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रामायण पाठ:राजा दशरथ ने संन्यास मार्ग ग्रहण करने का निर्णय ले लिया एवं श्रीराम को राजगद्दी सौंपने का मन बनाया

सीकर2 महीने पहले
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लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।। अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।। भावार्थ: सीता समेत दोनों भाइयों (राम-लक्ष्मण) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायीं। वह पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती हैं, किन्तु धरती बीच (फटकर समा जाने के लिए रास्ता) नहीं देती और विधाता मृत्यु नहीं देता।

सांस्कृतिक मंडल की ओर से आयोजित नवाह्नपारायण में भगवान राम के राज्याभिषेक की तैयारी एवं वन गमन के प्रसंग काे कहा गया। रैवासा पीठाधीश्वर राघवाचार्य महाराज ने प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि जनकपुरी में माता सीता से विवाह के बाद भगवान श्रीराम प्रजा के साथ बाजे-गाजे सहित अयोध्या पधारे।

इधर राजा दशरथ ने संन्यास मार्ग ग्रहण करने का निर्णय ले लिया एवं श्रीराम को राजगद्दी सौंपने का मन बनाया। राज्‍यसभा में दशरथ की मंशा को भांप कर महामंत्री ने श्रीराम चंद्र के राज्याभिषेक का प्रस्ताव रखा।

जिसे एकमत से सभी सभासदों ने स्वीकार कर लिया। बड़े ही धूमधाम से घोषणा कर दी गई कि अमुक दिन शुभ वेला में श्रीराम अयोध्या नरेश बन जाएंगे। यह खबर जब कैकेयी को मिली तो तब काफी आहत हुई। महाराजा दशरथ की तीनों पत्नियों में कैकेयी सबसे छोटी कश्मीर की राजकुमारी थी।

राजा ने जब उनके साथ विवाह किया तो उनकी दासी मंथरा भी साथ में अयोध्या आई थी। मंथरा एक कुटिल राजनीतिज्ञ थी। उसने कैकेयी को मंत्रणा दी कि राम के राज्याभिषेक से कैकेयी का भला नहीं वरन अहित ही होने वाला है। उसने कैकेयी को राजा दशरथ से अपने दो वर मांगने की सलाह दी। अब कैकेयी ने राजा दशरथ से वह दो वर मांगे, पहला भरत को अयोध्या की राजगद्दी तथा दूसरा राम को चौदह वर्ष का वनवास। राजा दशरथ यह बर्दाश्त न कर सके। कैकेयी को बहुत मनाने की कोशिश की। उसे बुरा-भला भी कहा।

लेकिन जब कैकेयी ने उनकी एक न मानी तो वह आहत होकर वहीं कोपभवन में गिर गए। राम को जब इस विषय की आभास हुआ तो वह स्वयं ही दशरथ के समीप गए और उनसे आग्रह किया कि रघुकुल की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए वह कैकेयी को दोनों वर प्रदान कर दें। श्रीराम संन्यासियों का वस्त्र पहनकर सीता तथा लक्ष्मण के साथ वन की ओर निकल पड़े।

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