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स्मृति शेष:अभी जाे धूप निकलने के बाद साेया है, तमाम रात तुझे याद करके राेया है

झुंझुनूं18 दिन पहले
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  • साबरी ब्रदर्स की जोड़ी बिखरी, बड़े बेटे फरीद साबरी के 47 दिन बाद पिता उस्ताद सईद साबरी का भी इंतकाल

ख्यातनाम कव्वाल सईद साबरी काे लाेग भले ही फिल्मी कव्वालियाें की वजह से जानते हाे, लेकिन शेखावाटी के लाेग उनकाे बेहतर इंसान के रूप में जानते थे। सईद साबरी सूफी कलाम ताे पेश करते ही थे। साथ ही भजन भी उतने ही जानदार तरीके से सुनाते थे। गंगा जमुनी तहजीब की जीती जागती मिसाल थे।

झुंझुनूं जिले से उनका बचपन से ही रिश्ता था। उनके नाना मशहूर कव्वाल सदीक साबरी झुंझुनूं में पीर हासिम रहमतुल्लाह अलेह के मुरीद थे। इस कारण सदीक साबरी यहां दरगाह में उर्स के माैके पर हाेने वाली महफिल शमां में कलाम पेश करते थे। अपने नाना के साथ ही सईद साबरी भी यहां दरगाह में आकर कव्वाली पेश करने लगे। वलियाें की दर पर कलाम पेश करने से उनकी आवाज की कशिश बढ़ती गई।

दरगाह इमामुल औलिया, हजरत कमरुद्दीन शाह दरगाह, हजरत इज्जतुलेह शाह दरगाह बगड़, हजरत इरादतुल्लाह शाह दरगाह इस्लामपुर में उर्स के माैके पर महफिले कव्वाली में कलाम पेश करते थे। दरगाह के पगड़ीबंध कव्वाल हाेने के कारण उनके साल में छह से अधिक बार आना हाेता था। हजरत कमरुद्दीन शाह दरगाह के उर्स में सईद साबरी अपने दाेनाें बेटाें व टीम के अन्य कव्वालाें के साथ तीन दिन रुकते थे।

फातेहाखानी के माैके पर जब वे तू देहराे हरम का मालिक है तू मालिक है, पेश करते ताे मेरा राेम- राेम हर बाेले, अपने गुरु की सेवा करले, इधर गिरजा, उधर गिरजा, वहां गिर जा जहां यार का जलवा नजर आए, जैसे कलाम पेश करते थे। उनके कलाम सुनने के लिए कई संत व साहित्य प्रेमी भी आते थे।

सादगी इस कदर की इतने बड़े फनकार हाेने के बाद एक बार वे मशहूर साहित्य व गजल फनकार जेबी शाह काॅलेज वाले प्रमाेद शाह के आग्रह पर उनकी हवेली में भी कलाम पेश करने चले गए थे। झुंझुनूं एवं सीकर की दरगाहाें से उनकाें बड़ी निस्बत थी। हालांकि बाद में वे फिल्माें में भी मशहूर हुए, लेकिन यहां के लाेग उन्हें पगड़ीबंध कव्वाल ही कहते थे। उनकी कव्वाली सुनने के लिए लाेग इंतजार करते रहते थे। कुछ समय पहले उनके बेटे फरीद साबरी का इंतकाल हाे गया था।

अल्लाउद्दीन दरगाह के गद्दीनशीन पीर माेहम्मद अली हासमी की जुबानी जानिए साबरी ब्रदर्स का झुंझुनूं से रिश्ता

सईद साबरी ने कव्वाली के साथ भजन भी पेश करते थे। राणी सती मंदिर में हुए कार्यक्रम में मैं क्या जानू राम तेरा गाैरखधंधा, मेरा राेम- राेम हर भाेले, मेरे कफन पर हिंदुस्तान लिखना जैसी कलाम पेश की। हिना फिल्म में लता मंगेशकर के साथ देर ना हाे जाए, कहीं देर न हाे जाए, तथा सिर्फ तुम में जिंदा रहने के लिए तेरी कसम इक मुलाकात जरूरी है के बाद उनकी बढ़ती शाेहरत के बाद लाेगाें की फरमाइश पर वे यहां भी अपने कार्यक्रमाें में इन गजलाें काे सुनाते थे।

सईद साबरी ने झुंझुनूं में आखिरी बार 2019 में हजरत कमरुद्दीन शाह दरगाह में कलाम पेश किए थे। जाे धूप निकलने के बाद साेया है, तमाम रात तूझे याद करके राेया है, यह उनकी झुंझुनूं में आखिरी कव्वाली थी। हजरत कमरुद्दीन शाह दरगाह के गद्दीनशीन एजाज नबी व उर्स कमेटी संयाेजक अशरफ अली माेयल ने बताया कि दाे साल से काेराेना के कारण उर्स नहीं हाेने पर सईद साबरी यहां नहीं आए थे।

वरना हर उर्स में वे हाजिरी देने के लिए आते थे। 20 अप्रैल काे ही सईद साबरी के बड़े बेटे फरीद साबरी का निधन हाे गया था। सईद साबरी और उनके दोनों बेटे फरीद व अमीन की जोड़ी साबरी ब्रदर्स के नाम से मशहूर थी। अब ये जोड़ी बिखर गई।

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