अस्पतालों में डिलीवरी के लक्ष्य में भी पीछे:स्वास्थ्य विभाग मां-नवजात की देखभाल नहीं करता, इसलिए 6 जिलों में सीकर सबसे निचले पायदान पर

सीकरएक वर्ष पहले
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  • सीकर को 10 में से महज 5.51 अंक मिले, नवजात के टीकाकरण में भी फेल हुआ
  • स्वास्थ्य विभाग गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की देखभाल नहीं कर सका

जयपुर संभाग के 6 जिलों में एक साल में ही सीकर विभिन्न योजनाओं में सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है। चिंताजनक इसलिए है, क्योंकि-गर्भावस्था में न महिलाओं को स्वास्थ्य सेवा नसीब हो रहा है न ही डिलीवरी के बाद इलाज। जन्म के बाद बच्चों को जानलेवा बीमारियों से बचाने वाले टीके भी नहीं लग पा रहे। आंकड़ों की समीक्षा एक अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 के मध्य तक की गई है। संभाग के जयपुर प्रथम, जयपुर द्वितीय, दौसा, अलवर, झुंझुनूं और सीकर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं को शामिल किया गया। सीकर जिले को समीक्षा में 10 में से महज 5.51 अंक मिले।

स्वास्थ्य विभाग गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की देखभाल नहीं कर सका। डिलीवरी भी लक्ष्य के मुताबिक हॉस्पिटलों में नहीं कराई जा सकी। गर्भवती महिलाओं को टिटनेस का टीका लगाने में स्वास्थ्य विभाग फेल रहा। बच्चों का टीकाकरण लक्ष्य में पूरा नहीं हुआ। चौंकाने वाला यह है कि बेबी किट इश्यू करना और पहले तीन माह एएनसी रजिस्ट्रेशन करने में भी अफसर पूरी तरह फेल हो गए। अफसर मरीजों से मिलने वाली शिकायतें तक दूर नहीं कर पा रहे। पड़ोसी झुंझुनूं जिला टॉप स्थान बनाने में कामयाब रहा। झुंझुनूं को 6.25 फीसदी अंक मिले। दौसा जिले को तीसरा स्थान मिला है। जयपुर प्रथम को तीसरा और अलवर जिला चौथा स्थान बनाने में कामयाब रहा। जयपुर द्वितीय को पांचवां स्थान मिला है। सीकर जिले के आठों ब्लॉकों में नीमकाथाना की स्थिति संतोषजनक मिली है। नीमकाथाना ब्लॉक को सबसे ज्यादा नंबर मिले हैं। जबकि खंडेला ब्लॉक की स्थिति सबसे खराब है। खंडेला के बाद श्रीमाधोपुर ब्लॉक की स्थिति भी अच्छी नहीं मिली।

स्वास्थ्य विभाग ऐसे बरतता गया लापरवाही और गिरती गई रैंक, अिधकारी सिर्फ खानापूर्ति करते गए

1. मातृ मृत्यु राेकने के लिए गर्भावस्था में महिला की समय-समय पर जांच का नियम है, लेकिन अाशा सहयोगिनी से लेकर पीएचसी प्रभारी ने लापरवाही बरती। 2010 आशा सहयोगिनियां इस काम को अंजाम देने में फेल साबित हुई। 815 सब सेंटरों की एएनएम और 99 पीएचसी प्रभारी ने भी ढंग से काम नहीं किया। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान में खानापूर्ति होती रही। 18 हजार महिलाओं की गर्भावस्था में जांच नहीं हो पाई।

2. आशा सहयोगिनी, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और पीएचसी प्रभारी की संस्थागत डिलीवरी के लिए महिला को प्रेरित करने की जिम्मेदारी थी, लेकिन इन्होंने जिम्मेदारी नहीं निभाई। इसलिए 15 हजार महिलाओं की डिलीवरी हॉस्पिटल से बाहर हुई।

3. आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य केंद्रों पर बच्चों को टीके नहीं लग पाए। आशा सहयोगिनी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और एएनएम ने लापरवाही बरती है। सेक्टर, ब्लॉक और जिला स्तरीय अधिकारियों ने मॉनिटरिंग में लापरवाही बरती। 1 अप्रेल 2020 से फरवरी 2021 तक बच्चों को 12 हजार टीके नहीं लग पाए।

4. डिलीवरी के बाद महिलाओं को परिवार नियोजन के लिए प्रेरित करना था, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के स्टाफ ने रुचि नहीं दिखाई। चिकित्सक कॉपर-टी लगाने में लापरवाही बरतते गए। 6200 महिलाओं को कॉपर-टी नहीं लग पाई।

5. जिले में 10604 महिलाओं की नसबंदी का टारगेट था, लेकिन स्वास्थ्य केंद्रों पर नसबंदी कैंप नहीं हो पाए। डॉक्टर और स्टाफ महिलाओं को नसबंदी के प्रेरित करने में भी नाकाम रहे। नतीजतन-6218 महिलाओं ने नसबंदी कराई।

7. जिले में 35001 महिलाओं की डिलीवरी के बाद देखभाल का लक्ष्य था। लेकिन अधिकारियों की उदासीनता के कारण स्वास्थ्य विभाग 1 अप्रेल 2020 से मध्य फरवरी 2021 तक 24787 महिलाओं तक ही पहुंच पाया। पीएचसी प्रभारी और सबसेंटर का स्टाफ लापरवाही दर लापरवाही बरतता गया।

8. टारगेट के मुताबिक 58900 महिलाओं का पहले तीन माह में रजिस्ट्रेशन होना था, लेकिन 34911 महिलाओं को रजिस्ट्रेशन हो पाया। अधिकारियों ने गंभीरता नहीं दिखाई। सबसेंटर से लेकर जिला अस्पताल तक स्वास्थ्य विभाग का स्टाफ इसमें लापरवाही बरतता गया। वे गर्भवती महिलाओं को ढूंढने में नाकाम रहे।

9. जन्म के बाद 21264 बच्चों को बेबी किट बांटे जाने थे, लेकिन लेबर रूम में जन्म के बाद नवजात को बेबी किट बांटे में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने लापरवाही बरती। जिले में महज 4931 बेबी किट बांटे।

10. गर्भावस्था के दौरान जिले में 58900 गर्भवती महिलाओं को टीटी का इंजेक्शन लगना था, लेकिन स्वास्थ्य केंद्रों पर यह इंजेक्शन नहीं लगा। 21 हजार गर्भवती महिलाएं टीटी इंजेक्शन से वंचित रही। आशा सहयोगिनी, एएनएम और पीएचसी प्रभारी इस ओर ध्यान नहीं लगाया।

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