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सीकर के गणेश्वर धाम की होली:400 साल पुरानी परम्परा की वजह से इस गांव में नहीं होती रंगों की धुलंडी, 8 दिन के 'डूडू' महोत्सव में खेतले हैं पारम्परिक खेल

सीकर3 महीने पहले
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महोत्सव में ख्याल दंगल के दौरान ग्रामीण फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
महोत्सव में ख्याल दंगल के दौरान ग्रामीण फाइल फोटो

होली के बाद अधिकतर जगहों पर रंग और गुलाल से धुलंडी मनाई जाती है। लेकिन, नीमकाथाना के गणेश्वर धाम में ग्रामीण धुलंडी के दिन रंगों से होली खेलने की बजाय पारम्परिक खेल खेलते हैं। इसका नाम 'डूडू' रखा हुआ है। शीतलाष्टमी तक चलने वाले इस महोत्सव के अंतिम दिन एक दूसरे को रंग गुलाल लगाते हैं। इसमें ग्रामीण कुश्ती दंगल, घोड़ों की दौड़, निशानेबाजी, ऊंट दौड़ और कबड्डी जैसे कई खेल शामिल हैं। प्रतियोगिता में आसपास के करीब 15 गांवों के 4 हजार लोग शामिल होते हैं।

दरअसल, इस परम्परा के पीछे भी एक कहानी है। करीब 400 साल पहले रायसल के महाराजा का राजतिलक धुलंडी के दिन हुआ था। उस दिन से ग्रामीण धुलंडी पर नए कपड़े पहनकर पहाड़ी पर राजा के दर्शन करने जाते हैं। इसके बाद दोपहर से पारम्परिक खेलों का डूडू महोत्सव शुरू होता है। प्रतियोगिता देखने के लिए भी आसपास के गांव लोग भी यहां आते हैं। जीतने पर उनका सम्मान भी किया जाता है।

भोजपुर्या गांव जो उजड़ गया था, उसे राजा रायसल ने फिर से बसाया और उसका नाम गणेश्वर रखा था। तभी से गणेश्वर के लोग रंगों से होली खेलने की बजाय उनके राजतिलक के अवसर पर मनाया गया डूडू महोत्सव मनाते हैं।

कंटेट: श्रवण भारद्वाज

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