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एएफटी में 7 साल से न्यायिक सदस्य नहीं:सैनिकाें के 6500 केस पैंडिंग, न्याय की आस में 20 पूर्व सैनिकाें का हुआ निधन

झुंझुनूं13 दिन पहले
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  • शेखावाटी में 70 हजार से अधिक सैनिक, 782 शहीद और 86950 पूर्व सैनिक, पेंशन से जुड़े हैं ज्यादातर मामले

देश के लिए जान देने वाले शहीदों और वर्तमान व पूर्व सैनिकों को सरकार की लापरवाही के कारण न्याय नहीं मिल पा रहा है। सैनिकाें, पूर्व सैनिकाें, युद्ध वीरांगनाओं और शहीदाें के परिजनाें काे त्वरित न्याय दिलवाने के लिए 2009 में कांग्रेस की तत्कालीन केंद्र सरकार ने आर्म्ड फाेर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) की शाखाएं खोली थीं। जयपुर स्थित एएफटी की क्षेत्रीय ब्रांच में प्रदेशभर के सैनिकाें के 6500 से अधिक मामले पैंडिंग हैं। क्योंकि 8 साल से एएफटी में न्यायिक सदस्य नहीं है।

इस वजह से सैनिक परिवाराें काे तारीख पर तारीख मिल रही है, लेकिन न्याय नहीं मिल रहा। न्याय की आस में अब तक 20 से अधिक पूर्व सैनिकाें की मृत्यु हाे चुकी है। शेखावाटी में सबसे अधिक सैनिक, पूर्व सैनिक, शहीदाें के परिवार हैं जिनकाे समय पर न्याय नहीं मिल रहा है। शेखावाटी में वर्तमान में 70 हजार से अधिक सैनिक सेना में कार्यरत हैं। 782 शहीद और 86950 पूर्व सैनिक हैं। आर्म्ड फाेर्स ट्रिब्यूनल की जयपुर में मुख्य ब्रांच हैं और जाेधपुर में सहायक ब्रांच है। केंद्र सरकार एएफटी बैंच में न्यायिक सदस्य नियुक्त नहीं कर रही हैं। कई मामलों में पूर्व सैनिकाें व उनकी पत्नी की भी माैत हाे चुकी लेकिन अब तक न्याय नहीं मिला है।

पद खाली : एडवाेकेट ओमप्रकाश श्याेरान ने बताया कि आर्म्ड फाेर्स ट्रिब्यूनल में दाे न्यायिक सदस्य हाेते हैं। एक मेंबर न्यायिक हाेता है जाे राजस्थान हाईकाेर्ट का सेवानिवृत्त न्यायाधीश हाेता है। वहीं दूसरा न्यायिक सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल या उससे ऊपर का सेवानिवृत्त सैनिक अधिकारी हाेता है। जिसका पद सदस्य प्रशासनिक हाेता है। दाेनाें ही पद 2013 से खाली चल रहे हैं।

तीन उदाहरण : तारीख पर तारीख मिली, लेकिन इंसाफ नहीं मिलता
1. झुंझूनूं के पूर्व सैनिक चेतराम जाट ने द्वितीय विश्वयुद्ध लड़ा। युद्ध में घायल हाेने पर उन्हें 1944 काे सेवामुक्त कर निशक्तता पेंशन दी। बाेर्ड ने निशक्तता पेंशन खत्म की और मूल पेंशन भी अटक गई। 1 मई 1980 काे उनका निधन हाे गया। पत्नी पताशी देवी फैमली पेंशन के लिए एएफटी गईं। न्याय मिलने से पहले ही 2018 में उनका भी देहांत हाे गया।

2. लाेसल के रिक्रूट सुखाराम ट्रेनिंग के दाैरान ही डिसेबिलिटी हाे गई जिस पर सेना से निकाल दिया गया। उन्हाेंने 2013 में निशक्तता पेंशन के लिए केस लगाया। इसमें केंद्र सरकार की ओर से जवाब भी आ गया था लेकिन निर्णय नहीं हुआ। वह अपने वकील काे बार-बार फाेन करते रहते थे पेंशन दिलवाने के लिए। 22 मार्च 2019 काे उनकी माैत हाे गई।

3. भागू मील का बास लक्ष्मणगढ़ के नेवी के सेवानिवृत्त राजेंद्र कुमार ने निशक्तता पेंशन के लिए 2014 में केस लगाया था। सात साल बाद भी न्याय नहीं मिला। वहीं चूरू के सदपुरा गांव के एयरफाेर्स के सार्जेंट ईश्वरसिंह जाट 1985 में लगे थे। इस दाैरान हाईपरटेंशन के चलते उन्हें फिल्ड पाेस्टिंग से हटा दिया। 2012 में सेवानिवृत्त हाे गए।

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