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काेराेना का एक साल:लाॅकडाउन से चले थे...फिर लाॅकडाउन में आ गए

सिरोहीएक महीने पहले
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  • जिले में 7 मई काे पहला केस आया था, एक साल में 12898 पहुंचा संक्रमिताें का आंकड़ा, जबकि 71 लाेग दम

जिले में कोरोनाकाल के 12 महीने पूरे... अब तक 12898 लोग संक्रमित हो चुके और 71 दम तोड़ चुके हैं। कोरोना पर काबू करने के लिए राजस्थान में 21 मार्च को सबसे पहले लॉकडाउन लगा था। इस दाैरान हालात सुधरने भी लगे। सितंबर व नवंबर में पहली लहर का एक और पीक आया, लेकिन इस दाैरान भी जिले में ज्यादा केस आए। हालांकि माैतें और गंभीर मरीजाें का आंकड़ा कम था।

एक मार्च काे हमारा जिला काेराेना मुक्त बना लेकिन 2 मार्च काे फिर से दूसरी लहर ने जिले में प्रवेश किया। इस दिन पहला केस सामने आया और इसके बाद हालात ऐसे थे कि एक ही दिन में 500 से ज्यादा मरीज सामने आने लगे। संक्रमण फैलने लगा और गांवाें तक पहुंचा और फिर से हम लाॅकडाउन पर आ खड़े हुए।

क्याेंकि अब 3 से 17 मई तक राज्य सरकार ने एक बार फिर महामारी रेड अलर्ट जन अनुशासन पखवाड़ा (लॉकडाउन) लगाया है। इधर, राज्य सरकार की ओर से भी एक बार फिर से सख्त लाॅकडाउन की तैयारी की जा रही है। हालांकि जिले में अब रिकवरी रेट बढ़ने लगी है।

पहली लहर- मई में पहला केस आने के बाद जिले में काेरेाना की शुरुआत हुई। ग्रीन जाेन बना जिला धीरे-धीरे रेड जाेन में आया। मार्च में दूसरी लहर आने से पहले 4601 पाॅजिटिव मरीज आ चुके थे और इनमें 4562 मरीज सही हाे चुके थे। कोरोनाकाल की शुरुआत में हमारे जिले में टेस्टिंग लैब तक नहीं थी और सैंपल जोधपुर व उदयपुर भेजे जाते थे और रिपोर्ट आने में 5 से 7 दिन लगते थे।

अस्पताल में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सपोर्ट और बेड की पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं। पहली लहर का कोरोना घातक नहीं होने से 95 प्रतिशत मरीजों ने संस्थागत क्वारेंटाइन सेंटर में रहकर कोरोना को हराया। होम क्वारेंटाइन की व्यवस्था शुरू होने के बाद स्थिति यह हो गई थी कि अस्पताल व संस्थागत क्वारेंटाइन सेंटर खाली हो गए।

भामाशाहाें आए आगे....पीएम केयर फंड में डेढ़ कराेड़

गत 2020 में काेराेना महामारी के दाैरान लाॅकडाउन की घाेषणा के बाद कई चीजाें का संकट भी आया। इसमें सबसे बड़ा संकट था कि जरूरतमंद लाेगाें तक कैसे खाना व राशन पहुंचाया जाए। इसके लिए जिले के भामाशाह आगे आए और प्रशासन के सहयाेग से मुहिम शुरू की जिले में काेई भूखा न साेए। इसके बाद घर-घर तक खाने के पैकेट और राशन सामग्री तक निशुल्क वितरित किए गए।

प्रत्येक गांवाें में सहायता पहुंचाई गई। इतना ही नहीं इस महामारी में जिले से लेकर देश तक में हमारे यहां के भामाशाहाें ने सहयाेग किया। जिला परिषद सीईओ भागीरथ विश्नाेई ने बताया कि इस महामारी के दाैरान डेढ़ करोड़ से ज्यादा रुपए पीएम केयर फंड में भेजे। कोरोना के पहली लहर के दौरान जिले में जरुरतमंद लोगों की सहायता के लिए जिले के भामाशाह भी आगे आए थे।

26 हजार राशन सामग्री के किट जरुरतमंदों तक पहुंचाए थे। जिले के कई ट्रस्ट समेत एनजीओ व समाजसेवी संगठनाें की ओर से 1 लाख 31 हजार से ज्यादा भोजन के पैकेट्स, 2000 से ज्यादा पीपीई किट, पुलिस कर्मियों को 500 छाते, 1 हजार से ज्यादा कोरोना टेस्ट किट, 1 लाख 51 हजार रुपए लागत का वेंटिलेटर समेत मेडिकल किट, थर्मल गन व मास्क बांटे। इसके अलावा स्थानीय स्तर भी कई व्यापारिक संगठनाें, समाजसेविायाें की ओर से सहयाेग किया गया था।

