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  • More Than 40 RAS Made From Jhunjhunu, Expert Said: The Biggest Reason Is The Atmosphere Of Education And Competition In The Family, The Vision Is Decided By The School Itself

ऐसे आगे रहा झुंझुनूं:झुंझुनूं से बने 40 से ज्यादा आरएएस, एक्सपर्ट बोले : सबसे बड़ा कारण परिवार में पढ़ाई व प्रतिस्पर्धा का माहौल, स्कूल से ही तय होता है विजन

झुंझुनूं19 दिन पहले
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चिड़ावा. दृष्टिहीन बेटी को नोट्स पढ़कर सुनाती मां। - Dainik Bhaskar
चिड़ावा. दृष्टिहीन बेटी को नोट्स पढ़कर सुनाती मां।
  • दैनिक भास्कर के पाठकों के लिए तीन आईएएस ने किया रिजल्ट का विश्लेषण, ताकि आगे युवाओं को मिल सके दिशा

सबसे पहले तो इस एतिहासिक परिणाम के लिए झुंझुनूं को बधाई। वाकई में बहुत बहुत बधाई, क्योंकि झुंझुनूं के युवाओं ने यह एक ऐसा इतिहास रचा है जिसे संभवत: आगे खुद झुंझुनूं ही तोड़ सकता है। प्रदेश टॉपर से लेकर करीब 35-40 युवाओं का चयन होना बहुत बड़ी बात है। ऐसा कैसे हुआ आज यह बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रासंगिक सवाल है। जिसका जवाब आगे दूसरे युवाओं को भी ऐसी सफलताओं के लिए मदद करेगा। दरअसल, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है शैक्षणिक और प्रतिस्पर्धा का माहौल।

झुंझुनूं में इसकी शुरूआत घर से ही होती है। आप यदि पिछली आईएएस, आरएएस या आरजेएस समेत दूसरी महत्वपूर्ण परीक्षाओं का परिणाम देखेंगे तो पायेंगे कि चयनित युवाओं के परिवार ऐसे कंपीटिशन के प्रति काफी सकारात्मक माहौल रखते हैं। ऐसे युवा भी आपको ज्यादा मिलेंगे जिनके परिवार में पहले से ही इन सेवाओं में कोई ना कोई सदस्य है। वे आपस में डिस्कशन करते हैं। एक दूसरे को देखकर स्वच्छ प्रतिस्पर्धा, सीखना और सफलता पाना झुंझुनूं के युवाओं को आता है। यह इस तरह के परिणाम का पहला मंत्र है। यानी परिवार का सपोर्ट व सहयोग।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण है विषय की समझ, चयन और अध्ययन। पहले क्या होता था। 10 वीं के बाद छात्र कोई भी विषय चुन लेते थे। अमूमन जिसमें ज्यादा अंक आए उसे ही ले लिया जाता था। जबकि दसवीं तक किसी भी विषय और उसके बाद उसी विषय के विस्तार से अध्ययन में दिन रात का अंतर होता है। यानी पहले छात्र विषय चुनता था फिर समझता था और फिर अध्ययन करता था। इसमें अधिकांश छात्र असफल होकर कॉलेज में आते आते विषय बदलने को मजबूर होते थे।

अब यह स्थिति बदल गई है। युवा अब विषय को शुरूआत से ही समझते हैं, उसका चयन करते हैं और फिर अध्ययन करते हैं। इससे उन्हें कंपीटिशन तक सफलता मिलती है। यही कारण है कि कई युवाओं का चयन ग्रेजुएशन के बाद पहले या दूसरे ही प्रयास में हो गया है। कुल मिलाकर सबसे पहले परिवार में अच्छे प्रतिस्पर्धी, सहयोगात्मक और सकारात्मक वातावरण की भी जरुरत होती है। हमारे विचार से झुंझुनूं के युवाओं और परिवारों ने इस बात को भली भांति समझ लिया है।

चार प्वाइंट्स में समझें, कैसे प्रदेश की सबसे बड़ी परीक्षा में सबसे आगे रहा झुंझुनूं

1. परिवार में सहयोग व प्रतिस्पर्धा का माहौल मिलता है
झुंझुनूं में अधिकांश परिवार सैन्य सेवाओं, प्रशासनिक सेवाओं, न्यायिक सेवाओं या अन्य सरकारी सेवाओं से जुड़े हैं। इससे नई पीढ़ी को भी गाइडेंस मिली। टॉपर मुक्ता राव को ही लें उनके साथ उनकी बहन के पति भी सफल हुए हैं। इसी प्रकार डॉ. प्रभा पूनिया के पति डॉ. अनिल लांबा डॉक्टर हैं। उनकी छोटी बहन प्रतिभा पूनिया पहले से एसडीएम हैं और छोटा भाई इस बार सफल हुआ है।

