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किसानों से अन्याय:हमारे धान की विदेशों में डिमांड, फिर भी समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं, राज्य सरकार ने केंद्र को पत्र तक नहीं लिखा

हनुमानगढ़4 दिन पहले
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  • परमल धान का बाजार भाव समर्थन मूल्य से कम होने के कारण किसानों को हो रहा आर्थिक नुकसान

जिले में धान (चावल) की खेती का रकबा प्रति वर्ष बढ़ रहा है, लेकिन समर्थन मूल्य पर आज तक कभी खरीद नहीं हुई। सरकारी दर पर खरीद नहीं होने की वजह से किसानों को अपनी उपज कम दामों में बेचनी पड़ रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे जिले में पैदा होने वाले धान की डिमांड विदेशों में भी है। किसान हितैषी होने का दावा करने वाली राज्य की कांग्रेस सरकार ने अब तक केंद्र को समर्थन मूल्य पर खरीद करने की डिमांड तक नहीं भेजी है। इसका खामियाजा धान उत्पादक हजारों किसानों को भुगतना पड़ रहा है।

जिले के काश्तकार परमल व बनास्पति धान की विभिन्न किस्मों की खेती करते हैं। केंद्र सरकार परमल धान का ही समर्थन मूल्य घोषित करती है और इसकी ही खरीद करती है। जिले में समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं होने के कारण परमल धान के बाजार भाव बहुत कम रहते हैं। गत वर्ष 1888 रुपए प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य तय था, लेकिन बाजार भाव 1500 रुपए प्रति क्विंटल से भी कम रहे। ऐसे में किसानों को लगभग 50 करोड़ से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ।

इस बार केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य में 72 रुपए की बढ़ोत्तरी करते हुए प्रति क्विंटल दाम 1960 रुपए कर दिए हैं, लेकिन खरीद के कोई आसार नजर नहीं आ रहे। बाजार भाव कम रहने की वजह से पिछले साल भी समर्थन मूल्य पर खरीद की मांग उठी थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इस बार धान की बिजाई के समय से काश्तकार समर्थन मूल्य पर खरीद की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक राज्य सरकार ने केंद्र को पत्र तक नहीं लिखा है। ऐसे में इस बार भी परमल धान के बाजार भाव कम रहने का अंदेशा है।

किसान अपने बलबूते प्रति वर्ष 20 लाख क्विंटल धान का कर रहे उत्पादन

किसान वर्षों से धान उत्पादक क्षेत्र को राइस बैल्ट घोषित कर सुविधा उपलब्ध करवाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही। काश्तकार अपने बलबूते पर प्रति वर्ष 20 लाख क्विंटल से अधिक धान की पैदावार करते हैं। वर्ष 2020-21 में 36 हजार 950 हेक्टेयर में धान की बुवाई हुई और 22 लाख 17 हजार क्विंटल पैदावार हुई। इतनी बड़ी मात्रा में धान उत्पादन के बावजूद किसानों के लिए यह खेती फायदे की बजाए घाटे का सौदा ही साबित हो रही है। इसका मुख्य कारण सरकारी खरीद नहीं होना है। इसलिए काश्तकार बार-बार सरकारी खरीद की मांग कर रहे हैं।

सिर्फ कागजों में बढ़ रहे समर्थन मूल्य से किसानों में रोष, लागत इससे ज्यादा

जिले में इस बार 34 हजार 730 हेक्टेयर में धान की बुवाई हुई है। परमल धान का समर्थन मूल्य आए साल सिर्फ कागजों में बढ़ रहा है। मूंछल और बनास्पति धान सिर्फ बाजार भाव पर ही बिकता है। किसान मनीष मक्कासर के अनुसार परमल धान का उत्पादन पिछले साल 20 से 24 क्विंटल प्रति बीघा तक हुआ था, लेकिन बाजार भाव समर्थन मूल्य से 500 से 600 रुपए कम रहे। सरकारी खरीद नहीं होने की स्थिति में किसानों को मजबूरन मूंछल और बनास्पति धान की बुवाई करनी पड़ती है। इनका उत्पादन कम होता है, वहीं लागत भी ज्यादा आती है। किसानों के लिए फायदे सिर्फ परमल धान की खेती ही है। इसमें सिंचाई पानी की कम जरूरत रहती है। अन्य खर्च भी बहुत कम आता है।

मुख्य बातें-

  • जिले की हनुमानगढ़, टिब्बी, संगरिया, पीलीबंगा और रावतसर में होती है धान की बुवाई।
  • प्रति हैक्टेयर धान की पैदावार औसत 60 क्विंटल होती है। पराली की मात्रा भी धान के बराबर ही मानी जाती है।
  • हनुमानगढ़ तहसील के 15, पीलीबंगा के 12, टिब्बी के 20 और रावतसर के 5 गांवों में किसान धान की बुवाई करते हैं।

समर्थन मूल्य पर खरीद होने से ही धान उत्पादक किसानों को लाभ मिलेगा। परमल धान की पैदावार अच्छी होती है, लेकिन बाजार भाव कम रहते हैं। इस कारण काश्तकार मूंछल व बनास्पति धान की बुवाई करते हैं। इनका उत्पादन कम होता है, वहीं लागत भी ज्यादा आती है।

मनीष मक्कासर, जिला परिषद सदस्य एवं प्रगतिशील किसान

हनुमानगढ़ जिले में धान की सरकारी खरीद शुरू करने के लिए सरकार को पत्र भेजा गया था। अब इस मुद्दे पर दुबारा बात करेंगे। सरकारी खरीद शुरू होने से निश्चित रूप से काश्तकारों को लाभ होगा। मेरा प्रयास है धान की सरकारी खरीद शुरू करवाकर किसानों को लाभान्वित किया जाए।
चौधरी विनोद कुमार, विधायक, हनुमानगढ़

राज्य सरकार केंद्र सरकार से धान की सरकारी खरीद के लिए रिकमंड ही नहीं कर रही। अगर राज्य सरकार पत्र भेजे तो केंद्र सरकार दस मिनट में सरकारी खरीद की अनुमति प्रदान कर देगी। राज्य की कांग्रेस सरकार द्वारा सरकारी खरीद के लिए रिकमंड तक नहीं करना किसानों के साथ बड़ा अन्याय है।
बलवीर बिश्नोई, जिलाध्यक्ष, भाजपा

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