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आज श्रीगंगानगर स्थापना दिवस पर विशेष:जिले के पंजाबी बाहुल्य इलाकों को पंजाब में मिलाने की मांग पर अकाली जत्थे ने किया था आंदोलन

श्रीगंगानगरएक महीने पहले
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  • बीकानेर रियासत की अंतरिम सरकार में महाराजा के कोटे से किसी सिख को मंत्री नहीं बनाने पर जताई थी नाराजगी

श्रीगंगानगर जिला स्थापना से ही पहले बीकानेर रियासत और फिर राजस्थान का हिस्सा रहा। जब राजस्थान के एकीकरण का दौर चल रहा था तब बीकानेर रियासत के श्रीगंगानगर के पंजाबी बाहुल्य इलाके को पंजाब में शामिल करने की मांग उठने लगी थी। इसके लिए अकाली जत्थे बीकानेर ने 1948 में रलो पंजाब आंदोलन शुरू कर दिया था।

इस आंदोलन का एक सम्मेलन भी 2 मई 1948 में श्रीकरणपुर में हुआ था। तब इस आंदोलन को ज्यादा जन समर्थन नहीं मिला। अगर उस समय श्रीगंगानगर पंजाब का हिस्सा बन जाता तो आज राजस्थान का नक्शा ही कुछ और हाेता। तब बीकानेर रियासत की अंतरिम सरकार से महाराजा के कोटे से किसी सिख को मंत्री नहीं बनाने पर अकाली जत्थे ने नाराजगी जताई थी।

सिखों के संगठन अकाली जत्था बीकानेर रियासत के जत्थेदार हरी सिंह दुखिया सहित अन्य नेताओं की ओर से 2 मई 1948 को श्रीकरणपुर में करवाए गए दीवान में पंजाबी बाहुल्य इलाके को राजस्थान की बजाय पंजाब का हिस्सा बनाने में ही भलाई बताया गया। तब अकाली जत्थे का तर्क था कि अगर बीकानेर रियासत का पंजाबी बाहुल्य इलाका पंजाब का हिस्सा होगा तो नहरी पानी पर्याप्त उपलब्ध होने से आर्थिक लाभ होगा। उस समय देश में भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हो रहा था।

तब बताया गया कि श्रीगंगानगर क्षेत्र में अविभाजित पंजाब से पंजाबी किसान लाकर बसाए गए हैं जो भाषा व संस्कृति की दृष्टि से पंजाब के ज्यादा नजदीक हैं। अकाली जत्थे ओर से 1948 में जारी पोस्टर्स के अनुसार केंद्र सरकार हर रियासत काे अलग राज्य बना रही है।

भाषा के आधार नए राज्यों की सीमाओं का निर्धारण करवाया जा रहा है। तब बीकानेर रियासत के इस हिस्से को राजस्थान में मिलाने की अालोचना की गई थी। उस समय बीकानेर को राजस्थान में मिलाने के समर्थन में जलसे हो रहे थे। तब अकाली जत्थे ने इस क्षेत्र को राजस्थान के साथ मिलाने के लिए दो नारे ‘तेरा नहीं विधान मंजूर सानू’ और ‘असी मिलांगे पंजाब दे नाल हुण’ प्रचलित हुए थे। जो बीकानेर रियासत के श्रीगंगानगर इलाके को राजस्थान में मिलाने के विरोध और पंजाब में विलयकरण के प्रतीक थे।

गंगनहर निर्माण के दौरान दूध से स्वस्थ रहें मजदूर, इसलिए नहर की साइट पर रखी थी भैंसें
रियासतकाल में किसान आंदोलन में सक्रिय रहे स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व विधायक गुरदयाल सिंह संधू के पौत्र गुरबलपाल सिंह संधू के अनुसार तब रलो पंजाब आंदोलन को ज्यादा जन समर्थन नहीं मिल सका। यहां के लोग राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा जागरूक नहीं थे।

गंगनहर प्रोजेक्ट के पहले अध्यक्ष रहे गुरबलपाल सिंह संधू के अनुसार इसके बाद जब पंजाब में आतंकवाद के दौर में भी वहां के कट्‌टरपंथी लाेगाें ने पंजाबी सूबे की मांग के दौरान हरियाणा के पंजाबी बाहुल्य इलाकों की तरह श्रीगंगानगर पंजाबी इलाकों को पंजाब के साथ मिलाने की मांग की थी। हालांकि गंगनहर के पुनर्निर्माण के दौरान भी राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसान संगठनों ने श्रीगंगानगर क्षेत्र को पंजाब में मिलाने की मांग की थी ताकि नहरी पानी पूरा मिल सके।

गंगनहर के निर्माण के दौरान बीकानेर रियासत में पहले गिरदावर और फिर पदोन्नत होकर तहसीलदार रहे नानक सिंह के पड़पौत्र जपमीत सिंह मरवाह के अनुसार नहर के निर्माण के दौरान मजदूरों को अच्छा पोषण व संतुलित भोजन मिलता रहे, ताकि वे सेहत की दृष्टि से कमजाेर न पड़े। इसके लिए भैंसें रखी थी जिनसे दूध व घी मिलता था। उनके पड़दादा बताते थे कि उनकी साइट पर ये जिम्मेदारी उन पर थी, वहां तीन भैंसें रखी थी। इससे मजदूरों को दो समय पीने के लिए दूध दिया जाता था।

बचे हुए दूध से घी तैयार उन्हें भोजन के साथ दिया जाता था। श्रीगंगानगर निवासी तहसीलदार नानक सिंह को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए 26 अक्टूबर 1927 को शिवपुर हैड से गंगनहर में पानी छोड़ने पर महाराजा गंगा सिंह ने चांदी का तमगा देकर सम्मानित किया था।

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