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ऐसी बस्ती, जो सैनिटाइजर को ही मानती कोरोना की दवा:कहते हैं इसे पास रख लो, सूंघ लो नहीं होगा कोरोना; कोरोना वैक्सीन क्या होती है इन्हें नहीं पता

पाली19 दिन पहलेलेखक: ओम टेलर
अस्थाई बस्ती में करीब 40 झोपड़ियों की दो अलग-अलग बस्ती हैं।

पाली शहर के नया गांव के निकट से गुजरने वाल हाइवे किनारे एक खेत में अस्थाई कच्ची बस्ती आबाद हैं। यहां करीब 40 झोपड़ियों में गुजरात से आए लोग अपने परिवार सहित रह रहे हैं। इनमें बच्चे भी शामिल हैं। यहां वयस्क महिला-पुरुष गैस पाइप लाइन बिछाने के लिए खुदाई का काम करते हैं। कोरोना की वैक्सीन क्या है, इनमें से ज्यादातर को नहीं पता। सैनिटाइजर को यह कोरोना की दवा बताते हैं। कहते हैं कि इसे साथ रखते हैं, सूंघ लेते है और हाथ पर लगा देते है, इससे कोरोना नहीं होता।

विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना की तीसरी लहर में बच्चों के संक्रमित होने की आशंका जताई जा रही हैं। ऐसे में मजदूरी कर शाम को घर लौटने वाले ये मजदूर अपने साथ जानलेवा कोरोना लेकर न आ जाए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। एक तरफ जब सरकार देश भर में वैक्सीनेशन का कार्यक्रम चला रही हैं तो इन लोगों का भी वैक्सीनेशन होना चाहिए, जिससे जानलेवा कोरोना की जद में आने से यह मजदूर व इनके बच्चे बचे रह सके।

बस्ती की महिलाएं दूर दराज से पानी लाती हैं।
बस्ती की महिलाएं दूर दराज से पानी लाती हैं।

शहर के नया गांव के निकट गुजरने वाले हाइवे 162 पर एक खेत में बनी अस्थाई बस्ती में रविवार सुबह करीब सात बजे भास्कर टीम पहुंची। अधिकतर झोपड़ियों के बाहर चूल्हे पर महिलाएं खाना बनाती नजर आई तो युवक खुले में शौच जाने के लिए जा रहे थे। कई बच्चे ब्रश करते दिखे तो कई कुछ मिट्टी में खेलते नजर आए। यहां अधिकतर लोगों ने मास्क नहीं लगा रखे थे। इन लोगों से बात करना चाही तो अधिकतर लोग कुछ बताने से भी हिचकिचाते नजर आए।

एक युवक रामू ने बताया कि वे यहां करीब 40 झोपड़ियों की दो अलग-अलग बस्ती हैं। कुछ परिवार गुजरात के दाहोद तो कुछ परिवार सुरेन्द्र नगर क्षेत्र के है। इन्होंने यहां पाइप लाइन बिछाने के लिए खुदाई के काम का ठेका ले रखा हैं और पिछले करीब डेढ़-दो माह से यही हैं। पति-पत्नी दोनों काम पर जाते हैं। कुछ लोग तो साथ में बच्चों को भी ले जाते हैं। कांट्रैक्टर की गाड़ी यहां से उन्हें साइट पर पहुंचाती है। शाम को वापस छोड़ जाती हैं।

नया गांव हाइवे किनारे एक खेत में बनी अस्थाई बस्ती।
नया गांव हाइवे किनारे एक खेत में बनी अस्थाई बस्ती।

बोले- कौनसा सा वैक्सीन, कांट्रैक्टर से पूछो
राहूल नाम के एक युवक से बात की तो उसने बताया कि वे गुजरात के सुरेन्द्र नगर क्षेत्र का रहने वाला हैं। यहां गैस पाइप लाइन बिछाने का काम करता हैं। वैक्सीन लगी या नहीं इसको लेकर पूछा तो बोला कि कौन सा वैक्सीन, हमें नहीं पता आप हमारे कांट्रैक्टर से पूछो।

