जन संकल्प से हारेगा कोरोना:कोरोना पीड़ितों का इलाज करते संक्रमित हुई; ऑक्सीजन सपोर्ट लेना पड़ा, मनोबल से जीत गई

झुंझुनूं6 महीने पहले
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  • आज पढ़ें कोरोना को हराने वाली विद्या की कहानी

मैं चिड़ावा के सरकारी अस्पताल में एलएचवी हूं और फिलवक्त सीएचसी में मेरी कोविड वैक्सीनेशन ड्यूटी है। सितंबर 2020 के अंतिम सप्ताह में मैं स्वयं कोरोना की चपेट में आ गई। संक्रमण ने मुझे संभलने का मौका ही नहीं दिया और सीधे फेंफड़ों पर अटैक किया। डेढ़ महीने चले उपचार के दौरान मुझे 10 दिन तक ऑक्सीजन पर रहना पड़ा।

नर्सिंग के पेशे में हमें पीड़ित मानवता की सेवा के साथ आत्मबल बनाए रखना भी सिखाया जाता है। जिसे मैंने हरदम मजबूत बनाए रखा। अस्वस्थता से अभी मैं उबरी ही नही थी कि नवंबर में दीपावली पर जयपुर से घर आए पेशे से सीए बड़े बेटे योगेंद्र की कोरोना रिपोर्ट पोजेटिव आ गई। मैं अपनी बीमारी भूलकर बेटे को स्वस्थ करने में जुट गई। इसके बाद होली पर हैदराबाद भेल में कार्यरत छोटा बेटा इंजीनियर जोगेंद्र भी संक्रमित हो गया। छोटे बेटे के संपर्क में आकर उसकी पत्नी इंजीनियर साक्षी कुल्हार, मेरे पति रिटायर्ड फौजी हरपालसिंह ढाका, बड़ी बहू सीए रुपाली झाझड़िया और दोहिता वंश सिहाग भी संक्रमित हो गए। इसने मुझे ही विचलित कर दिया। घर को कंटेन्मेंट जोन बना दिया गया।

हमारे गली-मोहल्ले में बाहरी लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लग गया। लेकिन मैंने हिम्मत नही हारी, बड़े बेटे को बाहर से दवा-सामान लाने की जिम्मेदारी सौंपी और घर का मोर्चा मैंने संभाला। कोरोना पोजेटिव आए परिवार के पांचों सदस्यों को अलग-अलग कमरों में क्वारेन्टीन किया। बीसीएमओ डॉक्टर संत कुमार जांगिड़ की देखरेख में पूर्व की तरह मोबाइल पर ही चिकित्सकीय परामर्श लेती रही। परिवार को आत्मबल बनाए रखने की नसीहत भी देती रही। भोजन में अनाज की मात्रा बेहद कम रखी। उसकी जगह हल्दी-गिलोय मिला दूध, पतली दाल, नीबू-नारियल पानी, मौसमी ज्यूस दियाा। सुबह-सुबह धूप स्नान व शाम को स्वच्छ हवा भी दिलवाती। नतीजा ये रहा कि नौ दिन में ठीक हो गए। (जैसा विपुल महमिया को बताया )

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