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अस्पताल 150 बेड का, जगह 100 की भी नहीं:ओपीडी मरीजों को देखने तक के लिए कमरे कम, 97 लाख रु. मंजूर हाेने के बावजूद नहीं बन रहा आईसीयू

सुजानगढ़4 दिन पहले
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पर्ची काउंटरों पर लगी रोगियों की भीड़। - Dainik Bhaskar
पर्ची काउंटरों पर लगी रोगियों की भीड़।
  • सुजानगढ़ उपजिला अस्पताल का मामला : ट्रोमा सेंटर की बिल्डिंग में मातृ एवं शिशु अस्पताल को शिफ्ट करें तो समाधान संभव
  • अस्पताल में सभी सुविधाएं, जगह नहीं होने से मरीजों को नही मिल रहा लाभ

डेढ़ लाख आबादी वाले शहर के सबसे बड़े राजकीय बगड़िया उप जिला अस्पताल में कई परेशानियां सामने आ रही हैं। रोगियों के बढ़ते दबाव के चलते अस्पताल छोटा पड़ने लग गया। डॉक्टरों के बैठने तक के कमरे कम पड़ रहे हैं। सरकार ने अस्पताल को 100 बेड से 150 का कर दिया, लेकिन हकीकत ये है कि अस्पताल में 100 बेड लगना भी मुश्किल है। इतनी परेशानियों के बावजूद मातृ एवं शिशु अस्पताल भी यहीं चलाना पड़ रहा है। सरकार की ओर से अस्पताल में आईसीयू बनाने की घोषणा के बाद 97 लाख रुपए स्वीकृत हो चुके हैं। जगह अभाव के चलते यहां आईसीयू नहीं बन सकता।

भास्कर पड़ताल : ये तीन बड़े कारण जिनकी वजह से एमसीएच को शिफ्ट करना जरूरी

अस्पताल की अव्यवस्थाओं के कारण व समाधान को लेकर भास्कर ने पड़ताल कि तो पता लगा कि अस्पताल में मातृ एवं शिशु अस्पताल को अलग शिफ्ट करने पर कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। करीब दो महीने पहले विधायक मनोज मेघवाल ने भी रोगी हित के लिए नाथोतालाब स्थित ट्रोमा सेंटर का चयन कर मातृ एवं शिशु अस्पताल वहां शिफ्ट करने के लिए पीएमओ को पत्र जारी किया था। पत्र के आधार पर पीएमओ डॉ. सुरेशंचद्र कालानी ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग सेवाएं के निदेशक को पत्र लिखकर शिफ्टिंग करने की स्वीकृति मांगी थी। डेढ़ माह बीत जाने के बाद भी चिकित्सा विभाग ने अभी तक इस तरफ ध्यान नहीं दिया।

1. 18 की जगह 27 डॉक्टर हो गए

अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ के साथ-साथ अब 27 डॉक्टर हो चुके हैं। पहले यहां 18 ही डॉक्टर थे। इसलिए डॉक्टरों के बैठने की दिक्कत नहीं थी। अब कई कमरों में दो से चार डॉक्टर तक बैठाने की नौबत आ चुकी है। रोगियों से खचा-खच भरे अस्पताल में एक ही कमरे में रोगियों को कतारबद्ध खड़े होकर जांच करवानी पड़ती है।

2. नहीं बन पा रहा आईसीयू

सरकार की ओर से सुजानगढ़ के बगड़िया अस्पताल में आईसीयू बनाने की घोषणा के बाद 97 लाख रुपए स्वीकृत हो चुके हैं। लेकिन अस्पताल परिसर में जगह के अभाव के चलते यहां आईसीयू नहीं बन सकता। पीडब्ल्यूडी ने अस्पताल की दशकों पुरानी बिल्डिंग को असुरक्षित मानते हुए तीसरी मंजिल बनाने को भी खतरा बता दिया है।

3. बांटने पड़ रहे ऑपरेशन-डे

अस्पताल में रोगियों के ऑपरेशन के लिए भी तारीख देनी पड़ती है। सर्जरी, ऑर्थो व ईएनटी के ऑपरेशन के लिए ऑपरेशन-डे तय करने पड़ रहे हैं। गायनिक-बच्चों के ऑपरेशन तय समय पर करने पड़ते हैं। ऐसे में अन्य ऑपरेशन के लिए लोगों को मजबूरी में कई बार बाहर निजी अस्पतालों में ही ऑपरेशन करवाना पड़ता है।

एमसीएच शिफ्ट होने पर ये 5 बड़े फायदे

  • 1. अस्पताल के आउटडोर में कमी आएगी, भीड़ नहीं होने से संक्रमण का खतरा कम होगा। गायनिक-शिशु रोग के रोगियों का दबाव कम होने से अन्य रोगियों को राहत मिलेगी।
  • 2. गायनिक व शिशु रोग का प्रतिदिन का आउटडोर करीब 400 से ज्यादा रहता है। एमसीएच ट्रोमा सेंटर में शिफ्ट होने पर गायनिक-शिशु रोग के चार डॉक्टरों के कमरों की जगह कम होगी।
  • 3. गायनिक वार्ड की जगह खाली होने पर 10 बेड का आईसीयू आसानी से यहां बन सकेगा, जिससे गंभीर रोगियों को रेफर नहीं करना पड़ेगा। बच्चों के इलाज का एसएनसीयू वार्ड भी खाली होने से यहां अलग से ऑर्थो-सर्जरी का ऑपरेशन थियेटर बन सकेगा।
  • 4. सातों दिन ऑपरेशन हो सकेंगे। रोज होने वाले गायनिक के ऑपरेशन यहां नहीं होने के बाद ईएनटी व अन्य ऑपरेशन आसानी से हो सकेंगे।
  • 5. कोरोना की संभावित तीसरी लहर व अन्य संक्रमण से गर्भवती महिलाएं-नवजात व बच्चे बच सकेंगे।

अस्पताल का रोज का आउटडोर 1200 के करीब

  • अस्पताल में प्रतिदिन 1000 से 1200 का आउडटोर के चलते महीने के 35 हजार व सालाना सवा चार लाख रोगी यहां इलाज के लिए आते हैं।
  • गायनिक-शिशु रोग के 200-200 के हिसाब से चार सौ रोगी प्रतिदिन व महीने में ये संख्या 12 हजार व सालाना 72 हजार रोगियों पर रहती हैं।
  • अस्पताल में रोज करीब 14 डिलीवरी होती हैं। महीने में औसतन 400 व सालाना औसतन 5 हजार डिलीवरी का आंकड़ा रहता हैं।
  • अस्पताल में प्रतिदिन औसतन एक-दो सिजेरियन (ऑपरेशन) होते हैं।
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