सोलर लाइट से रात काे रोशन होता हैं इनका आशियाना।
सोलर लाइट से रात काे रोशन होता हैं इनका आशियाना।

दिनेश बोले- किसी को नहीं लगी वैक्सीन
यहां एक झोपड़ी में रहने वाले दिनेश ने बताया कि उन्हें यहां आए हुए एक माह हो गया। उनके सहित यहां अभी तक किसी को भी वैक्सीन नहीं लगी हैं।

इस तरह बने हुए इनके अस्थाई स्नान घर।
इस तरह बने हुए इनके अस्थाई स्नान घर।

पांच बच्चों के पिता सन्या बोले- नहीं लगा टीका
सन्या नाम के युवक ने बताया कि वह डेढ़ माह से यहां अपने पांच बच्चों व पत्नी के साथ रह रहा है। मजदूरी करने दोनों पति-पत्नी जाते हैं। बच्चे घर पर ही रहते हैं। उन्होंने बताया कि अभी वैक्सीन किसी को नहीं लगी।

अस्थाई बस्ती से खुले में शौच के लिए जाता एक युवक।
अस्थाई बस्ती से खुले में शौच के लिए जाता एक युवक।

बड़ा सवाल – कोरोना की तीसरी लहर में बच्चों को खतरा, ऐसे में इन बच्चों का किया होगा
विशेषज्ञ कोरोना की तीसरी लहर में बच्चों के ज्यादा संक्रमित होने की आशंका जता रहे हैं। इसको लेकर प्रशासन भी जिले में बेहतर चिकित्सा व्यवस्था करने में जुटा हुआ हैं। दूसरी तरफ इस कच्ची बस्ती में हालत यह हैं कि यहां बच्चों के साथ बड़े भी बिना मास्क लगाए रहते हैं। बच्चे खुले में घूमते रहते हैं। कही यह मासूम कोरोना की चपेट में न आ जाए इसको लेकर प्रशासन को इन लोगों का वैक्सीनेशन करवाना चाहिए। इससे की मजदूर व इनके बच्चे कोरोना की चपेट में न आए।

कुछ ऐसी हैं इन मजदूरों की दिनचर्या
रोजगार की तलाश में परिवार सहित गुजरात से आए करीब 40 परिवार एक खेत में अस्थाई झोपड़ियां बनाकर रह रहे हैं। यहां की महिलाएं भी सुबह पति के साथ काम पर जाती हैं और वापस शाम को ही घर आती हैं। शौच के लिए भी सभी खुले में जाते हैं। महिलाओं के नहाने के लिए इन्होंने यहां जुगाड़ कर अस्थाई बाथरुम बनाए हुए हैं। पानी निकट के एक बेरे(कुएं) से महिलाएं भरकर लाती हैं। कई परिवार यहां सोलर लाइट साथ लाए हैं।

इससे की मोबाइल चार्ज कर सके तथा रात में पंखा व लाइट जला सके। लेकिन, यह व्यवस्था यहां कुछ ही परिवारों के पास हैं। इन झोपड़ियों में यह परिवार बच्चों के साथ कैसे रहते होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता हैं। सुबह जल्दी उठकर खाना बनाना, पानी भर कर दूर खेत से लाना और फिर नौ बजे काम पर निकलना इस अस्थाई बस्ती में रहने वाली महिलाओं के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं।

पानी का मोल इस मासूम से सीखें : एक कटोरी पानी से धोया मुंह उससे भी जो पानी बचा उसे एक बर्तन में डाला, फेंका नहीं।
पानी का मोल इस मासूम से सीखें : एक कटोरी पानी से धोया मुंह उससे भी जो पानी बचा उसे एक बर्तन में डाला, फेंका नहीं।