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सराहनीय:मुर्दाें के कफन से पाैधाें का जीवन बचा रहे रजनीश

चूरू7 दिन पहले
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  • कसुंबी के रजनीश ने कफन को बना दिया पौधों का रक्षा कवच, माेक्ष धाम में सर्दी व लू से बचाने के लिए 4 वर्षों से कर रहे हैं उपयोग

क्या मृत व्यक्ति के शरीर को ढकने के लिए ओढ़ाया जाने वाला कफन बाद में किसी काम आता है? तो निश्चित रूप से हर व्यक्ति के पास इसका जवाब “ना’ ही होगा। लेकिन नागौर जिले में कसुंबी गांव के रजनीश शर्मा ने गत चार वर्षों से पौधों को सर्दी और भीषण लू से बचाने का इसी कफन को जरिया बनाकर “ना’ को “हां’ में बदल दिया है। रजनीश प्रतिकूल मौसम में हर वर्ष मर जानेवाले पौधों को मुर्दों के कफन ओढ़ाकर न केवल बचाने में सफल हुए हैं, अपितु सार-संभाल कर हज़ारों पौधों को वृक्ष बना चुके हैं।

इस नए प्रयोग से गांव के मोक्षधाम में अनुपयोगी पड़े कपड़ों के ढेर की जगह चाराें तरफ स्वच्छता और हरियाली नजर आती है। रजनीश ने भास्कर काे बताया कि जयपुर व गुजरात में करीब पंद्रह वर्षाें तक रहने के बाद वे 2016 में अपने गांव कसुंबी लाैटे। इसके बाद जुलाई 2016 में रजनीश ने गांव के युवाअाें का एक समूह ‘टीम कसुंबी’ बनाकर पाैधराेपण अभियान शुरू किया। इस अभियान में मोक्षधाम, सड़क मार्ग, मंदिर, स्कूल एवं अन्य सार्वजनिक स्थानों पर 3000 से ज्यादा पौधे लगाए।

वेस्ट का बेस्ट उपयाेग, रोज 5 घंटे से ज्यादा मोक्षधाम में रहकर खाद-पानी देते हैं

ग्रामीणों के मुताबिक रजनीश जुलाई 2016 से रोजाना दिन में 5 घंटे से ज्यादा मोक्षधाम में रहकर खुद के लगाए पौधों को खाद पानी देते हैं। इस दौरान दाह संस्कार के बाद फेंके कंबल, चादर, ओढ़नी आदि को बोरे में रख लेते हैं। सर्दी में पौधों को कंबल,चादर से ढक देते हैं। मार्च में वसंत ऋतु में उतारकर पुनः संभालकर रख देते हैं। अप्रैल में छोटे पौधों को लू के थपेड़ों से बचाने के लिए ओढ़नी,धोती ओढ़ा देते हैं।

अच्छे काम में पहले मुश्किलें : लाेग पागल कहते थे, अब सराहना करते हैं, अंधविश्वास व ग्रामीणों के विरोध के डर से कई मित्रों ने भी पहले असहमति जताई

चूरू जिले की सीमा पर स्थित नागाैर के कसुंबी गांव में सर्दियों में पारा शून्य डिग्री तक नीचे चला जाता है। इस इलाके में सूखी सर्दी और पाले के प्रकोप से पौधों को बचाने के लिए बोरी या तिरपाल से ढकते हैं। रजनीश को भी ऐसी व्यवस्था करनी थी, इसके लिए काफी पैसे की जरूरत थी। उन्हाेंने टीम के साथियों से कहा कि क्यों न हम श्मशान में पड़े कफन के इन ढेर का उपयोग पौधों को ढकने में करें। लेकिन अंधविश्वास और ग्रामीणों के विरोध के डर से कई मित्रों ने असहमति जताई। तो साथी छगन स्वामी,मूलचंद चौधरी, बंटी चोटिया, बलराम भाटी,गौरव शर्मा, हरीश मदेरणा रजनीश का हाथ बंटाने में साथ हो गए।

दिसंबर में तेज सर्दी से पहले सभी ने मिलकर पौधों के ट्री गार्ड को चारों तरफ से लाशों के ऊपर ओढ़ाये गये कम्बल, चादर से ढंक दिया। वर्तमान में माेक्षधाम के 1200 पाैधे अब पेड़ बन चुके हैं। रजनीश के पौधरोपण अभियान में प्रारंभ से जुड़े लाडनूं के बीसीएमओ डॉ. मूलचंद चौधरी बताते हैं, श्मशान में काम आने वाली चीजों के दोबारा उपयोग को लेकर ग्रामीणाें में अंधविश्वास और डर हैं।

जब रजनीश के साथ हमने पौधों को कफन ओढ़ाए तो परिजनाें, ग्रामीणाें ने अनहोनी की आशंका जताई थी, लेकिन वो निर्मूल साबित हुई। अभियान की साक्षी रही कसुम्बी की पूर्व सरपंच जशोदा राहड़ ने कहा कि शुरू में लोग रजनीश के बारे में उलाहना देते थे, ये पागल हो गया है। ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर कफन चुगता फिरता है। लेकिन अब वे प्रशंसा करने लगे हैं।

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