खेल से खिलवाड़:5 वर्षों से जिला खेल अधिकारी और खेलों के लिए स्थाई कोच तक नहीं, खिलाड़ी कैसे लाएंगे मैडल ?

हनुमानगढ़एक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
  • जिला स्टेडियम में करीब 200 से अधिक खिलाड़ी अपने स्तर पर ही कर रहे तैयारी

क्या द्रोणाचार्य के बिना एकलव्य की कल्पना की जा सकती है? भले ही मूर्तरूप से सही, लेकिन बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिल सकता। कुछ ऐसा ही हाल हमारे जिला मुख्यालय पर बने राजीव गांधी स्टेडियम का है। यहां खिलाड़ियों को विभिन्न खेलों की प्रैक्टिस करवाने के लिए गुरु यानी कोच ही नहीं हैं। जिला खेल अधिकारी की सीट भी पिछले 5 वर्षों से खाली पड़ी है। जिला स्टेडियम के करीब 13 खेल संघ रजिस्टर्ड हैं।

इस हिसाब से यहां 15 से अधिक कोच होने चाहिए। लेकिन यहां सिर्फ एक ही स्थाई कोच है जो कार्यवाहक जिला खेल अधिकारी का भी पद संभाल रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि हमारी सरकार खेलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भले ही ग्रामीण ओलंपिक खेलों का आयोजन करवा रही है।

लेकिन, कोच नहीं होने के कारण खिलाड़ियों का खेल से मोहभंग हो रहा है। विभिन्न खेलों में रुचि रखने वाले खिलाड़ी सभी प्रतियोगिताओं में भाग नहीं ले पा रहे। ऐसे में खेल प्रतिभाओं को बेहतर संसाधन और कोच न मिल पाने के कारण उनका हुनर दम तोड़ रहा है।

ग्रामीण प्रतिभाएं तोड़ रही दम, कबड्‌डी, खो-खो, हॉकी सहित परंपरागत खेलों का रुझान हो रहा कम

जंक्शन स्थित राजीव गांधी स्टेडियम में सुबह और शाम प्रैक्टिस करने के लिए करीब 200 खिलाड़ी रोजाना आते हैं। कोच नहीं होने के कारण खिलाड़ी खेल की बारीकियां तक नहीं समझ पाते हैं। संसाधनों के अभाव और कोच के बिना खिलाड़ी खुद ही जैसे तैसे करके तैयारी करते हैं। वहीं बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने एसआई सहित अन्य भर्ती परीक्षाएं भी पास की हैं। वे फिजिकल की ट्रेनिंग लेने के लिए स्टेडियम आते हैं। इनके लिए एनआईएस कोच बेहद जरूरी होता है लेकिन इनके अभाव में वे खिलाड़ियों से पूछ पूछ कर प्रशिक्षण ले रहे हैं।

बाक्सिंग, हॉकी, बास्केटबाल सहित कई प्रमुख खेलों के कोच नहीं: बास्केट बॉल, जूडो, हॉकी, रोलबाॅल, बैडमिंटन, फुटबॉल, नेटबाल, बॉक्सिंग, जूडो, वॉलीबॉल आदि खेलों में कोच की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है। ये ऐसे खेल हैं, जिसमें कोच ही खिलाड़ियों को खेल की बारीकियां सिखाते हैं। ख़ास बात यह है कि जिले के खिलाड़ी अपने स्तर पर ही नेशनल और इंटरनेशनल खेल कर जिले को गोल्ड मैडल तक दिला चुके हैं। लेकिन अब खिलाड़ियों को प्रशिक्षण नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में खेल प्रतिभाओं के निखरने पर सवाल उठना लाजमी है।

कोताही: 3 महीने से अस्थाई कोच की नियुक्तियां नहीं

खेलों को बढ़ावा देने के लिए हमारी सरकार और प्रशासन कितना गंभीर है इसका अंदाजा आप ऐसे लगाएं कि पिछले 5 वर्षों से जिला खेल अधिकारी का पद भी अतिरिक्त कार्यभार के भरोसे है। वर्तमान में वेट लिफ्टिंग के स्थाई कोच को ही कार्यवाहक जिला खेल अधिकारी का दायित्व सौंप दिया है। अब वे भी खेल की तैयारियों को छोड़ वीसी, फाइलों आदि में व्यस्त हो चुके हैं। वहीं कुछ खेलों के लिए अस्थाई कोच भी लगाए जाते हैं लेकिन पिछले 3 महीनों से उनकी भी नियुक्ति नहीं हुई है।

जल्द ही अस्थाई कोच की नियुक्ति होगी- खेल अधिकारी

बिना कोच के खिलाड़ियों को समस्याएं होती हैं यह हम जानते हैं। हमने कई खेलों के लिए कोच लगाने की मांग उच्चाधिकारियों से की है। आगामी टूर्नामेंट्स में भी कोच की सख्त ज़रुरत होगी। अस्थाई कोच लगाने के भी प्रस्ताव भेजे गए हैं। सीताराम प्रजापत, कार्यवाहक जिला खेल अधिकारी।

खबरें और भी हैं...