2. स्कूल शिक्षा से ही स्टूडेंट्स का विजन क्लीयर होता है
झुंझुनूं में स्कूल शिक्षा की नींव मजबूत रही है। यहां के बच्चों में उनका विजन क्लीयर रहता है। एज्यूकेशन के अलावा उन्हें दूसरी एक्टिविटी में भी आगे बढ़ाया जाता है। खास तौर पर आठवीं के बाद से ही बच्चे की शिक्षा एक तय दिशा के तौर पर आगे बढ़ती है। इसमें पैरेंट्स का भी अच्छा योगदान होता है। यही कारण है कि करीब 23 युवा पहले या दूसरे ही प्रयास में सफल हो गए।

3. छाेटे कंपीटिशन की भी गंभीरता से तैयारी करते हैं
भास्कर ने चयनित अभ्यर्थियों से भी बात की तो सामने आया कि इन्होंने अपना लक्ष्य तो बड़ा रखा, लेकिन छोटे अवसरों को भी हाथ से नहीं जाने दिया। लिपिक से लेकर अन्य सेवाओं की तैयारी भी उन्होंने बेहद गंभीरता के साथ की। इससे उनका एक बार सरकारी सेवा में हो गया। इससे दो फायदे हुए। नौकरी का तनाव कम हुआ और आयु की बाध्यता में भी लाभ मिल जाता है।

4. मेहनत पर यकीन करते हैं और असफलता से सीखते हैं
कलेक्टर यूडी खान ने एक महत्वपूर्ण कारण यह भी बताया कि झुंझुनूं के युवा मेहनत पर यकीन करते हैं और उसी स्तर से तैयारी करते हैं। असफलता पर वे हताश नहीं होते और उससे सीखते हैं। वे बताते हैं कि कई युवाओं से मैं खुद मिला हूं उनकी तैयारी का स्तर बेहद ऊंचा होता है। उनमें युवक हों या युवतियां हाथ में आए मौके को यहां के युवा किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहते।

संघर्ष से सफलता की कहानी

आंखों की रोशनी जाने और पिता के निधन से भी नहीं टूटी प्रतिभा, मां से नोट्स सुनकर तैयारी की, पहले प्रयास में सफल

झुंझुनूं | ये है जिद और जुनून की कहानी। बुलुंद हौसलों के दम पर सपना पूरा करने की दास्तां। यानी हौंसलें बुलंद हो और इरादे पक्के हों तो बड़ी से बड़ी मुश्किलें भी रास्ता नहीं रोक सकती। ऐसी ही एक कहानी है चिड़ावा में परमहंस कॉलोनी की रहने वाली प्रतिभा अग्रवाल की। जिन्होंने दृष्टिहीनता को कमजोरी नहीं बनने दिया और आरएएस परीक्षा में सफलता हासिल कर ली।

प्रतिभा ने ब्लाइंड कैटेगरी में प्रदेश में 10 वीं रैंक पाई है। बचपन से पढ़ाई में बेहद होशियार प्रतिभा ने स्कूल समय में ही तय कर लिया था कि उसे प्रशासनिक सेवा में जाना है, लेकिन बीए के बाद साल 2011 में अचानक उनकी आंखों की रोशनी कम होने लगी। धीरे धीरे उसकी आंखों की रोशनी 90 प्रतिशत तक चली गई, लेकिन प्रतिभा नहीं टूटी। नतीजा आज आरएएस में सफल हो गई।

प्रतिभा कहती हैं- जिद कर उसे कामयाबी में बदलने वाले ही इतिहास रचते हैं। पिता सुरेंद्र अग्रवाल का सपना था कि बेटी प्रशासनिक अधिकारी बने। इसलिए पिता के सपने को पूरा करने के लिए प्रतिभा ने पूरी ताकत झौंक दी। 2018 की मैन्स परीक्षा भी उन्होंने पास की। पिता का सपना सच हाेने जा रहा था, लेकिन इसी बीच 27 अगस्त 2020 को उनका निधन हो गया।

यह घटना प्रतिभा के लिए वज्रपात के समान थी, लेकिन मां सरला देवी ने उसे तनाव से बाहर निकाला और पिता के देखे सपने को पूरा करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद प्रतिभा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सहयोग : परिजन और दोस्त नोट्स को ऑडियो में बदल कर देते

प्रतिभा के दाे बड़ी बहनें व दाे छोटे भाई हैं। 2017 में उसने बीएड किया। इसके बाद आरएएस के लिए आवेदन किया और चिड़ावा में ही एक इंस्टीट्यूट से कोचिंग की। उसकी मेहनत देखकर दोस्तों व परिजनों ने भी पूरी मदद की। कोचिंग में वह सुन तो लेती, लेकिन लिखना और पढ़ना मुश्किल होता था।

ऐसे में परिजनों और दोस्तों ने मदद की। वे लोग नोट्स को ऑडियो में बदलते। करंट जीके की पीडीएफ फाइल मां उन्हें बोलकर सुनाती और उन नोट्स के ऑडियो बनाकर देती। इसमें उसके साथियों ने भी उनकी काफी मदद की। प्रतिभा ने केवल सुनकर ही इंटरव्यू की तैयारी की। परिजनाें के साथ उसकी दाेस्त श्रद्धा पंसारी ने इसमें उसकी पूरी मदद की और कई जगहों से ऑडियो वीडियो जुटाकर दिए।

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