सैंपलिंग: शुरू में लैब नहीं थी, अब ज्यादा जांचें
सिरोही में पहले कोरोना जांच के लिए लैब नहीं थी। जोधपुर व उदयपुर सैंपल भेजने होते थे। 10 जून को यहां लैब खुली और दो से तीन शिफ्ट में जांच होने से ज्यादा सैंपलिंग के कारण संक्रमण को रोकने में सफल हो पाए। केस बढ़ने के साथ फिर हालात बिगड़े, लेकिन अब स्थिति नियंत्रण में।

डॉक्टर्स: सीएचसी पर फिजिशियन नहीं
जिले में 11 सीएचसी हैं, लेकिन सिर्फ 3 जगहों पर ही फिजिशियन कार्यरत हैं। कोरोना के इलाज एमडी फिजिशियन व मेडिसीन डॉक्टर की जरूरत पड़ती है। सिरोही अस्पताल में भी दो ही एमडी फिजिशियन है। यहां नर्सिंग स्टाफ की भी भारी कमी है। स्थिति ये है कि नर्सिंग स्टाफ को संदिग्ध से पॉजिटिव वार्ड तक लगातार 21 दिन की ड्यूटी करनी पड़ रही है और क्वारेंटाइन की व्यवस्था भी बंद करनी पड़ी।

गलत आंकड़े: मौत, मरीजों के आंकड़ों पर गफलत
कोरोना से मौतों व पॉजिटिव का आंकड़ा शुरू से विवादों में रहा। अस्पतालों में मरने वालों के आंकड़ों को भी छुपाया जा रहा है। स्थानीय प्रशासन और राज्य स्तर के कोरोना पॉजिटिव व मौतों के आंकड़े अलग ही रहे। सीएम ने खुद इसे गलत बताया, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

जो अच्छा किया: 45 दिन तक हमारा जिला ग्रीन जोन में रहा, सिरोही में लैब खुली
पिछले साल प्रदेश में 2 मार्च को पहला केस सामने आया था और 21 मार्च से लॉकडाउन लगाया। लॉकडाउन लगाने के 45 दिन तक जिलेवासियों के संयमित व्यवहार की बदौलत सिरोही जिला कोरोना से अछूता रहा। प्रवासी आने के बाद जिले में कोरोना की एंट्री हुई।

जांच में देरी की वजह से बढ़ते मामलों को रोकने के लिए 10 जून को सिरोही में कोरोना जांच की लैब स्थापित की गई। लैब खुलने से रोजाना करीब 1500 जांचें होने से संक्रमण को रोकने में कामयाबी मिली। हालांकि, अनलॉक के बाद सितंबर में पीक आया, लेकिन मौतें नियंत्रण में रही।

संक्रमण दर: चार महीने लगे थे 1 हजार केस हाेने में
मई में पहला केस आने के बाद चार महीने लगे थे 1 हजार मामले हाेने में। 13 अगस्त काे 1000 हुई थी काेरेाना मरीजाें की संख्या। जबकि 18 सितंबर काे 2100 केस हुए थे।

दूसरी लहर- ऐसा तांडव मचाया कि तमाम मेडिकल सुविधाएं ध्वस्त हो गई और अस्पतालों में इलाज के दौरान सैकड़ों लोगों की सांसें टूट गई। सरकारी आंकड़ों से तीन गुणा अधिक मौतों ने झकझोर दिया। 4 हजार मामले हाेने में करीब 11 महीने लगे लेकिन यह दूसरी लहर इतनी घातक साबित हुई की महज दाे महीनाें में संक्रमिताें का आंकड़ा 12 हजार से ज्यादा का पार कर चुका है।

वहीं माैताें का आंकड़ा इससे भी ज्यादा भयावह है। इनमें जान गंवाने वाले संदिग्ध मरीज ज्यादा थे। मरीजों व मौतों के आंकड़ों की हकीकत हो या टेस्टिंग लैब बंद होने और कबाड़ में पड़े वेंटिलेटर की खबर। जिन्होंने कोरोना को पैर पसारने का मौका दिया और जिला प्रशासन के वे कदम जो संक्रमण की कड़ी तोडऩे में कारगर साबित हुए।

