सावधानी वही-शब्द नए / गांवों में आज भी गोबर से सेनेटाइज करते हैं घर, बीमार को क्वारेंटाइन करने की भी परंपरा

In villages, even today sanitize houses with cow dung, also the tradition of quarantine the sick
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In villages, even today sanitize houses with cow dung, also the tradition of quarantine the sick

  • कोरोना काल में जो नियम अनिवार्य किए गए हैं, वे सदियों से हमारी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा रहे हैं

दैनिक भास्कर

May 20, 2020, 03:56 PM IST

सीकर. कोरोना के दौर हाथ जोड़कर अभिवादन, हाथ-पैर धोकर घर में प्रवेश, सिर पर पगड़ी या गमछे से चेहरा ढंकना एक बार फिर हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है। एक बार फिर इसलिए क्योंकि ये तो हमारी पुरातन पंपराएं हैं। आज भी गांवों-शहरों में ऐसे लोग हैं, जो मेहमानों से हाथ-पैर धोकर घर में प्रवेश करने का आग्रह करते हैं। मंदिरों में हमेशा हाथ-पैर धोकर ही प्रवेश किया जाता है। घर में किसी के बीमार होने पर खासकर चिकनपॉक्स (छोटी माता) होने पर उसे अलग कमरे में रखा जाता था। जो भी देखरेख करता, उसे भी सफाई रखनी होती थी। फिलहाल इसे क्वारेंटाइन कहा जा रहा है। ये परंपराएं आधुनिकता में गायब होने लगी थीं, लेकिन कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए फिर से इसे अपनाया जा रहा है। कई समाजों ने यह तय किया है कि वे इन परंपराओं को पुनर्जीवित करेंगे। 
सेनेटाइजेशन : रोज गोबर से लिपाई
रैवासा पीठाधाश्वर डाॅ राघवाचार्य महाराज का कहना है कि गांवों में आज भी लोग सुबह-शाम घर को गोबर से लीपते हैं। गाय के गोबर में सुपर बग पाए जाते हैं जो हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म कर देते हैं। इस तरह यह घर को सेनिटाइज करना हुआ। इसके अलावा घर के बाहर पानी से भरा बर्तन का पात्र भी रखा जाता है। बाहर से जब भी कोई आता है तो पहले पानी से हाथ-पैर धोता है तभी अंदर प्रवेश करता है। इससे घर आने वाले सेनेटाइज हो जाते हैं।
लॉकडाउन :हर साल 4 माह के लिए
लक्ष्मगणगढ़ के बड़ा रघुनाथ मंदिर के महंत अशोक दास कहते हैं कि भारत में हर साल में एक मौका ऐसा आता है जब हिंदू धर्म की सारी धार्मिक गतिविधियां पूरी तरह से बंद हो जाती हैं। वह भी एक या दो दिन के लिए नहीं बल्कि 4-4 महीनों के लिए। कभी-कभी 5 महीने के लिए भी। इसे हम चातुर्मास और देवशयनी के नाम से जानते हैं। इस बीच न तो शादियां होती हैं न कोई बड़े अनुष्ठान होते हैं। इससे सोशल गेदरिंग खुद ब खुद कम हो जाती है।
अपरिग्रह : जितना जरूरी, उतना संचय
जैन समाज के विनोद सेठी ने कहा, लॉकडाउन के बाद लोगों ने घरों में राशन भरना शुरू कर दिया। किसी-किसी ने एकसाथ 4 महीने का राशन भी खरीद लिया। इस जमाखोरी का असर ये हुआ कि बाजार में जरूरी सामग्रियों की कीमतें अचानक से बढ़ गईं। सनातन परंपरा में इसे गलत माना गया है और अपरिग्रह पर जोर दिया गया है। यानी जितना जरूरी है उतना ही संचय करें। आज देशभर की सरकारें भी व्यापारियों और लोगों से यही अपील कर रहीं हैं।
क्वारेंटाइन : ‘माता’ हो ताे अलग करना
अग्रवाल समाज के ट्रस्टी सुरेश अग्रवाल कहते हैं कि क्वारंटाइन करना भारतीय परंपरा में काफी पहले से है। घर में किसी को चिकन पॉक्स(आम बोलचाल में छोटी माता) होने की दशा में यह विधि भारतीय घरों में प्राचीन काल से अपनाई जाती रही है। इसमें बीमार सदस्य को घर के अलग कमरे में रखा जाता है। एक देखरेख करने वाले व्यक्ति के अतिरिक्त उस कमरे में कोई नहीं जाता। 15 दिन के इस काल में घरों में केवल सादा खाना ही बनाया जाता है।
मास्क : ताकि किसी काे नुकसान न हाे
श्वेतामंबर जैन समाज के शरद जैन का कहना है कि भारत में मास्क का इस्तेमाल काफी पहले से हो रहा है। जैन साधु- साध्वियां मुखकोश लगाते हैं। हालांकि, इसका मकसद उन सूक्ष्म जीवों की रक्षा का होता है जो मुंह या नाक से अंदर चले जाते हैं। और आज इसका इस्तेमाल वायरस से बचने के लिए किया जा रहा है। दोनों ही स्थितियों में मास्क सुरक्षा का उपाय है और भारत में इसका इस्तेमाल नया नहीं है। काफी समय से ये इस्तेमाल किया जा रहा है।

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