पल को मोबाइल के कैमरे में कैद किया।

बुजुर्ग की जुबानी अपने जमाने की कहानी

रावलवास गांव निवासी भूराराम गुर्जर ने बताया कि करीब 60 वर्ष पूर्व उनकी शादी हुई थी। बारात 7 बैलगाडिय़ों में रावलवास से रवाना होकर उतवण गांव गई थी। उनके गांव से करीब छह किलोमीटर दूर था। कोरोना काल में फिर से कुछ बारात ऊंट व बैलगाडिय़ों पर जाते देख उन्हें अपने जमाने की याद आ गई। उन्होंने बताया कि उस समय परिवहन के साधनों में ज्यादातर ऊंट व बैलगाड़ियों का ही चलन था।

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