लाॅकडाउन की खबर सुन शुरू हुआ प्रवासियों का

काेराेना के शुरूआती दाैर में लाॅकडाउन की खबर सुन प्रवासियों का पलायन शुरू हाे गया था। हालात यह थे कि जिले के आबूराेड व मंडार चैक पाेस्ट से सटे गुजरात बाॅर्डर पर अधिकारियाें की टीमें तैनात की गई। लाॅकडाउन काे देखते हुए बड़ी संख़्या में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक समेत अन्य राज्याें से प्रवासी लाैटने लगे थे। हालात यह थे कि कई प्रवासी ऐसे थे जाे पैदल ही अपने घर के लिए रवाना हाे गए थे।

इस दाैरान आबूराेड बार्डर पर उनके रूकने व खाने की व्यवस्था की गई। देर रात तक बसाें में भर-भर कर प्रवासी अपने घर जाने के लिए निकले। इस दाैरान करीब 43 हजार 476 प्रवासी राजस्थान की सीमा में प्रवेश किए थे। सिलसिला अब भी जारी है: दूसरी लहर ज्यादा घातक हाेती जा रही है। इधर, अलग-अलग प्रदेशाें में लाॅकडाउन के बाद अब फिर से प्रवासी घर लाैटने लगे हैं। गुरुवार सुबह तक आबूराेड के लिए 321, माउंट आबू के लिए 13 और सिरेाही जिले में करीब 1901 लाेग दूसरे राज्याें से यहां पहुंचे है। वहीं अब तक दूसरे जिलाें में जाने वाले लाेगाें की संख्या करीब 7 हजार 262 है।

सारे रिकाॅर्ड टूटे: 700 से ज्यादा मामले
दूसरी लहर ने पाॅजिटिव मरीजाें का आंकड़ा भी ताेड़ा। अप्रैल महीने में एक साथ 720 मामले आए थे, जाे अब तक के सबसे ज्यादा संक्रमित मरीजाें का आंकड़ा था।

ऑक्सीजन प्लांट: सिर्फ सिरोही में, 4 जगहों पर
शुरुआत में सिर्फ जिला अस्पताल में छोटा ऑक्सीजन प्लांट था, जिससे रोजाना 20-25 सिलेंडर ऑक्सीजन मिल रही थी। दूसरी लहर में ऑक्सीजन की डिमांड बढ़ने के बाद अब माउंट आबू व आबूरोड प्लांट तैयार हो चुके हैं। जबकि, शिवगंज और सिरोही में भी प्लांट निर्माणाधीन है।

इलाज/ट्रेसिंग: 90% मरीज होम क्वारेंटाइन
जिले में करीब 90 प्रतिशत मरीज तो घरों में ही इला करा रहे हैं। कई तो डॉक्टरों से सलाह भी नहीं ले रहे, जो गलत है। अस्पतालों में ऑक्सीजन बेड फुल चल रहे हैं। अघोषित रूप से माना जा चुका है कि कम्युनिटी स्प्रेड हो चुका है, इसीलिए मरीजों की कांटैक्ट ट्रेसिंग भी बंद कर दी है।

संक्रमण दर: 40 दिनाें में ही 1 हजार पार हुए मामले
1 मार्च काे जिला काेराेना मुक्त हाे गया था। जब 2 मार्च काे नया केस आया तब जिले में पाॅजिटिव मरीजाें की संख्या 4601 थी। दूसरी लहर इतनी तेजी से बढ़ी की 10 अप्रैल काे ही यह आंकड़ा बढ़कर 5 हजार 731 हाे गया था।

जिन पर उठे सवाल: संसाधन नहीं बढाए, ऑक्सीजन की कमी से बिगड़े हालात
जिले में पिछले 7 मई को कोरोना की एंट्री हुई और सितंबर में पहली लहर का पीक आया। अस्पतालों में संसाधन नहीं बढ़ाए। स्थिति को देख भामाशाह आगे आए और अस्पतालों में मेडिकल उपकरण भेंट किए। लेकिन, अस्पताल प्रशासन उनका उपयोग नहीं कर पाया। इसलिए, दूसरी लहर में हालात काबू से बाहर हो गए। अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर खत्म हो गए। वेंटिलेटर तक शुरू नहीं हो पाए। ऐसे में गंभीर मरीजों की मौत हुई।

पहली लहर में संस्थागत क्वारेंटाइन और दूसरी में बेहतर चिकित्सा सुविधा जुटाना रही चुनौती

