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  • Teachers Who Have Been Imprisoned During The Period Of Kareenakal, Duty Till 2 O'clock, Go To The Homes Of Suspected Patients, So As To Beat The Epidemic.

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कोरोना योद्धा:काेराेनाकाल में याेद्धा बने शिक्षक, रात 2 बजे तक ड्यूटी, संदिग्ध मरीजाें के घरों जाते, ताकि महामारी काे हरा सकें

पाली2 दिन पहले
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  • 11 हजार से अधिक शिक्षकाें की काेराेना काल में अनसुनी कहानियां
  • इनके लिए न ताली बजी, न काेई सम्मान हुआ, लेकिन अपने कर्तव्य पर डटे रहे

कोरोना महामारी के संकटकाल में मेडिकल स्टाफ, पुलिसकर्मी सहित कई काेराेना याेद्धाओं का साहसी सेवाएं प्रदान करने के लिए हर तरफ सम्मान हाे रहा है। जिले के 11 हजार से अधिक शिक्षक किसी भी काेराेना याेद्धा से कम नहीं हैं। इन शिक्षकाें ने स्कूलाें में पढ़ाने के अपने कर्तव्य की नई परिभाषा काेराेना काे हराने के लिए लिख दी।

जाे टाइम टेबल स्कूलाें में बच्चाें काे पढ़ाने के लिए तय हाेता था। उसी प्रकार का टाइम टेबल शिक्षकाें ने काेराेना काे हराने के लिए बना दिया। जहां कहीं भी प्रशासन को सरकारी कार्मिकों की आवश्यकता महसूस हुई, शिक्षकों की तैनाती की गई। इस वर्ग ने अपनी समर्पित और अनुशासित सेवाएं प्रदान कर हर जगह प्रशासन को सहयोग प्रदान किया।

सामान्यतः स्कूल की चारदीवारी में बच्चों के मध्य ही शिक्षण करवाने वाले गुरुजनों ने फील्ड में जाकर मेडिकल स्टाफ एवं अन्य कार्मिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग प्रदान किया। शिक्षकों ने कोरोना मरीजों के लिए बनाए गए कॉविड सेंटर पर दिन रात रहते हुए कोरोना संक्रमण के खतरे के मध्य अपनी समर्पित सेवाएं प्रदान की।

जिले के बाहर के श्रमिकों या अन्य लोगों के लिए बनाए गए आवासीय शिविरों में गांव वालों से आर्थिक सहयोग प्राप्त कर 24 घंटे वहां रहते हुए आवास और खाने की समुचित व्यवस्थाएं की। स्पेशल श्रमिक ट्रेनों के माध्यम से अन्य प्रदेशों से आने एवं जाने वाले यात्रियों का रेलवे स्टेशन पर जाकर पंजीकरण किया। अनेक बार इस कार्य के लिए रात्रि दो बजे भी रेलवे स्टेशन पहुंचे।

ये पूरे किए कर्तव्य
1. घराें पर चार-चार बार उपस्थिति :
कोरोना के शुरुआती दौर में बाहर से आए लोगों के घर पर दिन में चार-चार बार जाकर उनकी उपस्थिति लेकर उनका ठहराव सुनिश्चित किया। ग्रामीण क्षेत्रों में बाहर से आए लोगों का ठहराव सुनिश्चित करने के लिए लगातार उनके आवास के बाहर ड्यूटी की।

2. कंटेनमेंट जाेन में ड्यूटी, घर के सदस्य बनकर किया कार्य : कंटेनमेंट जोन में घर-घर जाकर आमजन के लिए किराणा, दूध, फल, सब्जी सहित आवश्यक सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित की। चेक पोस्टों पर सेवाएं दी। अस्पतालों में हेल्प डेस्क पर 24 घण्टे काम किया।

3. खुद पाॅजिटिव हुए, लेकिन सेवा का जुनून जारी रहा : अनेक शिक्षक कोरोना के शिकार भी हुए। लेकिन उसी जज्बे और जुनून के साथ डयूटी करते रहे। कोरोना काल में अन्य कोरोना योद्धाओं की तरह शिक्षकों की भी अनुशासित और समर्पित सेवाएं सराहनीय रही।

