नेत्रहीन शिक्षक की कहानी:माता-पिता अनपढ़, खुद की आंखों में उजाला नहीं, स्टूडेंट के जीवन में भर रहे ज्ञान की रोशनी

पाली3 महीने पहले
बालिया स्कूल में स्टूडेंट को पढाते टीचर।

शिक्षक दिवस (teachers day special) पर आज हम आपको पाली जिले के एक ऐसे शिक्षक से मिलाते हैं जो आंखों से देख नहीं सकते लेकिन अपनी मेहनत व लगन से पढ़ाई पूरी कर शिक्षक बने। ब्रेललिपि के जरिए वे स्टूडेंट को पढ़ाते हैं। स्टूडेंट का कहना हैं कि उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि सर आंखों से देख नहीं सकते। वे जो पढ़ाते हैं वही किताब में लिखा होता हैं।

हम बात कर रहे हैं पाली जिले के कूरणा गांव निवासी बाबूलाल पुत्र कुपाराम घांची की। जो वर्तमान में बालिया स्कूल में शिक्षक हैं। बाबूलाल जिले के एकमात्र शिक्षक हैं जो आंखों से देख नहीं सकते लेकिन ब्रेललिपि के जरिए स्टूडेंट को फरोर्ट से संस्कृत पढ़ाते हैं। शिक्षक बाबूलाल ने यहां तक पहुंचे ने के लिए लम्बा संघर्ष किया। उन्होंने बताया कि

जब वे 9 साल के थे तो उन्हें टाइफाइड हो गया। माता-पिता अनपढ़ थे। उन्होंने देशी दवाइयां दी। जिससे उनकी आंखों की रोशनी काफी कम हो गई। सामान्य स्कूल में पढ़ाई करने के लिए एडमिशन लिया लेकिन आंखों पर जोर पढ़ने के कारण उनकी आंखें और ज्यादा कमजोर हो गई। इसलिए स्कूल छोड़ना पड़ा। वर्तमान में उनको बहुत ही कम दिखता हैं। किताब तक नहीं पढ़ सकते इसलिए ब्रेल लिपि से बच्चों को पढ़ाते हैं। स्कूल बोर्ड पर कुछ लिखना हो तो बोल कर विद्यार्थी से लिखवाते हैं।

ब्रेल लिपि से स्टूडेंट को पढ़ाते शिक्षक बाबूलाल।
ब्रेल लिपि से स्टूडेंट को पढ़ाते शिक्षक बाबूलाल।
शिक्षक बाबूलाल जो बोल रहे हैं उसे बोर्ड पर लिखती छात्रा।
शिक्षक बाबूलाल जो बोल रहे हैं उसे बोर्ड पर लिखती छात्रा।
ब्रेल लिपि से लिखते हुए शिक्षक।
ब्रेल लिपि से लिखते हुए शिक्षक।
घर पर पैरों से दिव्यांग पत्नी की मदद करते हुए।
घर पर पैरों से दिव्यांग पत्नी की मदद करते हुए।

12 वर्ष की उम्र में लिया कक्षा 1 में प्रवेश
बाबूलाल को लगा कि घर बैठकर वे अपना जीवन नहीं संवार पाएंगे। ऐसे में भाई के सामने पढ़ने की इच्छा जाहिर की। उन्हें जैसे-तैसे कर वर्ष 1889 में जोधपुर के चौपासनी ब्लाइंड स्कूल में उनका एडमिशन करवाया। उस समय उनकी उम्र 12 वर्ष थी और उन्हें वहां कक्षा 1 में प्रवेश मिला। 8वीं तक की पढ़ाई यहां पूरी की बाद में 9 से 12 तक की पढ़ाई अजमेर में पूरी की। फिर पीछे मुडकर नहीं देखा वर्ष 2002 में जोधपुर से स्नातक की। बाद में दिल्ली में विशेष शिक्षा (दिव्यांगों को पढ़ाने के लिए) में बीएड की बाद में वर्ष 2006-07 में सामान्य वर्ग में बीएड की। वर्ष 2008 में एमए संस्कृत में की।

वर्ष 2008 में मिली मंजिल

आखिर वो दिन भी आया जब शिक्षक बाबूलाल के संघर्ष को विराम मिलना था। अगस्त 2008 में उन्हें थर्ड ग्रेड टीचर के रूप में ज्वाइंनिंग की। पहली पोस्टिंग पाली के चीमा बाई संचेती स्कूल नाडी मोहल्लो में मिली। वर्ष 2015 में पदोन्नत होकर बालिया स्कूल आ गए। वर्तमान में यहा ही पढ़ा रहे हैं।

पत्नी भी दिव्यांग लेकिन बने दोनों एक-दूसरे का सहारा
शिक्षक बाबूलाल की पत्नी शांतादेवी 10वीं तक पढ़ी हुई हैं। जो दोनों पैरों से दिव्यांग हैं। लेकिन आज दोनों ने अपनी कमजोर को ताकत में बदल दिया और एक-दूसरे का सहारा बने हुए हैं। आंखों से बहुत कम दिखने के कारण परीक्षा की कॉपियां जांचने में शांता देवी अपने शिक्षक पति की मदद करती हैं। वे पूरा प्रश्न व उसका उत्तर उन्हें पढ़कर सुनाती हैं। उसके बाद वे किस प्रश्न को कितने नम्बर देने हैं यह तय करते हैं। शिक्षक बाबूलाल ने बताया कि उन्हें आंखों से काफी कम दिखता हैं।

दिव्यांगों के लिए संदेश
शिक्षक बाबूलाल ने दिव्यांगों को संदेश देते हुए कहा कि हिम्मत व लगन के साथ मंजिल की तरफ कदम बढ़ाए तो मंजिल जरूर मिलती हैं। उन्होंने कहा कि जो आंखों से देख नहीं सकते। उन्हें बेहतर भविष्य के लिए ब्लाइंड स्कूल में एडमिशन लेना चाहिए तथा शिक्षा की ज्योत जीवन में जलाकर अपने जीवन में उजाला करना चाहिए।