शुरूआत में नई महामारी कैसी होगी और उससे कैसे निपटेंगे के लिए इसका अनुभव नहीं था। लॉकडाउन की सख्ती से पालना करवाने के साथ ही रोजगार बंद होने से जरूरतमंदों तक राशन सामग्री पहुंचाना भी बड़ी जिम्मेदारी थी। पॉजिटिव आने वालों को संस्थागत क्वारेंटाइन करवाने की व्यवस्थाएं करवाना भी चुनौती थी, क्योंकि शुरूआत में होम क्वारेंटाइन की सुविधा नहीं थी। लेकिन, टीम वर्क और सभी के सहयोग से इसको नियंत्रित किया। दूसरी लहर में कोरोना को लेकर अनुभव था, लेकिन इस बार दूसरी तरह की चुनौतियां थी। इस बार अस्पतालों में संसाधन जुटाना, डॉक्टर्स-नर्सिंग स्टाफ को भय मुक्त कोरोना मरीजों के इलाज की व्यवस्थाएं और मरीजों को भी बेहतर इलाज मुहैया करवाना प्राथमिकता रही। अस्पतालों में गंभीर मरीजों का लोड कम करने के लिए घर-घर सर्वे करवाया और प्रत्येक सब सेंटर तक कोरोना इलाज के किट पहुंचाए। मेडिकल स्टाफ, अधिकारी-कर्मचारियों की दिन-रात मेहनत का परिणाम है कि अब गंभीर मरीजों की संख्या कम हो गई है।-भगवतीप्रसाद, कलेक्टर, सिरोही

पहली वेव में अस्पतालों पर लोड नहीं था, इस बार ऑक्सीजन की खपत ज्यादा

पहली वेव में अस्पतालों पर मरीजों का इतना लोड नहीं था। गंभीर मरीजों की संख्या कम थी। मेडिकल स्टाफ और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा-सहयोगिनी की मदद से घर-घर सर्वे कर कोरोना लक्षणों वाले लोगों को दवाइयां देकर संक्रमण की चेन को कमजोर किया और नंबर ऑफ केसेज घटते गए। लेकिन, दूसरी लहर का वायरस 20 गुणा खतरनाक है। सीधा लंग्स पर इफेक्ट कर 90 प्रतिशत खराब कर रहा है। इससे गंभीर मरीजों की संख्या अचानक से बढ़ गई। ऐसे मरीजों के इलाज के लिए मेडिकल स्टाफ को प्रशिक्षित किया। संक्रमण की चेन तोडऩे के लिए जांचें बढ़ाई पहले जहां 200-250 रोजाना होती थी उसे बढ़ाकर 1300-2000 तक ले गए। फिर से घर-घर सर्वे करवाया कर सब सेंटर तक कोरोना किट पहुंचाए। इस आपदा से निपटने में भामाशाह, जनप्रतिनिधियों व आमजन का सहयोग रहा।-डॉ. राजेश कुमार, सीएमएचओ, सिरोही

पहले गंभीरता थी, अब कमजोरी, दस्त व पेट दर्द वाले भी आ रहे पॉजिटिव
पहले सर्दी, खांसी, जुकाम, बदन दर्द, स्वाद व गंध न आना और सांस लेने में तकलीफ के लक्षण वाले पॉजिटिव आ रहे थे। पहले बीमारी को लेकर लोगों में गंभीरता थी। दूसरी लहर में कोरोना के लक्षणों में कमजोरी, दस्त और पेट दर्द वाले भी पॉजिटिव आ रहे हैं। इस बार अचानक से मरीजों की संख्या बढ़ी और सीरियस होने के बाद अस्पताल पहुंच रहे हैं। जिन लोगों ने वैक्सीनेशन करवाया उनके पॉजिटिव आने के बावजूद स्थिति गंभीर नही बनीं और न ही ऑक्सीजन सपोर्ट पर लेने की नौबत आई।-डॉ. वीरेंद्र महात्मा, एमडी फिजिशियन, प्रमुख विशेषज्ञ मेडिसीन, सिरोही

पहले बीमार व उम्रदराज आ रहे थे पॉजिटिव, इस बार युवा, गर्भवती, बच्चे भी

पहली वेव में किसी न किसी बीमारी से पीडि़त और उम्रदराज लोग पॉजिटिव आ रहे थे, फिर भी बहुत कम लोगों को ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ रही थी। मरीजों को रेमडेसिविर इंजेक्शन लगाने की भी जरूरत नहीं पड़ रही थी। इस बार युवा, बच्चे और गर्भवती तक पॉजिटिव आ रहे हैं। संक्रमण की गति इतनी ज्यादा है कि 5-7 दिन में फेफड़े 70 से 90 प्रतिशत तक खराब हो रहे हैं। ऑक्सीजन पर लेने के बावजूद रिकवर होने में ज्यादा समय लग रहा है। इस बार उल्टी-दस्त की शिकायत वाले भी पॉजिटिव आ रहे हैं।-डॉ. प्रदीप चौहान, एमडी फिजिशियन, प्रमुख विशेषज्ञ मेडिसीन, सिरोही

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