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जेल बनी सुधारगृह:पहले गैंगवार की आशंका में गुटों में बंटे हुए रहते थे बंदी, अब एक साथ करते हैं योग-प्राणायाम, फुर्सत में पढ़ते हैं किताबें

चुरु6 दिन पहले
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जेल परिसर में याेग करते बंदी
  • जिला विधिक प्राधिकरण के सचिव की पहल पर जिला जेल में मेडिटेशन व पुस्तकालय की स्थापना से बदली बंदियों की दिनचर्या

पहले जब मैं राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से जिला जेल में साप्ताहिक विजिट पर जाता तो बंदियों के चेहरों पर चिंता व तनाव के मिश्रित भाव देखने को मिलते। बंदी आपस में गुटों में बंटे हुए दिखाई पड़ते, किसी भी समय गैंगवार होने की पूरी संभावना रहती, किंतु एक वर्ष में बंदियों के लिए जेल में पुस्तकालय की सुविधा एवं मेडिटेशन शुरू करवाया तो उसके संतोषजनक परिणाम सामने आए।

बंदियों के व्यवहार में बड़ा परिवर्तन दिखने लगा। अब रोज सुबह बंदी सामूहिक योग-प्राणायाम करते हैं। कुछ बंदी जेल परिसर में बने मंदिर में भजन-कीर्तन करते हैं। पौधों को पानी देना आदत में शुमार हो गया है। अब तो जिला जेल परिसर सुधार गृह बन गया है। जेल कम आश्रम सा नजर आने लगा है।

अब जेल में साप्ताहिक विजिट पर जाता हूं तो बंदियों के चेहरे पर संतोष, धैर्य और आत्मविश्वास दिखाई देता है। जेल में 220 बंदी हैं, जिनमें हार्डकोर अपराधियों को छोड़कर अन्य सभी जेल में चलाए जा रहे रचनात्मक कार्यों में हिस्सा लेते हैं। (जैसा कि एडीजे व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव राजेश कुमार दड़िया ने भास्कर के पवन शर्मा को बताया)

पुस्तकालय : पुरस्कृत शिक्षक फोरम के जिला सचिव ओमप्रकाश तंवर ने करीब एक हजार पुस्तकें बंदियों के लिए जुटाई। उनके फोरम की टीम का योगदान रहा। ये पुस्तकें धार्मिक, प्रेरक प्रसंग, कहानियां एवं वीर पुरुषों की जीवनियों की हैं। प्रतिमाह बंदी करीब 150 पुस्तकों का लेनदेन करते हैं। जेलर ने एक कांस्टेबल लगा दिया है।
असर : बंदी खाली समय में पढ़ी गई पुस्तकों की आपस में चर्चा करते हैं और रचनात्मक कार्यों में लगे रहते हैं।
मेडिटेशन : ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के स्थानीय केंद्र की ओर से जेल परिसर में बंदियों के लिए मेडिटेशन (ध्यान) के नियमित कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। अब रोज सुबह योगाभ्यास व प्राणायाम करवाया जाता है। इसके अलावा बंदी रोज जेल परिसर में लगे पौधों में पानी भी देते हैं।

असर-बंदियों के व्यवहार में परिवर्तन आया। वे अन्य रचनात्मक गतिविधियों में उत्साह से भाग लेते हैं। स्फूर्ति के साथ वे स्वस्थ दिखने लगे हैं।
धार्मिक : जेल परिसर में मंदिर के आगे भजन-कीर्तन व पुस्तकों में राम-राम लिखने का काम भी करते हैं। इससे हिंसक प्रवृति के विचार बंदियों के मन से दूर भागने लगे हैं।

बंदियों की भावना में बदलाव का उदाहरण ट्रायल पर चल रहे बंदी राजाराम द्वारा जेल की दीवारों पर बनाए गए सामाजिक व धार्मिक परिवेश के चित्र हैं। लाइब्रेरी की दीवार पर बनाए ग्रामीण परिवेश के चित्र की विजिट पर आने वाले लोग प्रशंसा कर चुके हैं।

पहले छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते, अब शिकायतें बंद हो गई : जेलर
पहले बंदी टेंशन में रहते थे, छोटी छोटी बातों को लेकर आपस में झगड़ पड़ते थे। स्टाफ से भी उलझते। अब उनमें धैर्य व संयम दिखाई पड़ता है। सकारात्मक सोच विकसित हुई है। यह पुस्तकालय की सुविधा, मेडिटेशन और योगाभ्यास से ही संभव हुआ है।
-कैलाशसिंह शेखावत, जेलर
पहले खाना खाने, नींद लेने और फुर्सत में समूह में बैठकर अपने अपराध जगत के अनुभवों का साझा करने के अलावा उनके पास और कोई काम नहीं था। अब अधिकांश बंदी फुर्सत के समय मे पुस्तकें पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ाते हैं, मनोरंजन करते हैं। इससे तनाव कम हुआ, सकारात्मक सोच हुई।
-ओमप्रकाश तंवर, सचिव, पुरस्कृत शिक्षक फोरम

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