इन उदाहरणाें से समझें कैसे शिक्षकाें ने काेराेनाकाल काे जीया और लाेगाें के लिए प्रेरणा बने

मुझे पीपीई किट पहनाकर काेराेना संदिग्ध व्यक्ति के घर भेज दिया : अमृतलाल
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय खोडिया बालाजी में अध्यापक हूं। मुझे पाली एसडीएम के निर्देशानुसार अप्रैल माह में सभी क्षेत्रों में कंटेनमेंट जाेन बनाना प्रस्तावित था। शहर में नाडी मोहल्ला इलाके में पहला पॉजिटिव केस 28 अप्रैल को आया। सूचना मिलते ही हमारी टीम को नाडी मोहल्ला स्थित सिटी डिस्पेंसरी में तैनात किया गया।

पॉजिटिव केस के संपर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों को कोरोना सेंटर पर पहुंचाना। घर-घर सर्वे करना सैंपल टीम के साथ सहयोग प्रदान करना और किए गए कार्य का ऑनलाइन डाटा सुरक्षित रखना आदि कार्य करने थे। पहली बार नाडी मोहल्ला हॉस्पिटल में ड्यूटी देने पहुंचा। मेरे सामने बहुत ही खतरनाक माहौल था।

मैं काफी डरा हुआ था। क्योंकि मुझे पीपीई किट पहना कर संदिग्ध व्यक्ति के घर भेज दिया गया। स्थानीय व्यक्तियों के सैंपल चिकित्सा टीम तक पहुंचाने का काम मुझे दिया गया। डर के कारण हाथ-पांव कांप रहे थे। लेकिन खुद काे मजबूत रखा और काम में जुट गया। अब वैक्सीनेशन टीम में नियुक्त किया गया है।

22 सालाें से डायबिटीज का मरीज, लेकिन काेराेना महामारी काे हराने काेविड केयर सेंटर में की ड्यूटी : महेश व्यास
सुल्तान स्कूल के प्राध्यापक महेश व्यास बताते हैं कि उन्हें अग्रसेन वाटिका का प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्हें डायबिटीज है, विगत 22 साल से इलाज व प्रतिदिन इन्सुलिन भी लेते हैं। बाेले - आदेश मिलने पर एकबारगी मैं घबरा गया। परन्तु चिकित्सा विभाग के कोरोना वारियर्स का जज्बा देखा मुझे भी इस सेवा को पूर्ण मनोयोग से करने का साहस आ गया।

19 मई 2020 को पहले पहले कोरोना संक्रमित मरीजों को अग्रसेन वाटिका लाया गया। तब मैं और मेरे साथ 6 शिक्षक साथी प्रत्येक पारी के लिए दो शिक्षक एकबारगी सहम उठे थे। हम उन्हें दूर से कोविड वार्ड में जाते देख रहे थे। मैं पहली बार ऐसी महामारी से ग्रसित मरीजों को देख रहा था। यह भ्रम था कि वे अलग से दिखेंगे परन्तु ऐसा नहीं था। वाे सब सामान्य ही नजर आ रहे थे। लेकिन वे सब घबराए हुए, डरे सहमे, आतंकित और तनावग्रस्त थे। न दवा और न ही इलाज। धीरे-धीरे संख्या भी बढ़ने लगी।

एक समय कोविड सेंटर पर 94 मरीज हो गए थे। मेरी जिम्मेदारी उन सब मरीजों के आराम से ठहराने की व्यवस्था करना, भीषण गर्मी में कूलर पंखों की व्यवस्था करना, उनके चाय, नाश्ते, दोनों समय के भोजन का प्रबंध करना, वार्ड की नित्य साफ सफाई, सुविधाओं की नियमित साफ सफाई करवाना तो था। कई बार तनावग्रस्त मरीज हंगामा भी कर लेते। लेकिन उन सबको बहुत धेर्य से समझा बुझा कर शान्त करता। कई बार मरीज के परिजन भी वाटिका के बाहर मरीजों से मिलने की जिद करते, उन्हें भी समझाना और महामारी के खतरे बताकर वापस लौटाना पड़ता था।

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