श्रीमद्भागवत महापुराण कथा:वैदिक मंत्रों के जरिए प्राण प्रतिष्ठा की गई प्रतिमा चैतन्य ब्रह्म समान : संत मोरारी बापू

टोंक11 दिन पहले
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मंशापूर्ण भूतेश्वर महादेव मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत महापुराण कथा में रविवार को वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिष्ठित प्रतिमा की महत्ता समझाते हुए राष्ट्रीय संत दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि भगवान की प्रतिमा को पत्थर मान लेना यह सबसे बड़ा पाप है। क्योंकि मंत्रों के माध्यम से मंदिर अथवा धार्मिक स्थान पर प्राण-प्रतिष्ठित की गई प्रतिमा तो चैतन्य ब्रह्म है। व्यासपीठ से राष्ट्रीय संत ने कहा कि ईश्वर का ईश्वरत्व विलक्षण है और उस पर विश्वास करना है, हमारे प्रभु सदा हमारे साथ हैं, हमारे पास हैं, श्रीमद्भागवत में मंत्र है, द्रौपदी च परित्राता येन कौरव कश्मलात अर्थात जिसने कौरवों की सभा में द्रौपदी की रक्षा की, जिन्होंने ब्रजवासियों का पालन किया और सात कोस का पहाड़ को महत सात साल की आयु में सबसे छोटी उंगली में सात दिन तब उठाए रखा, वह कृष्ण कहीं चले नहीं गए, वह तो यहीं हैं। उन्होंने कहा कि लाखों भक्त उन्हें भगवान के रूप में देख रहे हैं, लेकिन कुछ अज्ञानी उन्हें पत्थर मानते है। अर्थात ऐसा सोचने वालो की बुद्धि में पत्थर आ गया है। जिस भावना से भक्त भगवान का ध्यान करता है, वैसा-वैसा ही शरीर भगवान बना लिया करते हैं।

भगवान राम का, श्री कृष्ण का शरीर पंचमहाभूतों से बना हुआ नहीं होता। उसमें हड्डी, चमड़ी, लहू, मांस नहीं होता, उनमें बुढ़ापा नहीं आता। वह दिव्य तन था, ज्योति ज्योति में समा गई। जो माया से पैदा होगा, जो प्रकृति से पैदा होगा, उसके जाने के बाद उसका कुछ न कुछ अंश रह जाएगा। लेकिन जहां प्रकृति है ही नहीं, वहां क्या शेष रहेगा। इस दौरान संगीतमय भजनों पर महिला-पुरुषों ने नृत्य का आनंद लिया। इस दौरान घनश्यामदास महाराज, मन्दिर अध्यक्ष बबलू बना, उपाध्यक्ष गोपाल, शंकरलाल, बाबूलाल, भैरवसिंह, कैलाश, नाथूलाल, महेन्द्र बंसल, मनोज मिश्रा सहित काफी संख्या में श्रद्धालु़ मौजूद रहे।

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