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स्मृति शेष:पाली में 3 चातुर्मास, इतिहास में पहली बार 2001 में यहां साथ लेकर आए थे 110 साधु-साध्वी व 90 दीक्षार्थियों को

पाली10 महीने पहले
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  • दीक्षा दानेश्वरी गुणरत्न सूरीश्वरजी का देवलोकगमन, सूरत में मंगलवार सुबह साढ़े 3 बजे ली अंतिम सांस
  • जालोर में जन्मे, 21 वर्ष की आयु में सगाई छाेड़ दीक्षा ली, 451 काे दीक्षा देकर दीक्षा दानेश्वरी कहलाए

451 लाेगाें काे दीक्षा देकर धर्मपथ की राह पर चलाने वाले दीक्षा दानेश्वरी आचार्य गुणरत्न सूरिश्वरजी महाराज हमारे बीच नहीं रहे। उनका मंगलवार सुबह लगभग साढ़े 3 बजे सूरत में देवलाेकगमन हाे गया। पाली सहित पूरे देश में शाेक की लहर छा गई।

दीक्षा दानेश्वरी का पाली से अलग ही लगाव था। यही कारण था कि उन्हाेंने यहां तीन चातुर्मास 1979, 1988 और 2001 में किए। संघवी सज्जनराज गजेंद्र कुमार काेचर परिवार द्वारा 1988 और 2001 में चातुर्मास का पूरा लाभ लिया गया।

2001 में ताे उनके सानिध्य में शहर में नया इतिहास रचा गया। उनके साथ एक साथ 110 साधु संत और 90 दीक्षार्थी आए और पूरे चातुर्मास यही रुके। पूरे शहर का वातावरण धर्ममयी हाे गया। हर जैन परिवार के घर में तपस्या हुई। देशभर से लाेग यहां पहुंचे।

1988
1988
  • सांसारिक नाम : गणेशमलजी
  • जन्मस्थल: पादरली (जालोर) 
  • पिता : हीराचंदजी जेरूपजी
  • माता : मनुबाई हीराचंदजी

1953 में मुंबई में दीक्षा ली गणेशमलजी ने

1984 में अहमदाबाद में गणि पद मिला

1987 में पादरली में पंन्यास-आचार्य पद

  • अभिनव महावीर धाम, शंखेश्वर सुखधाम, महावीर धाम, पावपुरी जीव मैत्री धाम, भैरुतारक तीर्थ के प्रेरणादाता रहे।
  • आचार्य रविरत्नसूरी, रश्मिरत्नसूरी, पुण्यरत्नसूरी, यशोरत्नसूरी, जिनेशरत्नसूरि आदि आपके शिष्य परिवार में है।
2001
2001

पाली में चातुर्मास के ये दोनों फोटो नेहरू नगर निवासी गजेंद्र कोचर ने उपलब्ध करवाए। दोनों चातुर्मास का लाभ इनके पिताजी सज्जनराज कोचर ने लिया था। 1988 में वे 9 व 2001 की चातुर्मास में 22 वर्ष के थे। शहर में चातुर्मास के दौरान काफी समय उन्होंने गुरुदेव के साथ बिताया।

गुणानुवाद सभा आज
आचार्य भगवंत दीक्षा दानेश्वरी गुणरत्न सूरीश्वरजी महाराज की समृति में गुजराती कटला उपासरे में गुणानुवाद सभा अायाेजित की जाएगी। सेठ नवलचंद सुप्रतचंद जैन श्वेताम्बर (तपागच्छ) जैन देव की पेढ़ी के अध्यक्ष गाैतमचंद मेहता व सचिव ओमप्रकाश छाजेड़ ने बताया कि सीमित लाेगाें की माैजूदगी में ये आयाेजन हाेगा। उन्हाेंने श्रावकाें से कोरोना संक्रमण काे देखते हुए अपने घर में नवकार मंत्र का जाप करने का आह्वान किया है।

जाे कोई भी गुरुदेव के संपर्क में आता, उनका ही हाेकर रह जाता 

  • 1988 में पिताजी सज्जनराज काेचर ने चातुर्मास का लाभ लिया। आचार्य के संपर्क में अाए ताे उनसे इतने प्रभावित हुए कि 2001 में भी चातुर्मास का लाभ लिया। 2001 में बड़ी संख्या में साधु साध्वियों व दीक्षार्थियों के आने से शहर पावन हो गया। पर्यूषण में प्रतिष्ठान बंद रखना और धर्म आराधना के कारण उनकाे पालीवासी प्रिय लगते थे। माेक्ष के लिए वे दीक्षा काे जरूरी मानते थे। -गजेंद्र काेचर, आचार्य के 2 चातुर्मास के लाभार्थी

आचार्य के सानिध्य में तपस्या काे लालायित रहता था पूरा जैन समाज

  • आचार्य का सानिध्य पाने के लिए हर श्रद्धालु लालायित रहता था। उनका पहला चातुर्मास 1979 में सुराणा मार्केट उपासरे में हुआ क्योंकि उस समय गुजराती कटला उपासरा निर्माणाधीन था। 1988 और 2001 में गुजराती कटला में ही रुके। हाउसिंग बाेर्ड स्थित महावीर स्वामी भगवान मंदिर और श्रीपाल नगर में केसरियाजी आदिनाथ भगवान मंदिर की प्रतिष्ठा उनके करकमलाें से ही हुई है। -गौतमचंद मेहता, अध्यक्ष, जैन तपागच्छ संघ
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