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डॉक्टर्स डे:जब किसी तरह की जांच नहीं होती थी तब मरीज से केवल तसल्ली से बात करके ही जान लेते थे उसे क्या बीमारी है

झुंझुनूं4 महीने पहले
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  • क्या बदलाव आया पहले और आज के दौर में बता रहे हैं हमारे जिले के सीनियर डॉक्टर

कोरोना संकट के बीच आज डॉक्टर्स की भूमिका सबसे बड़े कोरोना योद्धा के रुप में उभरी है। हमारे समाज में डॉक्टर्स हमेशा ही भगवान का रूप समझे जाते रहे हैं, लेकिन यह छवि बनने के पीछे डॉक्टर्स की इस कार्य के प्रति समर्पण और सेवा की भावना भी रही है। आज डॉक्टर्स डे पर दैनिक भास्कर ने कुछ ऐसे ही डॉक्टर्स से बात की। जो पिछले करीब 5 दशक से इस सेवा में हैं। इन्होंने वो दौर देखा जब जांच के नाम पर कुछ नहीं था। ये लोग बताते हैं कि हमारे पास केवल एक तरीका था कि मरीज को तसल्ली से सुनें। उसकी बातों के आधार पर बीमारी का पता लगाते थे और इलाज करते थे। ये डॉक्टर्स आज भी इसी तरीके से अपने मरीजों को देखते हैं।

कम से कम 15 मिनट देखते हैं एक मरीज को

झुंझुनूं. जाने माने फिजीशियन डाॅ. एचके गुप्ता 84 साल के हाे गए हैं। 1996 में बीडीके अस्पताल से रिटायर हुए। आज भी मरीजों को उसी तरह से देखते हैं और एक मरीज को कम से कम 15 मिनिट का समय देते हैं। डॉ. गुप्ता बताते हैं कि उनका परिवार जोधपुर का रहने वाला है। परिवार मिठाइयों के कारोबार से जुड़ा था और उनसे पहले कभी कोई डॉक्टर नहीं बना। वे डॉक्टर बनना चाहते थे तो पिता ने इस शर्त पर मंजूरी दी कि जोधपुर में टॉप करोगे तो ही मेडिकल में जा सकोगे। ऐसा ही हुआ। 1966 में डॉक्टर बनें और झुंझुनूं में पोस्टिंग मिली। यह वह समय था जब जांच की सुविधा नहीं हाेती थी। जिले में बीडीके अस्पताल में ही अकेले एक्सरे की सुविधा थी। प्राइवेट लैब तो होती ही नहीं थी। ऐसे में एक ही तरीका होता था कि मरीज की बात तसल्ली से सुनें और उसी के आधार पर बीमारी का पता लगाते थे।

संसाधनों के बिना देखना चुनौती होता था

जिले के नांद निवासी डाॅ. उम्मेदसिंह शेखावत शेखावाटी के पहले पैथाेलॉजिस्ट डाॅक्टर हैं। 1978 में एमबीबीएस किया और बीकानेर में ही सहायक प्रोफेसर बन गए। इस बीच झुंझुनूं आए तो पता चला कि यहां कोई पैथोलॉजिस्ट नहीं है तो फिर इसी से एमडी किया। डाॅ. शेखावत बताते हैं कि पहले जांच का काम काफी सूक्ष्म हाेता था। इतने आधुनिक उपकरण और तकनीक नहीं थी। अनुभव और नाॅलेज के सहारे ही सटीक जांच हाे सकती थी। लगातार इस फील्ड में काम करते रहने से अनुभव होता गया। पहले की तुलना में जांच अब आसान हाे गई है। वे बताते हैं कि पहले बीमारियां भी सिमित थी, लेकिन अब इनका दायर बढ़ा है। पहले जांच के इतने संसाधन नहीं होते थे। ऐसे में बड़ा संकट यही होता था कि बीमारी का पता कैसे लगाएं तो तरीका यही होता था कि मरीज को तसल्ली से सुना जाए।

बिना एक्स रे जोड़नी पड़ती थी हडि्डयां

शहर के आर्थाेपैडिक सर्जन डाॅ. शुभकरण कालेर बीडीके अस्पताल में पीएमओ हैं। नवलगढ़ के चाैराड़ी के रहने वाले डॉ. कालेर बिना आधुनिक मशीनाें के ही बीडीके अस्पताल में हिप रिप्लेसमेंट करने वाले शेखावाटी के गिने चुने डाक्टराें में हैं। डाॅ. कालेर काे बचपन में काफी कठिनाइयाें का सामना करना पड़ा। पिता का छाेटी उम्र ही देहांत हाे गया था। उनकी मां पूरी खेती संभालती थी। 1986 में एमबीबीएस किया। डाॅ. शुभकरण कालेर बताते हैं कि उस वक्त मशीनाें के नाम पर केवल एक्स रे हुआ करता था। वह भी तुरंत नहीं मिलता था। ऐसे में हड्डी टूटने पर केवल अनुभव के आधार पर प्लास्टर करना पड़ता था। वे बताते हैं कि अब मरीजों के व्यवहार में भी बदलाव आ गया है। वे अब आराम की जगह पांच दिन में ही चलना चाहते हैं। बीडीके अस्पताल में कोरोना यूनिट स्थापित कर मरीजों को यही ठीक किया।

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